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Saturday, August 29, 2015

कैंसर से लेकर अनेक रोगों इलाज -

आजकल की व्यस्त जीवन शेली में मनुष्य पे समय का अभाव है ,अनियमित खान -पान के चलते रोगों से लड़ने की प्रतिरोधक छमता दिनों -दिन घट रही है मगर हम यदि जरा भी अपने अनमोल शरीर के लिए ध्यान दे और नियमित जीवन चर्या से सिर्फ पन्द्रह मिनट का समय निकाल कर इस प्रयोग को कर ले तो आपको कई बीमारियों से निजात मिल जायेगी और जो स्वस्थ लोग है उनको भी डॉक्टर का मुंह नहीं देखना पड़ेगा ,क्युकि जीवन का सुख निरोगी काया में है . सुखी व्यक्ति जिसका पुत्र आज्ञाकारी है जिसकी पत्नी सदाचरानी है .


तो अगर आप अपने जीवन को निरोग बनाना चाहते है तो हमारी पोस्ट को ध्यान पूर्वक पढ़े और शरीर आपका है तो आज से ही नीचे लिखे प्रयोग को काम में लाये :-

कैंसर में गेहूँ के ज्वारे का उपयोग :-
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गेहूँ के दाने बोने पर जो एक ही पत्ता उगकर ऊपर आता है उसे ज्वारा कहा जाता है। नवरात्रि आदि उत्सवों में यह घर-घर में छोटे-छोटे मिट्टी के पात्रों में मिट्टी डालकर बोया जाता है। ये गेहूँ के ज्वारे का रस, प्रकृति के गर्भ में छिपी औषधियों के अक्षय भंडार में से मानव को प्राप्त एक अनुपम भेंट है। शरीर के आरोग्यार्थ यह रस इतना अधिक उपयोगी सिद्ध हुआ है कि विदेशी जीववैज्ञानिकों ने इसे 'हरा लहू' (Green Blood) कहकर सम्मानित किया है। डॉ. एन. विगमोर नामक एक विदेशी महिला ने गेहूँ के कोमल ज्वारों के रस से अनेक असाध्य रोगों को मिटाने के सफल प्रयोग किये हैं। उपरोक्त ज्वारों के रस द्वारा उपचार से 350 से अधिक रोग मिटाने के आश्चर्यजनक परिणाम देखने में आये हैं। जीव-वनस्पति शास्त्र में यह प्रयोग बहुत मूल्यवान है।

गेहूँ के ज्वारों के रस में रोगों के उन्मूलन की एक विचित्र शक्ति विद्यमान है। शरीर के लिए यह एक शक्तिशाली टॉनिक है। इसमें प्राकृतिक रूप से कार्बोहाईड्रेट आदि सभी विटामिन, क्षार एवं श्रेष्ठ प्रोटीन उपस्थित हैं। इसके सेवन से असंख्य लोगों को विभिन्न प्रकार के रोगों से मुक्ति मिली है।

उदाहरणार्थः-
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"मूत्राशय की पथरी, हृदयरोग, डायबिटीज, पायरिया एवं दाँत के अन्य रोग, पीलिया, लकवा, दमा, पेट दुखना, पाचन क्रिया की दुर्बलता, अपच, गैस, विटामिन ए, बी आदि के अभावोत्पन्न रोग, जोड़ों में सूजन, गठिया, संधिशोथ, त्वचासंवेदनशीलता (स्किन एलर्जी) सम्बन्धी बारह वर्ष पुराने रोग, आँखों का दौर्बल्य, केशों का श्वेत होकर झड़ जाना, चोट लगे घाव तथा जली त्वचा सम्बन्धी सभी रोग।"

हजारों रोगियों एवं निरोगियों ने भी अपनी दैनिक खुराकों में बिना किसी प्रकार के हेर-फेर किये गेहूँ के ज्वारों के रस से बहुत थोड़े समय में चमत्कारिक लाभ प्राप्त किये हैं। ये अपना अनुभव बताते हैं कि ज्वारों के रस से आँख, दाँत और केशों को बहुत लाभ पहुँचता है। कब्जी मिट जाती है, अत्यधिक कार्यशक्ति आती है और थकान नहीं होती।

गेहूँ के ज्वारे उगाने की विधि:-
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आप मिट्टी के नये खप्पर, कुंडे या सकोरे लें। उनमें खाद मिली मिट्टी लें। रासायनिक खाद का उपयोग बिलकुल न करें। पहले दिन एक कुंडे की सारी मिट्टी ढँक जाये इतने गेहूँ बोयें। पानी डालकर कुंडों को छाया में रखें। सूर्य की धूप कुंडों को अधिक या सीधी न लग पाये इसका ध्यान रखें।

इसी प्रकार दूसरे दिन दूसरा कुंडा या मिट्टी का खप्पर बोयें और प्रतिदिन एक बढ़ाते हुए नौवें दिन नौवां कुंडा बोयें। सभी कुंडों को प्रतिदिन पानी दें। नौवें दिन पहले कुंडे में उगे गेहूँ काटकर उपयोग में लें। खाली हो चुके कुंडे में फिर से गेहूँ उगा दें। इसी प्रकार दूसरे दिन दूसरा, तीसरे दिन तीसरा करते चक्र चलाते जायें। इस प्रक्रिया में भूलकर भी प्लास्टिक के बर्तनों का उपयोग कदापि न करें।

प्रत्येक कुटुम्ब अपने लिए सदैव के उपयोगार्थ 10, 20, 30 अथवा इससे भी अधिक कुंडे रख सकता है। प्रतिदिन व्यक्ति के उपयोग अनुसार एक, दो या अधिक कुंडे में गेहूँ बोते रहें। मध्याह्न के सूर्य की सख्त धूप न लगे परन्तु प्रातः अथवा सायंकाल का मंद ताप लगे ऐसे स्थान में कुंडों को रखें।

सामान्यतया आठ-दस दिन नें गेहूँ के ज्वारे पाँच से सात इंच तक ऊँचे हो जायेंगे। ऐसे ज्वारों में अधिक से अधिक गुण होते हैं। ज्यो-ज्यों ज्वारे सात इंच से अधिक बड़े होते जायेंगे त्यों-त्यों उनके गुण कम होते जायेंगे। अतः उनका पूरा-पूरा लाभ लेने के लिए सात इंच तक बड़े होते ही उनका उपयोग कर लेना चाहिए।

ज्वारों की मिट्टी के धरातल से कैंची द्वारा काट लें अथवा उन्हें समूल खींचकर उपयोग में ले सकते हैं। खाली हो चुके कुंडे में फिर से गेहूँ बो दीजिये। इस प्रकार प्रत्येक दिन गेहूँ बोना चालू रखें।


ज्वारों का रस बनाने की विधि:-
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जब समय अनुकूल हो तभी ज्वारे काटें। काटते ही तुरन्त धो डालें। धोते ही उन्हें कूटें। कूटते ही उन्हें कपड़े से छान लें। इसी प्रकार उसी ज्वारे को तीन बार कूट-कूट कर रस निकालने से अधिकाधिक रस प्राप्त होगा। चटनी बनाने अथवा रस निकालने की मशीनों आदि से भी रस निकाला जा सकता है। रस को निकालने के बाद विलम्ब किये बिना तुरन्त ही उसे धीरे-धीरें पियें। किसी सशक्त अनिवार्य कारण के अतिररिक्त एक क्षण भी उसको पड़ा न रहने दें, कारण कि उसका गुण प्रतिक्षण घटने लगता है और तीन घंटे में तो उसमें से पोषक तत्व ही नष्ट हो जाता है। प्रातःकाल खाली पेट यह रस पीने से अधिक लाभ होता है।

