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Thursday, August 20, 2015

प्यार क्या होता है जाने मेडिकल साइंस से -

भावनात्मक और सामाजिक ताने-बाने में इस सवाल के कई जवाब हैं, मगर मेडिकल साइंस की दुनिया में प्यार एक न्यूरोलॉजिकल स्थिति है। शरीर में कुछ हार्मोन्स और केमिकल्स का कॉकटेल व्यक्ति को प्यार की राह पर ले जाता है। कई बार प्यार को एक रोग भी मान लिया जाता है, लेकिन यह एक केमिस्ट्री है, जिसे समझना बेहद दिलचस्प है।



प्यार की न्यूरोलॉजिकल स्थिति के तीन पड़ाव बताए हैं। प्यार के हर एक पड़ाव के लिए अलग-अलग तरह के हार्मोन्स और केमिकल्स उत्तरदायी होते हैं।


आमतौर पर जिसे प्यार कहा जाता है, वह शरीर में होने वाला एक प्रकार का हार्मोनल बदलाव है। इसे बीमारी जैसे नकारात्मक शब्द से नहीं जोड़ा जा सकता, क्योंकि प्यार एक सकारात्मक भावना है जो मस्तिष्क को ऊर्जा से भर देती है। लेकिन जब प्यार में अपने आपको या किसी दूसरे को नुकसान पहुंचाने की बात आती है तो इसका संबंध उन प्राकृतिक हार्मोनल बदलावों से नहीं होता।


मोह या लालसा :-


शोध के अनुसार यह प्यार की राह में आने वाला पहला पड़ाव है। महिला और पुरुष दोनों में इसका कारण सेक्स हार्मोन टेस्टोस्टेरोन और एस्ट्रोजन होते हैं।

आकर्षण:-



प्यार का यह दूसरा पड़ाव एक अद्भुत भावनात्मक स्थिति है। इस पड़ाव पर आकर व्यक्ति लालसा और मोह से आगे सोचने लगता है। वैज्ञानिक मानते हैं कि इस पड़ाव से तीन मुख्य न्यूरोट्रांसमीटर्स जुड़े होते हैं... एड्रेनेलिन, डोपमाइन और सेरोटोनिन।

एड्रेनेलिन:-



प्यार की राह पर आगे बढ़ने के शुरुआती दौर में व्यक्ति के तनाव का स्तर बेहद सक्रिय हो जाता है। इसकी वजह से रक्त में एड्रेनेलिन और कोर्टीसोल हार्मोन का स्तर बढ़ जाता है। इस स्थिति में व्यक्ति एक अजीब सी बेचैनी से घिर जाता है। उसके मन में अकल्पनीय रूप से एक व्यक्ति के लिए प्यार पनपने लगता है। ऐसे में दिल की धड़कनें बढ़ना और अक्सर गला और मुंह सूखने की समस्या होने लगती है।

डोपमाइन:-



एक शोध के दौरान जब प्यार करने वाले कुछ जोड़ों के मस्तिष्क का अध्ययन किया तो उन्होंने पाया कि उनमें डोपमाइन न्यूरोट्रांसमीटर का स्तर काफी ज्यादा था। यह केमिकल इच्छाओं की पूर्ति के लिए उकसाता है। इसका मस्तिष्क पर बिलकुल वैसा ही असर होता है जैसा कि कोकीन के सेवन का। 'प्यार करने वाले लोगों में अक्सर डोपमाइन की वजह से ही नींद न आना, भूख न लगना, किसी और काम में मन न लगना और अपनी रिलेशनशिप से जुड़ी हर छोटी से छोटी चीज के बारे में सोचकर खुश होना जैसे लक्षण दिखाई देते हैं।


सेरोटोनिन:-


यह प्यार की स्थिति से जुड़ा सबसे अहम केमिकल है। व्यक्ति के विचारों में उसके प्यार का समाते जाना इसी केमिकल की वजह से होता है।

गहरा लगाव:-


प्यार के तीसरे और अंतिम पड़ाव पर आकर महसूस होने वाला लगाव एक ऐसा बंधन होता है जो दो लोगों को एक लंबे सफर पर साथ ले जाने की ताकत रखता है। एक ऐसा सफर जहां वे जिंदगी का हर पल साथ गुजारना चाहते हैं और अपनी उम्र के आखिरी पड़ाव पर भी एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ना चाहते। और वैज्ञानिक मानते हैं कि एक-दूसरे से लगाव की इस भावना के लिए दो हार्मोन्स जिम्मेदार होते हैं:-ऑक्सीटोसिन और वेसोप्रेसिन।

ऑक्सीटोसिन:-


प्यार और चाहत के रिश्ते में ऑक्सीटोसिन भी एक अहम् हार्मोन है। यह एक-दूसरे से लगाव और जुड़ाव की भावना को और भी गहरा बना देता है। इससे दो लोग एक-दूसरे को एक-दूसरे के सबसे ज्यादा करीब महसूस करते हैं। यही हार्मोन मां और बच्चे के बीच भी गहरे भावनात्मक जुड़ाव के लिए उत्तरदायी होता है।न्यूयॉर्क में असिस्टेंट प्रोफेसर ऑफ साइकोलॉजी डियान विट ने भेड़ और चूहों पर किए गए एक शोध के दौरान पाया कि यदि उनके शरीर में ऑक्सीटोसिन के स्राव को ब्लॉक (रोक) कर दिया जाए तो मादा भेड़ और चूहे अपने बच्चों को स्वीकार ही नहीं करते हैं।

वेसोप्रेसिन:-


वेसोप्रेसिन लंबे समय के कमिटमेंट में अहम भूमिका निभाने वाला एक और महत्वपूर्ण हार्मोन है। लॉन्ग टर्म रिलेशनशिप में इसकी भूमिका पैरीवोल (एक प्रकार की जीव) पर किए गए एक शोध के दौरान सामने आई। पैरीवोल भी मनुष्यों की तरह संतुलित रूप से स्थिर रिश्ते बनाते हैं। जब नर पैरीवोल को वेसोप्रेसिन के प्रभाव को कम करने वाले ड्रग्स दिए गए तो उनके अपनी मादा साथी के साथ संबंध खत्म होने लगे, क्योंकि हार्मोन्स की अनुपस्थिति में उनके भीतर की लगाव की भावना खत्म हो गई।