दिन में किसी भी समय ज्वारों का रस पिया जा सकता है। परन्तु रस लेने के आधा घंटा पहले और लेने के आधे घंटे बाद तक कुछ भी खाना-पीना न चाहिए। आरंभ में कइयों को यह रस पीने के बाद उबकाई आती है, उलटी हो जाती है अथवा सर्दी हो जाती है। परंतु इससे घबराना न चाहिए। शरीर में कितने ही विष एकत्रित हो चुके हैं यह प्रतिक्रिया इसकी निशानी है। सर्दी, दस्त अथवा उलटी होने से शरीर में एकत्रित हुए वे विष निकल जायेंगे।

ज्वारों का रस निकालते समय मधु, अदरक, नागरबेल के पान (खाने के पान) भी डाले जा सकते हैं। इससे स्वाद और गुण का वर्धन होगा और उबकाई नहीं आयेगी। विशेषतया यह बात ध्यान में रख लें कि ज्वारों के रस में नमक अथवा नींबू का रस तो कदापि न डालें।

रस निकालने की सुविधा न हो तो ज्वारे चबाकर भी खाये जा सकते हैं। इससे दाँत मसूढ़े मजबूत होंगे। मुख से यदि दुर्गन्ध आती हो तो दिन में तीन बार थोड़े-थोड़े ज्वारे चबाने से दूर हो जाती है। दिन में दो या तीन बार ज्वारों का रस लीजिये।

रामबाण इलाज:-
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जीवन और मरण के बीच जूझते रोगियों को प्रतिदिन चार बड़े गिलास भरकर ज्वारों का रस दिया जाता है। जीवन की आशा ही जिन रोगियों ने छोड़ दी उन रोगियों को भी तीन दिन या उससे भी कम समय में चमत्कारिक लाभ होता देखा गया है। ज्वारे के रस से रोगी को जब इतना लाभ होता है, तब नीरोग व्यक्ति ले तो कितना अधिक लाभ होगा?

सस्ता और सर्वोत्तम ज्वारों का रस:-
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ज्वारों का रस दूध, दही और मांस से अनेक गुना अधिक गुणकारी है। दूध और मांस में भी जो नहीं है उससे अधिक इस ज्वारे के रस में है। इसके बावजूद दूध, दही और मांस से बहुत सस्ता है। घर में उगाने पर सदैव सुलभ है। गरीब से गरीब व्यक्ति भी इस रस का उपयोग करके अपना खोया स्वास्थ्य फिर से प्राप्त कर सकता है। गरीबों के लिए यह ईश्वरीय आशीर्वाद है। नवजात शिशु से लेकर घर के छोटे-बड़े, अबालवृद्ध सभी ज्वारे के रस का सेवन कर सकते हैं। नवजात शिशु को प्रतिदिन पाँच बूँद दी जा सकती है।

ज्वारे के रस में लगभग समस्त क्षार और विटामिन उपलब्ध हैं। इसी कारण से शरीर मे जो कुछ भी अभाव हो उसकी पूर्ति ज्वारे के रस द्वारा आश्चर्यजनक रूप से हो जाती है। इसके द्वारा प्रत्येक ऋतु में नियमित रूप से प्राणवायु, खनिज, विटामिन, क्षार और शरीरविज्ञान में बताये गये कोषों को जीवित रखने से लिए आवश्यक सभी तत्त्व प्राप्त किये जा सकते हैं।

डॉक्टर की सहायता के बिना गेहूँ के ज्वारों का प्रयोग आरंभ करो और खोखले हो चुके शरीर को मात्र तीन सप्ताह में ही ताजा, स्फूर्तिशील एवं तरावटदार बना दो।

ज्वारों के रस के सेवन के प्रयोग किये गये हैं। कैंसर जैसे असाध्य रोग मिटे हैं। शरीर ताम्रवर्णी और पुष्ट होते पाये गये हैं।

Tuesday, August 04, 2015

मिरगी रोगी के लिए करे उपाय .....!


तंत्रिका तंत्र (नर्वस सिस्टम) का यह रोग मिरगी, अपस्मार एवं एपीलेप्सी के नाम से जाना जाता है।

ऐसे रोगी के हाथ-पांव एेंठने लगते हैं, मुंह से झाग निकलता है। दांत बंध जाते हैं, जबड़ा चिपक जाता है। मल-मूत्र निकल जाता है। ऐलोपैथिक (अंग्रेजी) दवा देने वाले जमिनल, ब्रोमाइड आदि विषाक्त औषधियां देकर रोगी के मस्तिष्क स्नायुओं को चेतना शून्य कर देते हैं जिससे रोग के लक्षण दब जाते हैं किन्तु उसका समूल उपचार नहीं हो पाता। यह 10-20 वर्ष आयु के बच्चों को भी हो सकता है। रोगी 10 मिनट से 2-3 घंटे तक बेहोश रह सकता है।

यह अत्यधिक मानसिक या शारीरिक कार्य करने, सिर पर चोट, बहुत अधिक मदिरापान, तीव्र ज्वर, मैनिनजाइटिस, ब्रेन ट्यूमर, लकवा, ज्ञान तंत्रों में ग्लूकोज की कमी या आनुवंशिक, मस्तिष्क उतकों को आक्सीजन की पर्याप्त मात्रा न मिलने, स्त्रियों को मासिक धर्म में गड़बड़ी, मस्तिष्क कैंसर, पाचन तंत्र में खराबी, आंव, कृमि आदि कारणों से होता है।

प्राकृतिक चिकित्सा की दृष्टि से खान-पान जन्य विषैला द्रव्य शरीर में एकत्र हो जाने से यह होता है। इसके ऊपर वर्णित लक्षणों से सभी परिचित हैं। इसके दौरे की स्थिति में रोगी को हवा वाले स्थान पर दांई या बांई करवट लिटा दें, चेहरे पर पानी का छींटा मारें, दांतों के बीच कपड़ा या चम्मच रख दें जिससे जीभ न कटे, कुछ खिलाने-पिलाने का प्रयास न करें।

करे ये उपाय :-
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पानी में राई पीसकर सुंघाएं।

तुलसी के पतों के रस में सेंधा नमक मिलाकर नाक पर टपकाएं, तुलसी रस व कपूर सुंघाएं, लहसुन रस सुंघाएं, सीताफल (शरीफा) के पत्तों का रस नाक में डालें या आक के जड़ की छाल को बकरी के दूध में घिसकर रस को सुघाएं, होश आने पर नींबू रस व थोड़ा सा हींग दें।

लहसुन घी में भूनकर खिलाएं।

करौंदे के पत्तों की चटनी नित्य खिलाएं।

एक गिलास दूध में एक चम्मच  मेहंदी का रस मिलाकर पिलाएं।

सफेद प्याज के एक चम्मच रस को पानी में मिलाकर दैनिक पिलाएं। दौरा बंद होने पर बंद करें।

शहतूत व सेब रस में थोड़ी सी हींग मिलाकर पिलाएं।

गेहूं के आटे की रोटी चोकर समेत बनाएं व खाएं। भुनी अरहर, मूंग की दाल आहार में लें। आहार सादा सुपाच्य व सीमित मात्रा में हो रात को सोने से दो घण्टा पूर्व खाएं, फलों में आम, अंजीर, अनार, संतरा, सेब, नाशपाती, आडू व अनन्नास का सेवन करें। अंकुरित मोंठ, मूंग, दूध, दूध से बने पदार्थ नाश्ता में लें। मेवे में बादाम, काजू, अखरोट खाएं। भोजन के साथ गाजर का मुरब्बा, पुदीने की चटनी खाएं। लहसुन को तेल में सेंककर सुबह शाम खाएं व इसकी कच्ची कली तोड़कर (सूंघे) खीरा, मूली, प्याज, टमाटर, नींबू गाजर आदि का सलाद खाएं।