यह भी ध्यान देने वाली बात है कि मेडिकल साइंस के अनुसार प्यार का संबंध दिमाग से होता है, इसमें दिल की भूमिका सिर्फ इतनी है कि प्यार में अक्सर व्यक्ति के दिल की धड़कनें बढ़ जाती है।

उपचार और प्रयोग -

Saturday, August 01, 2015

चीटियों का शौचालय - The Ant's Toilet

क्या आप जानते है कि-चीटियों का भी अपना एक शौचालय होता है और वो इसके लिए बाहर नहीं जाती हैं बल्कि घोंसले के एक कोने में उनका शौचालय बना होता है। जर्मनी की यूनिवर्सिटी ऑफ रेजेनबर्ग के शोधकर्ता तोमर कजाकजक्स ने बताया कि चीटियों के लिए भी स्वच्छता और शौचालय एक बड़ा मुद्दा है, जो हमारे समुदायों में है।






चीटियों के दैनिक नित्यकर्म व्यवहार के अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने उनके घोंसले पर पाए गए भूरे रंग के पदार्थों की जांच की और पता लगाया कि क्या वह चीटियों का मल है...?

शोधकर्ताओं ने अध्ययन के लिए सफेद रंग के प्लास्टर घोंसले में रहने वाली चीटियों को लाल और नीले रंग में रंगा खाना खिलाया और घोंसले का निरीक्षण किया।

शोध-कर्ताओं ने पाया कि चीटियों के हर घोंसले में एक या दो कोने लाल और नीले रंग के मल से भरे हैं। शोध -कर्ताओं ने यह भी पाया कि घोंसले के कोने वाले हिस्से को छोड़कर कहीं भी रंगीन पदार्थ (मल) का निशान नहीं है, जिसका अर्थ यह है कि घोंसले में रहने वाली सभी चीटियां एक खास कोने या क्षेत्र का ही इस्तेमाल शौचालय के रूप में करती हैं।

शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि चीटियों का शौचालय घोंसले में कहीं भी नहीं होता, बल्कि एक खास क्षेत्र या कोने का ही इस्तेमाल शौचालय के रूप में किया जाता है।

चीटियां अपने घोंसले को साफ-सुथरा रखती हैं और कूड़ा-कचरा और अपशिष्ट पदार्थ घोंसले से बाहर कर देती हैं।

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Tuesday, January 27, 2015

किले में वीर की एक लात से बन गया तालाब, महाभारत काल में हुआ निर्माण.....!

पूरी दुनिया को अपनी ओर आकर्षित करने वाला राजस्थान खुद में कई रोचक तथ्य छुपाए हुए है। यहां पर बने किलों का इतिहास हजारों साल पुराना है। माना जाता है कि महाभारत के पात्र भीम ने यहां करीब 5000 वर्ष पूर्व एक किले का निर्माण करवाया था। उसका नाम था 'चित्तौड़गढ़ का किला'। समुद्र तल से 1338 फीट ऊंचाई पर स्थित 500 फीट ऊंची एक विशाल आकार में, पहाड़ी पर निर्मित यह किला लगभग 3 मील लंबा और आधे मील तक चौड़ा है। 

चित्तौड़गढ़ का किला भारत के सभी किलों में सबसे बड़ा माना जाता है। यह 700 एकड़ में फैला हुआ है। माना जाता है कि पांडव के दूसरे भाई भीम जब संपत्ति की खोज में निकले तो रास्ते में उनकी एक योगी से मुलाकात हुई। उस योगी से भीम ने पारस पत्थर मांगा। इसके बदले में योगी ने एक ऐसे किले की मांग की जिसका निर्माण रातों-रात हुआ हो।

भीम ने अपने बल और भाइयों की सहायता से किले का काम लगभग समाप्त कर ही दिया था, सिर्फ थोड़ा-सा कार्य शेष था। इतना देख योगी के मन में कपट उत्पन्न हो गया। उसने जल्दी सवेरा करने के लिए यति से मुर्गे की आवाज में बांग देने को कहा। जिससे भीम सवेरा समझकर निर्माण कार्य बंद कर दे और उसे पारस पत्थर नहीं देना पड़े। मुर्गे की बांग सुनते ही भीम को क्रोध आया और उसने क्रोध से अपनी एक लात जमीन पर दे मारी। जहां भीम ने लात मारी वहां एक बड़ा सा जलाशय बन गया। आज इसे 'भीमलात' के नाम से जाना जाता है।


चित्तौड़गढ़ का किला भारत के सभी किलों में सबसे बड़ा माना जाता है। यह 700 एकड़ में फैला हुआ है। यह किला 3 मील लंबा और आधे मील तक चौड़ा है। किले के पहाड़ी का घेरा करीब 8 मील का है। इसके चारो तरफ खड़े चट्टान और पहाड़ थे। साथ ही साथ दुर्ग में प्रवेश करने के लिए लगातार सात दरवाजे कुछ अन्तराल पर बनाए गये थे। इन सब कारणों से किले में प्रवेश कर पाना शत्रुओं के लिए बेहद मुश्किल था।



निकट ही महावीर स्वामी का मन्दिर है। इस मंदिर का जीर्णोद्धार महाराणा कुम्भा के राज्यकाल में ओसवाल महाजन गुणराज ने करवाया थ। हाल ही में जीर्ण-शीर्ण अवस्था प्राप्त इस मंदिर का जीर्णोद्धार पुरातत्व विभाग ने किया है। इस मंदिर में कोई प्रतिमा नहीं है। आगे महादेव का मंदिर आता है। मंदिर में शिवलिंग है तथा उसके पीछे दीवार पर महादेव की विशाल त्रिमूर्ति है, जो देखने में समीधेश्वर मंदिर की प्रतिमा से मिलती है। कहा जाता है कि महादेव की इस विशाल मूर्ति को पाण्डव भीम अपने बाजूओं में बांधे रखते थे। 