भारी गरिष्ठ,तले, मिर्च-मसालेदार, चटपटा भोजन न खाएं। वातकारक पदार्थ उड़द, राजमा, कचालू, गोभी, मसूर की दाल, चावल, बैंगन, मछली, मूली, मटर का सेवन अत्यंत कम करें उत्तेजक पदार्थ कड़क चाय, काफी, तम्बाकू, गुटखा, शराब, मांसाहारी भोजन, पिपरमेंट से दूर रहें। अधिक शीतल व अधिक उष्ण पदार्थों का सेवन न करें।

नियमित प्रात: शाम खुली हवा में घूमें। ढीला कपड़ा पहनें करवट व उत्तर दिशा में एक दो दिन मात्र फलों का सेवन करें। सिर कर लेटकर ही विश्राम करें। नींबू रस व शहद लें। पेट साफ रखें। शीर्षासन, सर्वांगासन करें। हल्का व्यायाम करें, बाथटब स्ान करें। ब्राह्मी घृत खाएं। सफेद प्याज की एक गांठ प्रति रात्रि कच्चा खाएं। रात्रि न जागें, बाल छोटे रखें, प्रसन्न रहें। सिर की मालिश मक्खन व बादाम तेल से करें। सिर व पेट पर मिट्टी लेप करें। स्ान करते समय कपाल व पेट पर पांच मिनट पानी की धार डालें।

क्या न करें :-
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रोगी को अकेले यात्रा करने न दें। अकेले सीढ़ी चढ़ने न दें। साइकिल या गाड़ी चलाने न दें। आग व पानी से दूर रखें, तनाव व क्रोध न दिलाएं, झगड़ा न करें। अधिक ऊंचाई पर न ले जाएं। मल मूत्र के वेग को न रोकें रात्रि भरपूर नींद लें करवट लेटें, सिर उत्तर दिशा में हो। ऐलोपैथिक, आयुर्वेदिक, यूनानी, होम्योपैथिक, बायोकेमिक आदि सभी उपचार विधियों में इसकी अनेक दवाएं हैं। इसकी एक्यूप्रेशर, सुजोक, चुम्बक, प्राकृतिक एवं योग में भी चिकित्सा की जाती है। योग्य चिकित्सक से चिकित्सा करा सकते हैं और स्वास्थ्य लाभ पा सकते हैं किन्तु सबसे आवश्यक है पथ्य, अपथ्य को जानना।

उपचार स्वास्थ्य और प्रयोग-

Friday, July 24, 2015

पीलिया क्या है .?

* जब भी रोगी का यह लगे कि उसका शरीर पीला हो रहा है तथा उसे पीलिया हो सकता है, तो वह पानी की मात्रा बढ़ा दे क्योंकि पानी की मात्रा कम होने पर शरीर से उत्सर्जित होने वाले तत्व रक्त में मिल जाते हैं। इससे व्यक्ति की हालत बिगडऩे लगती है।





* यदि कच्चा पपीता सलाद के रूप में लिया जाए तो भी पीलिया का असर कम होता है। कई लोग यह मानते हैं कि पीलिया के रोगी को मीठा नहीं खाना चाहिए जबकि आयुर्वेद चिकित्सक ऐसा नहीं मानते उनका कहना है कि पीलिया का रोगी गाय के दूध से बना पनीर व छेने का रसगुल्ला आराम से खा सकता है यह रोगी को कोई नुकसान नहीं बल्कि लाभ पहुंचाता है।

* पीलिया का आयुर्वेद में अचूक इलाज है। आयुर्वेद चिकित्सकों के अनुसार यदि मकोय की पत्तियों को गरम पानी में उबालकर उसका सेवन करें तो रोग से जल्द राहत मिलती है। मकोय पीलिया की अचूक दवा है और इसका सेवन किसी भी रूप में किया जाए स्वास्थ्य के लिए लाभदायक ही होता है।

एक और अजमाया हुआ प्रयोग:-
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सरसों के तेल की खली 100 ग्राम का चूर्ण बना लें इस चूर्ण की एक चम्मच मात्रा 100 ग्राम दही में मिलाकर सुबह 8-9 बजे लें स्वाद अनुसार नमक या चीनी भी डाल सकते है एक सप्ताह लगातार लेने से पीलिया मल मार्ग से बाहर निकल जायेगा..लेकिन  घी तेल में तली चीजो से 10 दिनो तक परहेज करें तो सच माने आपका पीलिया एक सप्ताह में पीलिया जड से समाप्त हो जायेगा-

अन्य उपाय :-
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* नाश्ते में अंगूर ,सेवफल पपीता ,नाशपती तथा गेहूं का दलिया लें । दलिया की जगह एक रोटी खा सकते हैं।

* मुख्य भोजन में उबली हुई पालक, मैथी ,गाजर , दो गेहूं की चपाती और ऐक गिलास छाछ लें।

* करीब दो बजे नारियल का पानी और सेवफल का जूस लेना चाहिये।

* रात के भोजन में एक कप उबली सब्जी का सूप , गेहूं की दो चपाती ,उबले आलू और उबली पत्तेदार सब्जी जैसे मेथी ,पालक ।

* रात को सोते वक्त एक गिलास मलाई निकला दूध दो चम्मच शहद मिलाकर लें।

* सभी वसायुक्त पदार्थ जैसे घी ,तेल , मक्खन ,मलाई कम से कम १५ दिन के लिये उपयोग न करें। इसके बाद थौडी मात्रा में मक्खन या जेतून का तैल उपयोग कर सकते हैं। प्रचुर मात्रा में हरी सब्जियों और फलों का जूस पीना चाहिेये। कच्चे सेवफल और नाशपती अति उपकारी फल हैं।

* दालों का उपयोग बिल्कुल न करें क्योंकि दालों से आंतों में फुलाव और सडांध पैदा हो सकती है। लिवर के सेल्स की सुरक्षा की दॄष्टि से दिन में 3-4 बार नीबू का रस पानी में मिलाकर पीना चाहिये।

* मूली के हरे पत्ते पीलिया में अति उपादेय है। पत्ते पीसकर रस निकालकर छानकर पीना उत्तम है। इससे भूख बढेगी और आंतें साफ होंगी।

* धनिया के बीज को रातभर पानी में भिगो दीजिये और फिर उसे सुबह पी लीजिये। धनिया के बीज वाले पानी को पीने से लीवर से गंदगी साफ होती है।

* एक गिलास पानी में एक बड़ा चम्मच पिसा हुआ त्रिफला रात भर के लिए भिगोकर रख दें। सुबह इस पानी को छान कर पी जाएँ। ऐसा 12 दिनों तक करें।

* जौ आपके शरीर से लीवर से सारी गंदगी को साफ करने की शक्‍ति रखता है।

* जब आप पीलिया से तड़प रहे हों तो, आपको गन्‍ने का रस जरुर पीना चाहिये। इससे पीलिया को ठीक होने में तुरंत सहायता मिलती है।

* गोभी और गाजर का रस बराबर मात्रा में मिलाकर एक गिलास रस तैयार करें। इस रस को कुछ दिनों तक रोगी को पिलाएँ।

* रोगी को दिन में तीन बार एक एक प्लेट पपीता खिलाना चाहिए।

* टमाटर पीलिया के रोगी के बहुत लाभदायक होता है। एक गिलास टमाटर के जूस में चुटकी भर काली मिर्च और नमक मिलाएं। यह जूस सुबह के समय लें। पीलिया को ठीक करने का यह एक अच्छा घरेलू उपचार है।

* टमाटर में विटामिन सी पाया जाता है, इसलिये यह लाइकोपीन में रिच होता है, जो कि एक प्रभावशाली एंटीऑक्‍सीडेंट हेाता है। इसलिये टमाटर का रस लीवर को स्‍वस्‍थ्‍य बनाने में लाभदायक होता है।