यह स्तम्भ वास्तुकला की दृष्टि से अपने आप अनुठा है। इसके प्रत्येक मंजिल पर झरोखा होने से इसके भीतरी भाग में भी प्रकाश रहता है। इसमें भगवानों के विभिन्न रुपों और रामायण तथा महाभारत के पात्रों की सैकड़ों मूर्तियां खुदी हैं। कीर्तिस्तम्भ के ऊपरी मंजिल से दुर्ग एवं निकटवर्ती क्षेत्रों का विहंगम दृश्य दिखता है। बिजली गिरने से एक बार इसके ऊपर की छत्री टूट गई थी, जिसकी महाराणा स्वरुप सिंह ने मरम्मत करायी।





किले के अंत में दीवार के 150 फीट नीचे एक छोटी-सी पहाड़ी (मिट्टी का टीला) दिखाई पड़ती है। यह टीला कृत्रिम है और कहा जाता है कि अकबर ने जब चित्तौड़ पर आक्रमण किया था, तब अधिक उपयुक्त मोर्चा इसी स्थान को माना और उस मगरी पर मिट्टी डलवा कर उसे ऊंचा उठवाया, ताकि किले पर आक्रमण कर सके। प्रत्येक मजदूर को प्रत्येक मिट्टी की टोकरी हेतु एक-एक मोहर दी गई थी।




इस किले में नदी के जल प्रवाह के लिए दस मेहरावें बनी हैं, जिसमें नौ के ऊपर के सिरे नुकीले हैं। यह दुर्ग का प्रथम प्रवेश द्वार है। कहा जाता है कि एक बार भीषण युद्ध में खून की नदी बह निकलने से एक पाड़ा (भैंसा) बहता-बहता यहां तक आ गया था। इसी कारण इस द्वार को पाडन पोल कहा जाता है।
पाडन पोल से थोड़ा उत्तर की तरफ चलने पर दूसरा दरवाजा आता है, जिसे भैरव पोल के रुप में जाना जाता है।

दुर्ग के तृतीय प्रवेश द्वार को हनुमान पोल कहा जाता है। क्योंकि पास ही हनुमान जी का मंदिर है। हनुमान जी की प्रतिमा चमत्कारिक एवं दर्शनीय हैं। हनुमान पोल से कुछ आगे बढ़कर दक्षिण की ओर मुड़ने पर गणेश पोल आता है, जो दुर्ग का चौथा द्वार है। इसके पास ही गणपति जी का मंदिर है। यह दुर्ग का पांचवां द्वार है और छठे द्वार के बिल्कुल पास होने के कारण इसे जोड़ला पोल कहा जाता है। दुर्ग के इस छठे द्वार के पास ही एक छोटा सा लक्ष्मण जी का मंदिर है जिसके कारण इसका नाम लक्ष्मण पोल है। लक्ष्मण पोल से आगे बढ़ने पर एक पश्चिमाभिमुख प्रवेश द्वार मिलता है, जिससे होकर किले के अन्दर प्रवेश कर सकते हैं। यह दरवाजा किला का सातवां तथा अन्तिम प्रवेश द्वार है। इस दरवाजे के बाद चढ़ाई समाप्त हो जाती है।
आभार -देनिक भास्कर 

Wednesday, December 24, 2014

जब शनिदेव ने स्त्री रूप धारण किया ....!

गुजरात में भावनगर के सारंगपुर में हनुमान जी का एक अति प्राचीन मंदिर स्तिथ है जो की कष्टभंजन हनुमानजी के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर की विशेषता यह है की इस मंदिर में हनुमान जी के पैरों में स्त्री रूप में शनि देव बैठे है। सभी जानते हैं कि हनुमानजी स्त्रियों के प्रति विशेष आदर और सम्मान का भाव रखते हैं। ऐसे में उनके चरणों में किसी स्त्री का होना आश्यर्च की बात है। लेकिन इसका सम्बन्ध एक पौराणिक कथा से है जिसमें बताया गया है की आखिर क्यों शनिदेव को स्त्री का रूप धारण कर हनुमान जी के चरणों में आना पड़ा-



आइए पहले पढ़ते है यह कथा फिर जानेंगे कष्टभंजन हनुमान मंदिर के बारे में।





हमारे शास्त्रों में हनुमान जी और शनि देव से जुड़े अनेकों प्रसंग है जो बताते है की कैसे समय-समय पर हनुमान जी ने शनिदेव को ठीक किया। इनमे से ही एक प्रसंग यह है - प्राचीन मान्यताओं के अनुसार एक समय शनिदेव का प्रकोप काफी बढ़ गया था। शनि के कोप से आम जनता भयंकर कष्टों का सामना कर रही थी। ऐसे में लोगों ने हनुमानजी से प्रार्थना की कि वे शनिदेव के कोप को शांत करें। बजरंग बली अपने भक्तों के कष्टों को दूर करने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं और उस समय श्रद्धालुओं की प्रार्थना सुनकर वे शनि पर क्रोधित हो गए। 

जब शनिदेव को यह बात मालूम हुई कि हनुमानजी उन पर क्रोधित हैं और युद्ध करने के लिए उनकी ओर ही आ रहे हैं तो वे बहुत भयभीत हो गए। भयभीत शनिदेव ने हनुमानजी से बचने के लिए स्त्री रूप धारण कर लिया। 

शनिदेव जानते थे कि हनुमानजी बाल ब्रह्मचारी हैं और वे स्त्रियों पर हाथ नहीं उठाते हैं। हनुमानजी शनिदेव के सामने पहुंच गए, शनि स्त्री रूप में थे। तब शनि ने हनुमानजी के चरणों में गिरकर क्षमा याचना की और भक्तों पर से शनि का प्रकोप हटा लिया। तभी से हनुमानजी के भक्तों पर शनिदेव की तिरछी नजर का प्रकोप नहीं होता है। शनि दोषों से मुक्ति हेतु कष्टभंजन हनुमानजी के दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां आते हैं।



सारंगपुर में कष्टभंजन हनुमानजी के मंदिर का भवन काफी विशाल है। यह किसी किले के समान दिखाई देता है। मंदिर की सुंदरता और भव्यता देखते ही बनती है। कष्टभंजन हनुमानजी सोने के सिंहासन पर विराजमान हैं और उन्हें महाराजाधिराज के नाम से भी जाना जाता है। हनुमानजी की प्रतिमा के आसपास वानर सेना दिखाई देती है। यह मंदिर बहुत चमत्कारी है और यहां आने वाले श्रद्धालुओं की सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। यदि कुंडली में शनि दोष हो तो वह भी कष्टभंजन के दर्शन से दूर हो जाता है। इस मंदिर में हनुमानजी की प्रतिमा बहुत ही आकर्षक है। मंदिर की स्वयं की वेबसाइट पर हनुमान जी के हर दिन के लाइव दर्शन की सुविधा उपलब्ध है-

पत्नी सावित्री ने ब्रह्मा जी को क्यों दिया था श्राप....!

* पूरे भारत में ब्रह्मा जी का एक मंदिर क्यों है ....



 हिन्दुओं में तीन प्रधान देव माने जाते है- ब्रह्मा, विष्णु और महेश। ब्रह्मा इस संसार के रचनाकार है, विष्णु पालनहार है और महेश संहारक है। लेकिन हमारे देश में जहाँ विष्णु और महेश के अनगिनत मंदिर है वही खुद की पत्नी सावित्री के श्राप के चलते ब्रह्मा जी का पुरे भारत में एक मात्र मंदिर है जो की राजस्थान के प्रशिद्ध तीर्थ पुष्कर में स्तिथ है। आखिर क्यों दिया सावित्री ने अपने पति ब्रह्मा को ऐसा श्राप इसका वर्णन पद्म पुराण में मिलता है।




* एक पौराणिक कथा - पत्नी सावित्री ने ब्रह्मा जी को क्यों दिया था श्राप...

हिन्दू धर्मग्रन्थ पद्म पुराण के मुताबिक एक समयधरती पर वज्रनाश नामक राक्षस ने उत्पात मचा रखा था। उसके बढ़ते अत्याचारों से तंग आकर ब्रह्मा जी ने उसका वध किया। लेकिन वध करते वक़्त उनके हाथों से तीन जगहों पर कमल का पुष्प गिरा, इन तीनों जगहों पर तीन झीलें बनी। इसी घटना के बाद इस स्थान का नाम पुष्कर पड़ा। इस घटना के बाद ब्रह्मा ने संसार की भलाई के लिए यहाँ एक यज्ञ करने का फैसला किया।

ब्रह्मा जी यज्ञ करने हेतु पुष्कर पहुँच गए लेकिन किसी कारणवश सावित्री जी समय पर नहीं पहुँच सकी। यज्ञ को पूर्ण करने के लिए उनके साथ उनकी पत्नी का होना जरूरी था, लेकिन सावित्री जी के नहीं पहुँचने की वजह से उन्होंने गुर्जर समुदाय की एक कन्या 'गायत्री' से विवाह कर इस यज्ञ शुरू किया। उसी दौरान देवी सावित्री वहां पहुंची और ब्रह्मा के बगल में दूसरी कन्या को बैठा देख क्रोधित हो गईं।

* उन्होंने ब्रह्मा जी को श्राप दिया कि देवता होने के बावजूद कभी भी उनकी पूजा नहीं होगी। सावित्री के इस रुप को देखकर सभी देवता लोग डर गए। उन्होंने उनसे विनती की कि अपना शाप वापस ले लीजिए। लेकिन उन्होंने नहीं लिया। जब गुस्सा ठंडा हुआ तो सावित्री ने कहा कि इस धरती पर सिर्फ पुष्कर में आपकी पूजा होगी। कोई भी दूसरा आपका मंदिर बनाएगा तो उसका विनाश हो जाएगा। भगवान विष्णु ने भी इस काम में ब्रह्मा जी की मदद की थी। इसलिए देवी सरस्वती ने विष्णु जी को भी श्राप दिया था कि उन्हें पत्नी से विरह का कष्ट सहन करना पड़ेगा। इसी कारण राम (भगवान विष्णु का मानव अवतार) को जन्म लेना पड़ा और 14 साल के वनवास के दौरान उन्हें पत्नी से अलग रहना पड़ा था।

* ब्रह्मा जी के मंदिर का निर्माण कब हुआ व किसने किया इसका कोई उल्लेख नहीं है। लेकिन ऐसा कहते है की आज से तकरीबन एक हजार दो सौ साल पहले अरण्व वंश के एक शासक को एक स्वप्न आया था कि इस जगह पर एक मंदिर है जिसके सही रख रखाव की जरूरत है। तब राजा ने इस मंदिर के पुराने ढांचे को दोबारा जीवित किया।

* पुष्कर में सावित्री का भी मंदिर है लेकिन वो ब्रह्मा जीके पास न होकर ब्रह्मा जी के मंदिर के पीछे एक पहाड़ी पर स्तिथ है जहाँ तक पहुंचने के लिए सैकड़ों सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है।

* भगवान ब्रह्मा ने पुष्कर में कार्तिक पूर्णिमा के दिन यज्ञ किया था। यही कारण है कि हर साल अक्टूबर-नवंबर के बीच पड़ने वाले कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर पुष्कर मेला लगता है। मेला के दौरान ब्रह्मा जी के मंदिर में हजारों की संख्या में भक्त पहुंचते हैं। इन दिनों में भगवान ब्रह्मा की पूजा करने से विशेष लाभ मिलता है।

नागौर जिले का ये बूटाटी ग्राम में खींच लाती है -

जहाँ विज्ञान की सीमा समाप्त होती है , वही से श्रद्धा और अंधविश्वास का प्रारम्भ होता है ...उदाहरण के रूप में नजर लगना जैसी किसी बीमारी को हममे से अधिकांश लोंग मजाक में हँस कर उड़ा देते हैं , मगर वही जब अपना कोई परिचित भरपूर इलाज़ के बाद भी ठीक ना हो रहा हो , या बिना किसी कारण सुस्त , उखड़ा या उदास हो तो हम झट नजर उतारने के हथियार इस्तेमाल करते है -



पक्षाघात /लकवा के रोगियों को भी चिकित्सकों के इलाज के बाद श्रद्धा नागौर के बूटाटी ग्राम में खींच लाती है ...