* इस रोग से पीड़ित रोगियों को नींबू बहुत फायदा पहुंचाता है। रोगी को 20 ml नींबू का रस पानी के साथ दिन में 2 से तीन बार लेना चाहिए।

* आमला मे भी बहुत सारा विटामिन सी पाया जाता है। आप आमले को कच्‍चा या फिर सुखा कर खा सकते हैं। इसके अलावा इसे लीवर को साफ करने के लिये जूस के रूप में भी प्रयोग कर सकते हैं।

* यह एक प्राकृतिक उपाय है जिसेस लीवर साफ हो सकता है। सुबह सुबह खाली पेट 4-5 तुलसी की पत्‍तियां खानी चाहिये।

* नीम के पत्तों को धोकर इनका रस निकाले। रोगी को दिन में दो बार एक बड़ा चम्मच पिलाएँ। इससे पीलिया में बहुत सुधार आएगा।

* पीलिया के रोगी को लहसुन की पांच कलियाँ एक गिलास दूध में उबालकर दूध पीना चाहिए , लहसुन की कलियाँ भी खा लें। इससे बहुत लाभ मिलेगा।

पीलिया में क्या करे परहेज:-
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* पीलिया के रोगियों को मैदा, मिठाइयां, तले हुए पदार्थ, अधिक मिर्च मसाले, उड़द की दाल, खोया, मिठाइयां नहीं खाना चाहिए।

* पीलिया के रोगियों को ऐसा भोजन करना चाहिए जो कि आसानी से पच जाए जैसे खिचड़ी, दलिया, फल, सब्जियां आदि।

उपचार स्वास्थ्य और प्रयोग -

What is jaundice.?

Whenever the patient took it that his body is yellow and the jaundice, it may increase the amount of water excreted from the body because the water content is low, the element gets in the blood. The person's condition does Bigdnhe.





* If raw papaya salad when taken as is also less affected by jaundice. Many believe that the jaundice patient should not eat sweet while Ayurveda practitioner will not accept it, they say, and whey cheese made from cow's milk jaundice patient could eat the dumpling comfort but it does no harm to the patient benefit Fires.

* Jaundice treatment in Ayurveda is unmistakable. According to Ayurveda practitioners consume the sap of the leaves boiled in hot water, so the disease is relieved soon. McCoy jaundice and the unmistakable drug abuse in any form, whether it is only beneficial to health.

Another experiment was Ajmaya: -
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Make the powder of 100 grams of mustard oil cake volume 100 g yogurt mixed with a teaspoon of this powder in the morning, take 8-9 hours a week to taste salt or sugar can also take persistent jaundice will get out of sewer. But fried in ghee oil visitation until 10 days avoided if you will accept jaundice jaundice Judd finished a week Jayega-

Other measures: -
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* Breakfast grapes, Sevfl papaya, and wheat groats Nashpti it. Can eat oatmeal instead of bread.

* In the main dining boiled spinach, Azadirachta, carrots, wheat bread and two glasses of buttermilk a guide it.

* About two o'clock coconut water and juices should Sevfl.

* Dinner, a cup of boiled vegetable soup, wheat two chapatis, boiled potatoes and boiled leafy vegetables like fenugreek, spinach.

* Rubbing out a glass of milk at bedtime, take two teaspoons of honey.

* All fatty foods such as butter, oil, butter, sour cream, do not use for at least 15 days. Then Thudi amount of butter or oil Zetoon can use. Chahieye abundant green vegetables and fruits juice drink. Raw Sevfl and Nashpti very helpful fruit.

* Do not just use pulses because pulses and Sdand ​​can cause swelling in the intestines. Protecting liver cells from the eye 3-4 times a day should drink lemon juice mixed with water.

* The green leaves of radish jaundice is the most viable. It is better to drink juice is extracted by grinding the leaves filter. This will increase hunger and bowel will be clean.

* Coriander seeds soaked in water overnight, please, and then take her morning drink. Coriander seeds, drinking water is clean dirt from the liver.

* A glass of water a tablespoon granulated triphala place for overnight soaking. Visit morning drink this water filter. Make it 12 days.

* Barley whole mess to clean up your body keeps power lever.

* If you're dying of jaundice, you should drink sugar cane juice must. This immediately helps to heal jaundice.

* Cabbage and carrot juice mixed in equal quantities, prepare a glass of juice. Pilaaa the juice for a few days the patient.

* Patients need to be fed three times a day a plate papaya.

* Tomatoes are very beneficial for patients of jaundice. A glass of tomato juice, add a pinch of pepper and salt. Take the juice in the morning. Jaundice is a good home remedies to fix it.

* Vitamin C is found in tomatoes, because it is rich in lycopene, a powerful antioxidant that Heata. Therefore tomato juice is beneficial in creating a healthy liver.

* The disease causes a lot of benefit to patients suffering from lime. The patient 20 ml lemon juice with water three times a day should be 2.

* Amla Vitamin C is found in a single lot. Amle you can eat raw or dried. In addition to cleaning up the lever can be used as juice.

* This is a natural remedy that can clear Jises lever. Early in the morning on an empty stomach should eat 4-5 basil leaves.

* Wash their juice extracted neem leaves. Pilaaa a tablespoon twice a day patient. This will greatly improve jaundice.

* Jaundice patients for five buds of garlic boiled in a glass of milk to drink milk, eat garlic buds too. Will benefit.

What to avoid jaundice: -
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* Jaundice patients flour, sweets, fried foods, more chili spices, urad dal, lost, should not eat sweets.

* Jaundice patients should food that is easily digestible such as cereal, oatmeal, fruits, vegetables.

Fitness health and exercise -

Tuesday, July 14, 2015

चिकनपॉक्स के लिए करे ये उपचार ....!

* इस समस्या में मरीज को तली-भुनी, खट्टी  नमक वाली चीजें खाने के लिए नहीं देनी चाहिए

* चिकनपॉक्स वेरीसेला जोस्टर नामक वायरस से होने वाली समस्या है। यह एक प्रकार का संक्रामक रोग है जो खांसने, छींकने, छूने या रोगी के सीधे संपर्क में आने से फैलता है।






* अधिकतर पीडित बच्चे नवजात से लेकर 10-12 साल की उम्र के बच्चों को चिकनपॉक्स की समस्या ज्यादा होती है लेकिन कई मामलों में ये इससे अधिक उम्र के लोगों को भी हो सकती है। 

* एक बार यह रोग होने और इसका पूरा इलाज लेने के बाद इसके दोबारा होने की आशंका कम हो जाती है लेकिन 50 वर्ष से अधिक आयु वाले लोगों को कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता के कारण यह बीमारी फिर से हो सकती है। इसके अलावा गर्भवती महिलाएं, कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले लोग, लंबे समय से किसी बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति और चिकनपॉक्स से पीडित मरीज के सीधे संपर्क में आने से भी यह रोग हो सकता है।

इसके क्या लक्षण है :-
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* सिरदर्द, बदनदर्द, बुखार, कमजोरी, भोजन में अरूचि, गले में सूखापन और खांसी आदि होने के बाद दूसरे दिन से ही त्वचा पर फुंसियां उभरने लगती हैं।

* डॉक्टरी सलाह भी जरूरी है क्युकि मरीज को यदि चिकनपॉक्स के साथ बैक्टीरिया का संक्रमण, मेनिनजाइटिस (दिमाग का बुखार), इनसेफिलाइटिस (दिमाग में सूजन), गुलेन बेरी सिंड्रोम (कमजोर इम्युनिटी से नर्वस सिस्टम का प्रभावित होना), निमोनिया, मायोकारडाइटिस (ह्वदय की मांसपेशियों को क्षति), किडनी और लिवर में संक्रमण हो जाए तो तुरंत डॉक्टर को दिखाना चाहिए वर्ना स्थिति गंभीर हो सकती है।