अभी पिछले दिनों एक रिश्तेदार अचानक ब्रेन हैमरेज का शिकार होकर लम्बे समय तक कोमा में रही कोमा की स्थिति से बाहर आने तक उनके पूरे आधे शरीर पर पक्षाघात का असर हो चुका था ...पिछले कई महीनों से वे ना सिर्फ चलने- फिरने में असमर्थ हैं , अपितु करवट बदलने यहाँ तक के लिए भी उन्हें मदद की आवश्यकता होती है ... चिकित्सा के दौरान ही उन्हें किसी ने राजस्थान के नागौर जिले के बूटाटी ग्राम के बारे में बताया ..आखिरी उम्मीद के रूप में किसी प्रकार हिम्मत जुटा कर परिजन उन्हें लम्बी दूरी तय करते हुए आंध्र प्रदेश से राजस्थान लेकर आये ...तीन दिन की परिक्रमा के बाद उनकी दशा में इतना सुधार हुआ कि कई महीनों से से लघु शंका के लिए लगी नलियाँ हटा दी गयी ...चार पांच दिन में वे बिना सहारे 3-4 कदम भी चली (जैसा की उनके परिजनों ने बताया )..हालाँकि अभी पूरी तरह बिना सहारे चलना मुमकिन नहीं है , मगर महीनों से सिर्फ बिस्तर पर लेटे मरीज के लिए एक सप्ताह में इतना परिवर्तन भी कम सकारात्मक नहीं है ... बूटाटी धाम के बारे में सुना तो पहले भी कई बार था , और सुनी सुनायी बातों पर यकीन नहीं किया जा सकता मगर इसका प्रत्यक्ष प्रमाण पहली बार देखा ...बताते हैं की लकवा के नब्बे प्रतिशत मरीजों की स्थिति में यहाँ सुधार होते देखा गया है ...




यह मंदिर सिद्ध पुरुष चतुरदास जी महाराज की समाधि है ...लकवा के मरीजों को सात दिन का प्रवास करते हुए रोज एक परिक्रमा लगाते हैं ... सुबह की आरती के बाद पहली परिक्रमा मंदिर के बाहर तथा शाम की आरती के बाद दूसरी परिक्रमा मंदिर के अन्दर लगानी होती है , ये दोनों परिक्रमा मिलकर पूरी एक परिक्रमा कहलाती है ...सात दिन तक मरीज को इसी प्रकार परिक्रमा लगानी होती है


मरीज स्वयं चलने फिरने में असमर्थ होते हैं ,उन्हें परिजन परिक्रमा लगवाते हैं ... निवास के लिए यहाँ सुविधा युक्त धर्मशालाएं हैं ... यात्रियों को जरुरत का सभी सामान बिस्तर , राशन , बर्तन, जलावन की लकड़ियाँ आदि निःशुल्क उपलब्ध करवाई जाती हैं ...इसके अतिरिक्त पास में ही बाजार भी हैं जहाँ यात्री अपनी सुविधा से अन्य वस्तुएं खरीद सकते हैं ... हर माह की शुक्ल पक्ष की द्वादशी को यहाँ मेला लगता है ,इसके अतिरिक्त वैशाख , भाद्रपद और माघ महीने में भी विशेष मेलों का आयोजन होता है




Tuesday, December 23, 2014

ये है एक लिंग संग्रालय - This is a gender Sngraly

आप ने अपनी ज़िंदगी मे कभी न कभी कोई ना कोई म्यूज़ियम अवश्य देख होगा। दुनिया में म्यूज़ियम बनाने कि परंपरा बहुत पूरानी है और दुनीया मे अनको चीज़ो के म्यूज़ियम बने हुए है। लेकिन आइसलैंड की राजधानी रेक्जाविक मे स्तिथ 'आइसलैंडिक फैलोलॉजिकल म्यूजियम' (The Icelandic Phallological Museum) अपने आप में अनोखा है क्योकि यह दुनिया का इकलौता म्यूज़ियम है जहाँ मछलियो, जानवारों से लेकर इंसानो तक के लिंग (जननांग) का संग्रह किया गया है। इस लिंग म्यूज़ियम की स्थापना आइसलैंड के एक निवासी सिगरदर जारटार्सन ने 1997 में की थी-


                                              सिगरदर जारटार्सन, पेनिस म्यूज़ियम के संस्थापक

लिंग (पेनिस) का है विशाल संग्रह :-


इस संग्रालय मे आइसलैंड की धरती और पानी मे पाए जाने वाले अधिकतर मेमल्स (बच्चे पैदा करने वाले स्तनपायी प्राणी) के लिंगों का संग्रह है जिनकी संख्या 215 से अधिक है। इनमे 56 लिंग 17 अलग अलग तरह की व्हेल मछली के, 36 लिंग 7 अलग अलग तरह की सील के तथा बाकि के लिंग आइसलैंड की धरती पर मिलने वाले 26 प्रकार के अन्य मेमल्स के है जिसमे इंसान भी शामिल है। इसके अलावा कई लिंग विदेशी जानवारों के है। इस प्रकार कुल मिलाकर 300 से भी अधिक लिंग के नमुने यहाँ संग्रहित है।



                                                             
हाथी का विशाल लिंग 

इस म्यूज़ियम को अब तक 4 लोगो ने अपनी मृत्यु पशचात लींग गिफ़्ट करने का वादा कर रखा है जिसमे से एक मनुष्य का लिंग तो म्यूज़ियम को मिल भी चुका है, जो कि आइसलैंड के टूरिस्ट गाइड पॉल एरासन (95 साल) का है। हालाकि उम्र अधिक हो जाने के कारन उनका लिंग काफि सिकुड़ चुका था। उनका यह लिंग, अंडकोष के साथ एक जार मे रखा है। म्यूज़ियम को अभी आदमी के अच्छे लिंग का इंतज़ार है। उनका यह इंतज़ार भविष्य मे पुरा होने कि पुरी उम्मिद है क्योकि अमेरिकी निवासी जोना फाल्कन, जिसका लिंग दुनिया का सबसे बड़ा लिंग (शिथील अवस्था मे 9 इंच और उत्तेजित अवस्था मे 13.5 इंच) है, ने मृत्यु पश्चात अपना लिंग म्यूज़ियम को दान करने की घोषणा की है।

                                                                     जिराफ़ का लिंग

यहाँ रखे लिंगो मे सब्से अधिक लम्बाई व्हेल मछली के लिंग की (67 इंच) , और सबसे कम लम्बाई हेमस्टर की पेनिस बोन (.081 इंच, देखने के लिए मेग्निफाइन ग्लास कि जरुरत पड़ती है) की है। पेनिस बोन, पेनिस में पाई जाने वाली हड्डी होती है जो की इंसानो के पेनिस मे नही होती है लेकिन कई जानवरो जैसे गोरिल्ला, चिम्पांज़ी आदि मे पाई जाती है।

                                   #पेनिस म्यूज़ियम का सबसे बडा लिंग - व्हेल फिश का लिंग (67 इंच)#

एक मज़ाक से हुई थी पेनिस म्यूज़ियम (लिंग संग्रालय) की शुरुआत :-


इस म्यूज़िम कि शुरुआत एक मज़ाक से हुई थी। बात 1974 की है जब जारटार्सन आईसलैंड के एक स्कूल मे हेडमास्टर थे। एक बार गर्मियों की छुटियों मे वो पास के गाँव घूमने गये, वहाँ पर उन्हे किसी ग्रामीण ने एक बेल का लिंग दीया। उन्होंने वो लिंग वापस आकर अपने साथी टीचर्स को दिखाया। उनके साथी अध्यापक भी गर्मियों की छुट्टियों में पास ही स्तिथ व्हेल स्टेशन पर काम किया करते थे। उन्होंने जारटार्सन का मजाक उडाने के लीए, व्हेल स्टेशन से एक विशाल व्हेल का लिंग लाकर दिया। लेकिन इसका उलटा असर हुआ और जारटार्सन को लिंगों का संग्रह करने का विचार आया। 1980 तक उनके पास 13, 1940 तक 34 और 1997 में, जब उन्होंने रेक्जाविक मे पेनिस म्यूज़ियम खोला, उनके पास 62 लिंगो का संग्रह हो चुका था। वर्तमान में यह संख्या 300 से ज्यादा हो चुकी है।


                                                          कुछ अन्य मेमल्स के लिंग

लिंग संग्रालय (पेनिस म्यूज़ियम) से जुड़े कुछ तथ्य :-


1. इस म्यूज़ियम मे साल भर मे औसतन 11000 विज़िटर आते है।


2. यहाँ आने वाले विज़िटर्स मे से 60 % महिलाये होती है। जो इस बात को प्रमाणित करती है कि प्रकर्ति विपरीत लिंग के प्रति हमेशा ज्यादा आकर्षण होता है।


3. अमेरिका के टॉम मिचेल ने अपनी मौत पूर्व अपना लिंग "Elmo" (Nick name of his penis) म्यूज़ियम को दान करने की इच्छा ज़ाहिर की है इस पर एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म 'The Final Member' बन चुकी है।
 


                                    टॉम मिचेल जो की अपनी मृत्यु पूर्व अपना लिंग म्यूज़ियम को देंगे

4. इस म्यूज़ियम को वर्तमान मे जारटार्सन के पुत्र सीगुरोसों संभाल रहे है।

5. एक जर्मन आदमी ने इस म्यूज़ियम को ख़रीदने के लिए 232000 $ का प्रस्ताव दिया था।


6. एक अन्य बिज़निस मेन ने इसे ब्रिटेन मे शिफ्ट करने का प्रस्ताव रखा था।


7. दोनों ही प्रस्ताव जारटार्सन द्वारा निरस्त कर दिये गये।


                                                    आइसलैंडिक फैलोलॉजिकल म्यूजियम

8. 2008 के बीजिंग ओलम्पिक में आइसलैंड की हैंडबॉल टीम ने सिल्वर मेडल जीता था। उनकी जीत की ख़ुशी में म्यूज़ियम ने सभी 15 खिलाड़ियों के हूबहू लिंग बनाये थे जो कि म्यूज़ियम मे रखे है। हालांकि कौनसा लिंग किस खिलाडी का है यह नहि लिखा है।

                                    2008 की हैंडबाल टीम की जीत कि खुशी मे बने पेनिस स्कल्पचर

9. 2004 तक यह म्यूज़ियम रेक्जाविक मे ही था, इसे आईसलैंड सरकार कि तरफ़ से आर्थिक मदद मिलती थी जो कि सरकार ने 2004 में बंद कर दी। तब जारटार्सन ने इसे पास के एक गाँव मे शिफ़्ट कर दिया। पर 2011 में उनके बेटे ने इसे दुबारा रेक्जाविक मे नये संग्रालय मे शिफ़्ट किया।

10. इस म्यूज़ियम का सारा आर्ट वर्क भी पेनिस को समर्पित है।



पेनिस आर्ट वर्क 

                                                                         पेनिस लैंप

11. जारटार्सन और उसके बेटे सीगुरोसों कि इच्छा इस म्यूज़ियम को फैलोलॉजी ( Phallology, मेडिकल साइंस की एक ब्रांच है जिसमे लिंग का अध्यन्न किया जाता है ) के विश्व्स्तरीय स्टडी सेंटर के रूप मे विकसित करने कि है।

पेनिस म्यूज़ियम की ऑफिसियल वेबसाइट www.phallus.is

यहाँ है शतरंज की विशाल गोटिया जिनसे खेलते थे भीम और घटोत्कच.......!