* आमतौर पर लोग इन्हें माता समझकर झाड़ा या घरेलू उपचार कराने लगते हैं जो कि गलत है। इसके लिए डॉक्टर को दिखाना जरूरी होता है। चिकनपॉक्स में शरीर पर उभरे दाने यानी पानी वाली फंसियां एंटीवायरल दवाओं और एहतियात बरतने से दो हफ्ते में ठीक होने लगती हैं। लेकिन ध्यान रहे कि मरीज के सीधे संपर्क मे आने वाले लोग स्वयं भी पूरी तरह से सावधानी बरतें।

* गर्मियों की शुरूआत से ही चिकनपॉक्स के वायरस ज्यादा सक्रिय हो जाते हैं और रोग का कारण बनते हैं। ऎसे में ज्यादा सावधानी बरतना जरूरी है।

कैसे बचाव करे :-
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* इससे बचाव के लिए बच्चों का समय-समय पर टीकाकरण होना चाहिए। ये वैक्सीनेशन दो डोज में दी जाती हैं। पहली डोज बच्चे के 12-15 माह के होने पर और दूसरी डोज 4-5 साल की उम्र में दी जाती है। बीमारी के दौरान मरीज को वेलसाइक्लोवीर और एसाइक्लोवीर जैसी एंटीवायरल दवाएं दी जाती हैं।

चिकनपॉक्स के मरीज की देखभाल:-
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* चिकनपॉक्स होने पर मरीज को अलग कमरे में रखें, उसके द्वारा इस्तेमाल की गई चीजों को घर के अन्य लोग प्रयोग में न लें। देखभाल करने वाले लोग मुंह पर मास्क लगाकर रखें। इस समस्या में डॉक्टर मरीज की स्थिति देखने के बाद ही उसे नहाने के निर्देश देते हैं। इस दौरान रोगी को ढीले और सूती कपड़े पहनाएं व इन्हें रोजाना बदल दें। 

* चिकनपॉक्स में मरीज को खट्टी, मसालेदार, तली-भुनी और नमक वाली चीजें खाने के लिए न दें क्योंकि इससे फुंसियो में खुजली बढ़ सकती है। उसके खाने में सूप, दलिया, खिचड़ी और राबड़ी जैसी हल्की व ठंडी चीजों को शामिल करें। बीमारी के बाद व्यक्ति कमजोरी महसूस करने लगता है जिसके लिए उसे पौष्टिक आहार, फल व जूस, दूध, दही, छाछ जैसे तरल पदार्थ दें।

* आयुर्वेद में चिकनपॉक्स को "लघुमसूरिका" कहते हैं। यह रोग शरीर की मेटाबॉलिक दर मे गड़बड़ी से होता है जिसके लिए संजीवनी और मधुरांतक वटी तुरंत राहत के लिए दी जाती है। गिलोय की 5-7 इंच लंबी बेल को कूटकर इसका रस निकाल लें या गर्म पानी में उबालकर, ठंडा होने पर इसे मसल लें और छानकर सुबह और शाम को प्रयोग करें।

* तुलसी के 5 पत्ते, 5 मुनक्का, 1 बड़ी पीपली (छोटे बच्चों को 1/4 पीपली व बड़े बच्चों को 1/2 पीपली) को कूटकर रस निकाल लें या सिल पर पीसकर पेस्ट बना लें। छोटे बच्चों को 1/2 चम्मच व बड़े बच्चों को एक चम्मच सुबह-शाम को दें।

* यदि फुंसियों में ज्यादा खुजली हो तो छोटे बच्चों को 1/4 चम्मच और बड़े बच्चों को 1/2 चम्मच हल्दी को 1/2 गिलास दूध में मिलाकर दिन मे दो बार देने से लाभ होगा। तुलसी के 5 पत्तों को चाय बनाते समय उबाल लें और छानकर पीने से दर्द, खुजली में राहत मिलती है।

* नीम की ताजा पत्तियों को मरीज के बिस्तर पर या आसपास रखने से कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। इसके अलावा मरीज को खाने में नमक वाली और गर्म चीजें देने की बजाय राबड़ी व ठंडे तरल पदार्थ दें।

उपचार स्वास्थ्य और प्रयोग-

Wednesday, July 01, 2015

नजला,जुकाम,खांसी, दमा,खरार्टे के लिए चिकित्सा.....!


हम आपके लिए एक देशी दवा लाये है :-
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* जौ (Barley) एक किस्म का अनाज होता है जो कुछ कुछ गेहूं जैसा दिखता है। बाजार से लगभग 250 ग्राम जौ ले आएँ। ध्यान रहे कि इसमे घुन न लगा हुआ हो। इसे साफ कर ले। मंद मंद आग पर कड़ाही मे डाल कर भून ले। ध्यान रहे कि जले नहीं। इसके बाद इसे मोटा मोटा कूट/ पीस ले। जरूरत के समय 1 बड़ा चम्मच जौ का चूर्ण लेकर उसमे 1 छोटा चम्मच देशी घी मिला कर तेज गरम तवे पर या तेज गरम लोहे की कड़छी मे डाल कर इसका धुआँ नाक से या मुँह से खींचें। यदि लकड़ी के जलते हुए कोयले पर डाल कर धुआँ खींचे तो और भी अधिक लाभदायक है। धुआँ लेने के 15 मिनट पहले और 2 घंटे बाद तक ठंडा पानी न पिए। प्यास लगे तो गरम दूध पिए।

* यदि बार बार मुँह सूखता हो और प्यास लगती हो तो ये प्रयोग न करें।

* नए जुकाम मे जब सिर भारी हो और नाक बंद तब यह प्रयोग करें और चमत्कार देखें। 5 मिनट मे फायदा होगा।

* खांसी, दमे मे इन्हेलर कि तरह तत्काल फायदा दिखता है।

* यही खर्राटे मे प्रतिदिन ये धुआँ लें। सुबह शाम किसी भी समय ले सकते हैं।

* इसका कोई साइड इफेक्ट नहीं। बच्चों और गर्भवती महिलाओं के लिए भी सुरक्षित।

* अन्य दवाओं के साथ भी इसका प्रयोग किया जा सकता है। बदलते मौसम मे स्वस्थ भी प्रयोग करें ताकि नजले जुकाम से बच सकें। दिन मे 4 बार तक प्रयोग कर सकते हैं। एक समय मे 4 बड़े चम्मच जौ घी मिला कर प्रयोग कर सकते हैं यदि बार बार मुँह सूखता हो और प्यास लगती हो तो ये प्रयोग न करें।

उपचार स्वास्थ और प्रयोग-

Saturday, June 27, 2015

टिनिटस क्या है जाने लक्षण एवं उपचार....!

* ये एक अजीब सी बीमारी है जिसके अंतर्गत कानों के अंदर बिना किसी वजह के एक आवाज़ गूंजती रहती है। यह कोई आम समस्या नहीं है। यह कोई बीमारी नहीं है बल्कि किसी बीमारी का लक्षण है। यह रक्तवाहिनियों की समस्या या उम्र के साथ सुनने की शक्ति क्षीण पड़ने से जोड़ी जा सकती है। लोग टिनिटस से काफी परेशान रहते हैं क्योंकि इससे सुनने की क्षमता पर असर पड़ता है जो कि हमारे जीवन का काफी महत्वपूर्ण भाग है। इसके बावजूद टिनिटस कोई बड़ी समस्या नहीं है। उम्र के साथ लोगों के सुनने की क्षमता कम होती जाती है। कुछ उपचारों की मदद से आप इसे ठीक कर सकते हैं।

टिनिटस के लक्षण:-
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* आसपास किसी भी तरह की आवाज़ ना होते हुए भी आपके कानों में किसी आवाज़ का गूंजना ही टिनिटस कहलाता है।

इसके कुछ लक्षण हैं:-
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सिसकारी

दहाड़

कानबजना

आवाज़गूंजना

* स्थिति के गंभीर होने के मुताबिक़ कान में आवाज़ का गूंजना कम या ज़्यादा हो सकता है। कुछ लोगों को ये आवाज़ें एक कान में ही सुनाई देती है तो कुछ को दोनों कानों में। कुछ लोगों को ये आवाज़ें इतनी तेज़ सुनाई देती है कि वो असली आवाज़ ही नहीं सुन पाते। कुछ लोगों के लिए यह समस्या अस्थायी रूप से परेशान करने वाली होती है और अन्य लोगों को काफी दिनों तक ये समस्या सताती है।

टिनिटस के प्रकार:-
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व्यक्तिपरक टिनिटस:-
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* यह एक ख़ास प्रकार का टिनिटस होता है जिसमें आप सुन सकते हैं। ज़्यादातर लोग इस प्रकार के टिनिटस से जूझते हैं। इस प्रकार के टिनिटस का मुख्य कारण कान के अंदरूनी, बाहरी तथा मध्य भाग में समस्या होना है। अगर आप सुनने की नसों में आई समस्याओं से परेशान हैं तो आपको व्यक्तिपरक टिनिटस की समस्या है।

वस्तुगत टिनिटस:-
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* यह टिनिटस काफी कम लोगों में पाया जाता है तथा सिर्फ डॉक्टर ही जांच के दौरान इसे सुन सकते हैं। इस प्रकार के टिनिटस का मुख्य कारण खून की धमनियों में किसी प्रकार की कोई समस्या है। यह अंदरूनी हड्डियों की कोई समस्या मांसपेशियों में मरोड़ की परेशानी हो सकती है।

टिनिटस के कारण:-
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* तेज़ आवाज़ों के संपर्क में रहना

* आमतौर पर फैक्ट्री में भारी उपकरणों की आवाज़ से काफी शोर पैदा होता है। इसके अलावा गाने बजाने के तमाम उपकरण काफी शोर पैदा करते हैं। अगर आप इनमें से किसी चीज़ के संपर्क में हैं तो आपको टिनिटस होने की संभावना काफी ज़्यादा है।

कान की हड्डियों में परिवर्तन:-
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* अगर आपके कान की हड्डी कान के बीच में कड़ी हो रही है तो इससे आपके सुनने की क्षमता पर असर पड़ता है। यह हड्डियों के अतिरिक्त रूप से बढ़ने की वजह से भी होती है जिसका कारण आनुवांशिक हो सकता है।

उम्र आधारित समस्या:-
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* उम्र बढ़ने के साथ शरीर में कई समस्याएं आती हैं। सुनने की क्षमता क्षीण होने का उम्र के साथ भी सम्बन्ध हो सकता है। इससे टिनिटस की समस्या भी हो सकती है। ६० साल की उम्र से यह समस्या शुरू हो सकती है।

इसका एक चिकित्सकीय नाम भी है – प्रेस्बाईक्यूसिस।

कान में वैक्स जमा होना:-
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* कानों का मोम कानों में गन्दगी एवं बैक्टीरिया जाने से रोकता है। पर कभी कभी अतिरिक्त मात्रा में मोम हमारे कानों में एकत्रित हो जाता है। ऐसे में भी टिनिटस की समस्या हो सकती है।

टिनिटस का उपचार:-
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* बार-बार दवाई बदलना कई बार दवाइयों के साइड इफ़ेक्ट से भी टिनिटस होता है, अतः अपनी दवाइयों को कम बदलें।

* कान का मोम निकालें अगर आपके कान में काफी मोम जम गया है तो इसे निकालना आवश्यक है। परन्तु इसके लिए हेयर पिन का प्रयोग न करें क्योंकि इससे कानों को हानि पहुँच सकती है।

* कान ढकने का यंत्र आप अब कानों को स्वस्थ रखने के लिए कान ढकने के मास्क का प्रयोग कर सकते हैं। इसको पहनने के बाद आपको बाहरी शोर का सामना नहीं करना पडेगा।

* वाइट नॉइज़ मशीन ये ऐसे यंत्र होते हैं जो पर्यावरण सम्बन्धी आवाज़ निकालते हैं जैसे समुद्र की लहरें और बारिश। यह टिनिटस का काफी महत्वपूर्ण उपचार है।

उपचार स्वास्थ्य और प्रयोग-

Thursday, May 28, 2015

भूंख न लगना भी एक समस्या है करे ये प्रयोग ....!

* आजकल भूख न लगने की समस्या एक गंभीर रोग की तरह होने लगी है, और लोग भूख बढ़ाने के लिए तरह तरह के सप्लीमेंटस लेने लगते हैं जो शरीर और स्वास्थ दोनों के लिए खतरनाक है।









* पाचन तंत्र में किसी गड़बड़ी के कारण भोजन न पचने को अजीर्ण या अपच कहते हैं | कई बार समय-असमय भोजन करने से,कभी-भी,कहीं-भी,कुछ-भी खाने-पीने तथा बार-बार खाते रहने से पहले खाया हुआ भोजन ठीक से पच नहीं पाता है और दूसरा भोजन पेट में पहुँच जाता है | ऐसे में पाचनतंत्र भोजन को पूर्ण रूप से नहीः पचा पाता जो अजीर्ण का मुख्य कारण है | अधिक तला-भुना या मिर्च मसाले युक्त भोजन के सेवन से भी अजीर्ण या अपच हो जाता है | इस रोग में रोगी को भूख नहीं लगती,खट्टी डकारें आती हैं,छाती में तेज़ जलन होती है,पेट में भारीपन महसूस होता है तथा बैचैनी सी होती रहती है |

* अनियमित दिनचर्या व खान-पान के कारण कब्ज व एसिडिटी की समस्या हो जाती है। ऐसे में इन प्रॉब्लम्स के कारण धीरे-धीरे भूख कम होने लगती है। भूख कम होने से शरीर को पर्याप्त व जरूरी आहार नहीं मिल पाता, जिसके कारण अन्य रोग होने की आशंका बढ़ जाती है। अगर आप भी भूख न लगने या कम भूख लगने की समस्या से परेशान हैं.

भूख न लगने को कारण:-
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* अधिक चटपटे और फास्ट फूड़ का सेवन करना।
* जरूरत से ज्यादा मीठा अपने खाने में करना।
* चाय व काॅफी का सेवन ज्यादा करना।
* अचार और खट्टा भोजन करना।
* रात में देर तक जागना।
* ज्यादा तेल, घी में तले भोजन का सेवन करना।
* किसी के ख्यालों में खोये रहना।
* शाररिक श्रम न करना।

 * ये मुख्य कारण होते हैं भूख न लगने के। आखिर कौन से उपाय हैं जो आपकी भूख की क्षमता को बढ़ायेगें।

आप आजमाए ये नुस्खे:-
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* एक गिलास गर्म पानी में खाने वाले सोड़े की आधी चम्मच मिलाकर पीते रहें, एैसा करने से ज्लद ही भूख न लगने की समस्या दूर होगी। भूंख लगना शुरू होने पे बंद कर दे .