* हम आपको एक ऐसी जगह की चर्चा पर ले चलते है जहा रखी महाभारत काल की विरासत आज भी पर्यटकों को बहुत आकर्षित करती है। यह जगह है भारत के पूर्वोत्तर में स्थित राज्य नागालैंड का एक शहर दीमापुर जिसको कभी हिडिंबापुर के नाम से जाना जाता था। इस जगह महाभारत काल में हिडिंब राक्षस और उसकी बहन हिडिंबा रहा करते थे। यही पर हिडिंबा ने भीम से विवाह किया था। यहां बहुलता में रहनेवाली डिमाशा जनजाति खुद को भीम की पत्नी हिडिंबा का वंशज मानती है। यहाँ आज भी हिडिंबा का वाड़ा है, जहां राजवाड़ी में स्थित शतरंज की ऊंची-ऊंची गोटियां पर्यटकों को बहुत आकर्षित करती है। इनमे से कुछ अब टूट चुकी है। यहाँ के निवासियों कि मान्यता है कि इन गोटियों से भीम और उसका पुत्र घटोत्कच शतरंज खेलते थे। इस जगह पांडवो ने अपने वनवास का काफी समय व्यतीत किया था।

हिडिंबा और भीम कि कहानी ...

महाभारत की कथा के अनुसार वनवास काल में जब पांडवों का घर षडय़ंत्र के तहत जला दिया गया तो वे वहां से भागकर एक दूसरे वन में गए। जहां हिडिंब राक्षस अपनी बहन हिडिंबा के साथ रहता था। एक दिन हिडिंब ने अपनी बहन हिडिंबा को वन में भोजन की तलाश करने के लिये भेजा। वन में हिडिम्बा को भीम दिखा जो की अपने सोए हुए परिवार की रक्षा के लिए पहरा दे रहा था। राक्षसी हिडिंबा को भीम पसंद आ जाता है और वो उससे प्रेम करने लगती है। इस कारण वो उन सब को जीवित छोड़ कर वापस आ जाती है। लेकिन यह बात उसके भाई हिडिंब को पसंद नहीं आती है और वो पाण्डवों पर हमला कर देता है। लड़ाई में हिडिंब, भीम के हाथो मारा जाता है।

हिडिम्ब के मरने पर वे लोग वहां से प्रस्थान की तैयारी करने लगे, इस पर हिडिम्बा पांडवों की माता कुन्ती के चरणों में गिर कर प्रार्थना करने लगी, “हे माता! मैंने आपके पुत्र भीम को अपने पति के रूप में स्वीकार कर लिया है। आप लोग मुझे कृपा करके स्वीकार कर लीजिये। यदि आप लोगों ने मझे स्वीकार नहीं किया तो मैं इसी क्षण अपने प्राणों का त्याग कर दूंगी।” हिडिम्बा के हृदय में भीम के प्रति प्रबल प्रेम की भावना देख कर युधिष्ठिर बोले, “हिडिम्बे! मैं तुम्हें अपने भाई को सौंपता हूँ किन्तु यह केवल दिन में तुम्हारे साथ रहा करेगा और रात्रि को हम लोगों के साथ रहा करेगा।”

हिडिंबा इसके लिये तैयार हो गई और भीमसेन के साथ आनन्दपूर्वक जीवन व्यतीत करने लगी। एक वर्ष व्यतीत होने पर हिडिम्बा का पुत्र उत्पन्न हुआ। उत्पन्न होते समय उसके सिर पर केश (उत्कच) न होने के कारण उसका नाम घटोत्कच रखा गया। वह अत्यन्त मायावी निकला और जन्म लेते ही बड़ा हो गया।

हिडिम्बा ने अपने पुत्र को पाण्डवों के पास ले जा कर कहा, “यह आपके भाई की सन्तान है अत: यह आप लोगों की सेवा में रहेगा।” इतना कह कर हिडिम्बा वहां से चली गई। घटोत्कच श्रद्धा से पाण्डवों तथा माता कुन्ती के चरणों में प्रणाम कर के बोला, “अब मुझे मेरे योग्य सेवा बतायें।? उसकी बात सुन कर कुन्ती बोली, “तू मेरे वंश का सबसे बड़ा पौत्र है।

समय आने पर तुम्हारी सेवा अवश्य ली जायेगी।” इस पर घटोत्कच ने कहा, “आप लोग जब भी मुझे स्मरण करेंगे, मैं आप लोगों की सेवा में उपस्थित हो जाउँगा।” इतना कह कर घटोत्कच वर्तमान उत्तराखंड की ओर चला गया। इसी घटोत्कच ने महाभारत के युद्ध में पांडवों की ओर से लड़ते हुए वीरगति पायी थी।

हिडिम्ब का शहर दीमापुर प्राकृतिक रूप से बहुत ख़ूबसूरत होने के साथ-साथ एक ऐतिहासिक शहर भी है। दीमापुर नाम का एक और अर्थ भी निकाला जाता है। यह तीन शब्दों दी, मा और पुर से मिलकर बना है। कचारी भाषा के अनुसार दी का अर्थ होता है नदी, मा का अर्थ होता है महान और पुर का अर्थ होता है शहर।यहां पर कचारी शासनकाल में बने मन्दिर, तालाब और किले देखे जा सकते हैं। इनमें राजपुखूरी, पदमपुखूरी, बामुन पुखूरी और जोरपुखूरी आदि प्रमुख हैं।



हिमाचल प्रदेश के मनाली में है हिडिम्बा का मंदिर...

जैसा की हमने आपको ऊपर बताया की हिडिम्बा मूल रूप से नागालैंड की थी पर पुत्र के जन्म के बाद पुत्र को पांडवो को सौप कर वो वर्तमान हिमाचल प्रदेश के मनाली जिले में आ गई थी। कहते है इसी स्थान पर उनका राकक्षी योनि से दैवीय योनि में रूपांतरण हुआ था। मनाली में ही देवी हिडिम्बा का एक मंदिर बना हुआ है जो की कला की द्रष्टि से बहुत उत्कृष्ट है। मंदिर के भीतर एक प्राकृतिक चटटान है जिसे देवी का स्थान माना जाता है। इसी चट्टान पर देवी हिडिम्बा के पैरो के विशाल चिन्ह मौजूद है। चटटान को स्थानीय बोली में 'ढूंग कहते हैं इसलिए देवी को 'ढूंगरी देवी कहा जाता है। देवी को ग्राम देवी के रूप में भी पूजा जाता है। इस चट्टान के ऊपर लकड़ी के मंदिर का निर्माण 1553 में किया गया था।

चमत्कारिक भूतेश्वर नाथ शिवलिंग - हर साल बढ़ती है इसकी लम्बाई....!


* छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले के मरौदा गांव में घने जंगलों बीच एक प्राकर्तिक शिवलिंग है जो की भूतेश्वर नाथ के नाम से प्रसिद्ध है। यह विशव का सबसे बड़ा प्राकर्तिक शिवलिंग है। सबसे बड़ी आश्चर्य की बात यह है की यह शिवलिंग अपने आप बड़ा और मोटा होता जा रहा है। यह जमीन से लगभग 18 फीट उंचा एवं 20 फीट गोलाकार है। राजस्व विभाग व्दारा प्रतिवर्ष इसकी उचांई नापी जाती है जो लगातार 6 से 8 इंच बढ रही है।

* इस शिवलिंग के बारे में बताया जाता है कि आज से सैकडो वर्ष पूर्व जमीदारी प्रथा के समय पारागांव निवासी शोभासिंह जमींदार की यहां पर खेती बाडी थी। शोभा सिंह शाम को जब अपने खेत मे घुमने जाता था तो उसे खेत के पास एक विशेष आकृति नुमा टीले से सांड के हुंकारने (चिल्लानें) एवं शेर के दहाडनें की आवाज आती थी। अनेक बार इस आवाज को सुनने के बाद शोभासिंह ने उक्त बात ग्रामवासियों को बताई। ग्राम वासियो ने भी शाम को उक्त आवाजे अनेक बार सुनी। तथा आवाज करने वाले सांड अथवा शेर की आसपास खोज की। परतु दूर दूर तक किसी जानवर के नहीं मिलने पर इस टीले के प्रति लोगो की श्रद्वा बढने लगी। और लोग इस टीले को शिवलिंग के रूप में मानने लगे। इस बारे में पारा गावं के लोग बताते है कि पहले यह टीला छोटे रूप में था। धीरे धीरे इसकी उचाई एवं गोलाई बढती गई। जो आज भी जारी है। इस शिवलिंग में प्रकृति प्रदत जललहरी भी दिखाई देती है। जो धीरे धीरे जमीन के उपर आती जा रही है।

यहीं स्थान भुतेश्वरनाथ, भकुरा महादेव के नाम से जाना जाता है। इस शिवलिंग का पौराणिक महत्व सन 1959 में गोरखपुर से प्रकाषित धार्मिक पत्रिका कल्याण के वार्षिक अंक के पृष्ट क्रमांक 408 में उल्लेखित है जिसमें इसे विश्व का एक अनोखा महान एवं विशाल शिवलिंग बताया गया है।

यह भी किंवदंती है कि इनकी पूजा बिंदनवागढ़ के छुरा नरेश के पूर्वजों द्वारा की जाती थी। दंत कथा है कि भगवान शंकर-पार्वती ऋषि मुनियों के आश्रमों में भ्रमण करने आए थे, तभी यहां शिवलिंग के रूप में स्थापित हो गए।

क़रीब आठ करोड़ जीवाणु चुंबन करने वालों के मुंह में चले जाते हैं.....!


* दस सेकंड के एक चुंबन के दौरान क़रीब आठ करोड़ जीवाणुचुंबन करने वालों के मुंह में चले जाते हैं.

* नीदरलैंड के वैज्ञानिकों का एक दल इस नतीजे पर पहुंचा है. इन वैज्ञानिकों ने 21 जोड़ों के चुंबन क्रिया परनिगरानी रखने के बाद पाया कि जो लोग दिन भर में नौ बार एक-दूसरे का चुंबन लेते हैं, उनमें लार के ज़रिए जीवाणु स्थानांतरित करने की संभावना ज़्यादा होती है.

*अध्ययन के मुताबिक़ इंसान के मुंह में 700 प्रकार के जीवाणु करोड़ों की संख्या में मौजूद होते हैं, लेकिन इनमें से कुछ ही ज़्यादा तेज़ी से स्थानांतरित होते हैं. डच वैज्ञानिकों का ये अध्ययन जर्नल माइक्रोबिओम में प्रकाशित हुआ है.नीदरलैंड आर्गेनाइज़ेशन फ़ॉर एप्लाइड साइंटिफ़िक रिसर्च (टीएनओ) के एक दल ने एक जोड़ों से किसिंग हैबिट को लेकर कई सवाल पूछे. इनमें अहम सवाल थे कि बीते साल उन्होंने कितनी बार एक-दूसरे का चुंबन लिया और आख़िरी बार लॉक्ड लिप्स वाला चुंबन कब किया था.

अध्ययन का असर--

* वैज्ञानिकों ने इन जोड़ों के जीभ और लार का सैंपल पहले लिया और उसके बाद 10 सेकंड के चुंबन के बाद का सैंपल लिया. इसके बाद एक पार्टनर को प्रोबायोटिक ड्रिंक पीने को दिया गया, जिसकी मदद से आसानी से जीवाणुओं की पहचान संभव है.इसके बाद कपल के दूसरे चुंबन के दौरान वैज्ञानिक यह पता लगा पाते हैं कि कितना जीवाणु दूसरे पार्टनर के मुंह में पहुंचा है- एक दस सेकंड के चुंबन के बाद क़रीब आठ करोड़ जीवाणु स्थानांतरित हो जाते हैं. इस अध्ययन दल के प्रमुख प्रोफ़ेसर रेमको कोर्ट बताते हैं, "फ्रेंच किसिंग के जरिए जीवाणु बड़ी तेज़ी से और बड़ी संख्या में एक के मुंह से दूसरे के मुंह में पहुंच जाते हैं." माना जा रहा है कि ऐसे अध्ययन से जीवाणु जनित समस्याओं का इलाज तलाशने में मदद मिलेगी.डच वैज्ञानिकों ने ये अध्ययन एमस्टर्डम स्थित जीवाणुओं के दुनिया के पहले म्यूज़ियम के सहयोग से किया है.