* यदि भूख कम लगती है तो आप अदरक, नींबू, भुना जीरा और काला नमक को मिलाकर चटनी बनायें और इसका सेवन करें।

* सलाद में अदरक के छोटे-छोटे टुकड़ों को काटकर उन पर नमक और नीबू  लगाकर इसे खाना खाते समय जरूर खायें। यह आपकी भूख की क्षमता को बढ़ायेगा।

* 30 ग्राम पानी में हरे धनिये का रस मिलाकर रोज पीते रहने से थोड़े ही दिनों में भूख न लगने की बीमारी दूर होने लगती है।

* अजवायन -200 ग्राम , हींग -4 ग्राम और कालानमक -20 ग्राम को एक साथ पीसकर चूर्ण बना लें | यह चूर्ण 2 -2 ग्राम की मात्रा में सुबह -शाम गुनगुने पानी से खाने से लाभ होता है |

* मेथी को पीस कर चूर्ण बना लें | इस चूर्ण को दिन में तीन बार 1-1 चम्मच गर्म पानी से खाने से अपच , पेटदर्द व भूख न लगना आदि दूर होता है |

* अजवाइन को सेकें और उसे पीसकर उसका चूर्ण बनायें फिर उसमें थोड़ा सा नमक मिलाकर खाना खाने के बाद एक चुटकी मुंह में रखें। यह भूख बढ़ाने का कारगर वैदिक उपाय भी है।

* भोजन करने से पहले यदि आप 1 चम्मच अदरक का रस और 1 चम्मच नींबू का रस और थोड़ा-सा काला नमक को पानी में घोलकर पीतें रहना चाहिए।

* काली मिर्च को पीसकर चूर्णं बनायें और उसमें थोड़ा नमक मिलाकर मूली पर लगायें, और इसे भोजन के समय खायें।

* हरड़ , पिप्पली व सौंठ बराबर मात्रा में लेकर चूर्ण बना लें | यह चूर्ण 3 -3 ग्राम दिन में दो बार , पानी के साथ सेवन करने से अजीर्ण में लाभ होता है |

* अनार, मैथी, पपीता, बेर, अमरूद, चावल आदि को अपने भोजन में किसी न किसी तरह लेते रहें।

* धनिये, नींबू और अदरक की मिक्स चटनी बनायें और इसे डेली अपने खाने में इस्तेमाल करने से भूख बढ़ती है।

* रात में सोते समय आंवला 3 भाग, हरड़ 2 भाग तथा बहेड़ा 1 भाग बारीक चूर्ण करके एक चम्मच गुनगुने पानी के साथ लेने से सुबह पेट साफ हो जाता है और भूख खुलकर लगती है।

* खाना खाने के बाद अजवाइन का चूर्ण थोड़े से गुड़ के साथ खाकर गुनगुना पानी पीने से भोजन आसानी से पच जाता है व नियत समय पर भूख लगती है और खाने में रुचि पैदा होती है।

* भोजन के एक घंटा पहले एक चम्मच पंचसकार चूर्ण गर्म पानी के साथ लेने से भूख खुलकर लगती है।

* छाछ गरिष्ठ वस्तुओं को पचाने में बहुत लाभकारी होता है | छाछ में सेंधा नमक , भुना जीरा तथा कालीमिर्च मिलाकर सेवन करने से अजीर्ण रोग दूर होता है |

इन उपायों को करने से आपकी भूख न लगने की समस्या दूर होगी।
उपचार स्वास्थ्य और प्रयोग -

Saturday, May 16, 2015

एक जादू है किशमिश जाने इसके फायदे ......!

* किशमिश एक  खट्टा-मीठा ड्रायफूट है जो अंगुर को सुखाकर तैयार किया जाता है। इसमें भी अंगूर के सारे गुण विद्यमान होते हैं। दूध के लगभग सभी तत्त्व किशमिश में पाए जाते हैं। दूध के अभाव में इसका उपयोग किया जा सकता है। किशमिश दूध की अपेक्षा जल्दी पचती है।

* मुनक्के के नित्य सेवन से थोड़े ही दिनों में रस, रक्त, शुक्र आदि धातुओं तथा ओज की वृद्धि होती है।


* वृद्धावस्था में किशमिश या मुनक्के का प्रयोग न केवल स्वास्थ्य की रक्षा करता है बल्कि आयु को बढ़ाने में भी सहायक होता है।

* माना जाता है कि किसी भी रोगी के लिए ये विशेष रूप से लाभदायक होती है। अंगूर को जब विशेषरूप से सुखाया जाता है तब उसे किशमिश कहते हैं.  यह दो प्रकार का होता है, लाल और काला. किशमिश खाने से खून बनता है, वायु दोष दूर होता है, पित्त दूर होता है, कफ दूर करता है

* कई रोगों में इसका उपयोग औषधि की तरह भी किया जा सकता है आइए जाने मुनक्का के कुछ ऐसे ही औषधिय प्रयोगों के बारे में:-

* आंखों की ज्योति बढाने, नाखूनों की बीमारी होने पर, सफेद दाग, महिलाओं में गर्भाशय की समस्या में अंगूर लाभप्रद होते हैं। इन समस्याओं में मुनक्का को दूध में पकाकर थोड़ा घी व मिश्री मिलाकर पीने से फायदा होता है। जितना पच सके उतने मुनक्का रोज खाने से सातों धातुओं का पोषण होता है।मुनक्का 12 नग, छुहारा पांच नग, छह नग फूल मखाना दूध में मिलाकर खीर बनाकर सेवन करने से शरीर पुष्ट होता है।जिनका ब्लडप्रेशर कम रहता है, उन्हें हमेशा अपने पास नमक वाले मुनक्का रखना चाहिए। यह ब्लडप्रेशर को सामान्य करने का सबसे आसान उपाय है।

* एक मुनक्का का बीज निकालकर उसमें लहसुन की एक कली रखकर खाने से हाईब्लडप्रेशर में आराम मिलता है। प्रतिदिन सोने से एक घंटा पहले दूध में उबाली गई 11 मुनक्का खूब चबा-चबाकर खाएं और दूध को भी पी लें। इस प्रयोग से कब्ज की समस्या में तत्काल फायदा होता है।

* रात में लगभग 10 या 12 मुनक्का को धोकर पानी में भिगो दें। इसके बाद सुबह उठकर मुनक्का के बीजों को निकालकर इन मुनक्का को अच्छी तरह से चबाकर खाने से शरीर में खून बढ़ता है। भूख न लगती हो तो बराबर मात्रा में मुनक्का (बीज निकाल दें), हरड़ और चीनी को पीसकर चटनी बना लें। इसे पांच ग्राम की मात्रा में (एक छोटा चम्मच), थोड़ा शहद मिला कर खाने से पहले दिन में दो बार चाटें।रोजाना मुनक्का का दूध उबालकर उसमें घी व मिश्री डालकर पीने से वजन बढ़ता है।

* जिनके गले में निरंतर खराश रहती है या नजला एलर्जी के कारण गले में तकलीफ बनी रहती है, सुबह-शाम दोनों वक्त चार- पांच मुनक्का को बीज सहित खूब चबाकर खा लें, लेकिन ऊपर से पानी ना पिएँ। दस दिनों तक निरंतर ऐसा करें। दस मुनक्का एक अंजीर के साथ सुबह पानी में भिगोकर रख दें।रात में सोने से पहले मुनक्का और अंजीर को दूध के साथ उबालकर इसका सेवन करें। ऐसा तीन दिन करें। कितना भी पुराना बुखार हो, ठीक हो जाएगा।

* जब किशमिश को खाई जाती है तो यह पेट में जा कर पानी को सोख लेती हैं। जिस वजह से यह फूल जाती है और कब्ज में राहत दिलाती है।

* हर मेवे की तरह किशमिश भी वजन बढाने में मददगार साबित होती है क्योंकि इसमें फ्रकटोज़ और ग्लूकोज़ पाया जाता है जिससे एनर्जी मिलती है। अगर आपको भी अपना वजन बढाना है और वो भी कोलेस्ट्रॉल बढाए बिना तो आज से ही किशमिश खाना शुरु कर दें।

* जब खून में एसिड बढ जाता है तो यह परेशानी पैदा हो जाती है। इसकी वजह से स्किन डिज़ीज, फोडे़, गठिया, गाउट, गुर्दे की पथरी, बाल झड़ने, हृदय रोग, ट्यूमर और यहां तक कि कैंसर होने की संभावना पैदा हो जाती है। किशमिश में अच्छी मात्रा में पोटैशियम और मैगनीशियम पाया जाता है जिसको खाने से अम्लरक्तता की परेशानी दूर हो जाती है।

* किशमिश में भारी मात्रा में आयरन होता है जो कि सीधे एनीमिया से लड़ने की शक्ति रखता है। खून को बनाने के लिये विटामिन बी कॉमप्लेक्स की जरुरत को भी यही किशमिश पूरी करती है। कॉपर भी खून में लाल रक्त कोशिका को बनाने का काम करता है।

* किशमिश में मौजूद फिनॉलिक पायथोन्यूट्रियंट जो कि जर्मीसाइडल, एंटी बॉयटिक और एंटी ऑक्सीडेंट तत्वों की वजह से जाने जाते हैं, बैक्टीरियल इंफेक्शन तथा वाइरल से लड़ कर बुखार को जल्द ठीक कर देते हैं।

* दिलाये शराब के नशे से छुटकारा- शराब पीने की इच्छा हो तब शराब की जगह 10 से 12 ग्राम किशमिश चबा-चबाकर खाते रहें या किशमिश का शरबत पियें। शराब पीने से ज्ञानतंतु सुस्त हो जाते हैं परंतु किशमिश के सेवन से शीघ्र ही पोषण मिलने से मनुष्य उत्साह, शक्ति और प्रसन्नता का अनुभव करने लगता है। यह प्रयोग प्रयत्नपूर्वक करते रहने से कुछ ही दिनों में
शराब छूट जायेगी।

* यौन दुर्बलता की समस्या के लिये रोजाना किशमिश खाएं क्योंकि यह कामेच्छा को प्रोत्साहित करती है। तथा इसमें मौजूद अमीनो एसिड, यौन दुर्बलता को दूर करता है। इसीलिये तो शादी-शुदा जोडों को पहली रात दूध का गिलास दिया जाता है जिसमें किशमिश और केसर होता है।

* हड्डी की मजबूती बढ़ाये -किशमिश में बोरोन नामक माइक्रो न्यूट्रियंट पाया जाता है जो कि हड्डी को कैल्शियम सोखने में मदद करता है। बोरोन की वजह से ऑस्टियोप्रोसिस से बडी़ राहत मिलती है साथ ही किशमिश खाने से घुटनों की भी समस्या नहीं पैदा होती।

* इसमें एंटी ऑक्सीडेंट प्रोपर्टी पाई जाती है, जो कि आंखों की फ्री रैडिकल्स से लड़ने में मदद करता है। किशमिश खाने से कैटरैक, उम्र बढने की वजह से आंखों की कमजोरी, मसल्स डैमेज आदि नहीं होता। इसमें विटामिन ए, ए-बीटा कैरोटीन और ए-कैरोटीनॉइड आदि होता है, जो कि आंखों के लिये अच्छा होता है।

* * आपको अक्सर चक्कर आते हैं, कमजोरी महसूस होती है तो हो सकता है कि आप लो ब्लड प्रेशर के शिकार हों। ज्यादा मानसिक तनाव, कभी क्षमता से ज्यादा शारीरिक काम करने से अक्सर लोगों में लो ब्लडप्रेशर की शिकायत होने लगती है। कुछ लोग इसे नजरअन्दाज कर देते हैं तो कुछ लोग डॉक्टर के यहां चक्कर लगाकर परेशान हो जातें हैं। लेकिन आयुर्वेद में लो ब्ल्डप्रेशर को कन्ट्रोल करने के लिए कारगर इलाज है वो है किशमिश।

* नीचे बताई जा रही विधि को लगातार 32 दिनों तक प्रयोग में लाने से आपको कभी भी लो ब्लड प्रेशर की शिकायत नहीं होगी।

* आप 32 किशमिश लेकर एक चीनी के बाउल में पानी में डालकर रात भर भिगोएं। सुबह उठकर भूखे पेट एक-एक किशमिश को खूब चबा-चबा कर खाएं,पूरे फायदे के लिए हर किशमिश को बत्तीस बार चबाकर खाएं। इस प्रयोग को नियमित बत्तीस दिन करने से लो ब्लडप्रेशर की शिकायत कभी नहीं होगी।

विशेष-जिसको लो बी पी की शिकायत हो और अक्सर चक्कर आते हों तो आवलें के रस में शहद मिलाकर चाटने से जल्दी आराम होता है।
उपचार स्वास्थ्य और प्रयोग -

Thursday, March 12, 2015

क्या है दर्द से निजात पाने का एक सरल उपाय......!

* हमारे बहुत से आदरणीय वृद्धजनों को हाथ, पैर,घुटने एवं अन्‍य प्रकार के दर्द रहता है। और दु:ख तो तब और बढ़ जाता है जब कोई सेवा करने वाला न हो।

* तो हम आपको दर्द से निजात पाने का एक सरल उपाय हम आपको बताते हैं। इस नुस्‍खे का उपयोग कर आप अवश्‍य दर्द से कुछ हद तक तथा शनै: शनै: बहुत हद तक छुटकारा प्राप्‍त कर सकते हैं।




दर्द में ये तेल घरपर बनाकर लगाएं और देखें कमाल:-
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* अगर आप जोड़ो के दर्द,पसलियों के दर्द या ठंड में किसी अन्य तरह के दर्द से परेशान हैं तो अजवाइन से बेहतर कोई औषधि नहीं है। अजवाइन को आयुर्वेद में कई बीमारियों की एक दवा माना गया है। अजवाइन गैस व कफ के रोगों को दूर करनेवाली है, दर्द, वायुगोला आदि रोगों का नाश करती है।

* आचार्य चरक के अनुसार अजवाइन दर्द को मिटाने वाली व भूख बढ़ाने वाली है।

* आचार्य सुश्रुत ने अजवाइन को दर्द निवारक व पाचक माना है। प्रसूता स्त्री के शरीर पर अजवाइन का चूर्ण मलने से प्रसव के कारण हुई शारीरिक पीड़ा दूर हो जाती है।

* कैसा भी जोड़ो का दर्द हो अगर उस पर अजवाइन का तेल बनाकर लगाया जाए तो दर्द में बहुत जल्दी राहत मिलती है।

आप इसे केसे बनाये :-
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सामग्री:-
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अजवाइन का तेल- 10 ग्राम

पिपरमेंट- 10 ग्राम

 कपूर-20 ग्राम

* सभी चीजे आपको आयुर्वेदिक जड़ी बूटी का सामान बेचने वाले पंसारी से मिल जायेगी .

विधि:-
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* अब आप इन तीनों चीजों को मिलाकर एक बोतल में भर दें। कुछ देर में सब एक में घुल मिल  जाएगा तथा छ: घण्‍टे बाद प्रयोग में लावें। बीच-बीच में बोतल को हिला दें।

* दर्द या कमरदर्द या पसलीदर्द, सिरदर्द आदि में तुरंत लाभ पहुंचाने वाली औषधि है। इसकी कुछ बूंदे मलिए, दर्द छूमंतर हो जाएगा। अजवाइन के तेल की मालिश करने से जोड़ों का दर्द जकडऩ तथा शरीर के अन्य भागों पर भी मलने से दर्द में राहत मिलती है।

Wednesday, January 07, 2015

पथरी का उपचार -

किडनी में स्टोन किडनी में स्‍टोन की समस्‍या आजकल आम हो चली है। इसकी बड़ी वजह खान-पान की गलत आदतें होती हैं। किडनी में स्‍टोन यूरीन सिस्टम का एक रोग है जिसमें किडनी के अन्दर छोटे-छोटे पत्थर जैसी कठोर वस्तुएं बन जाती हैं।


आमतौर से 30 से 60 वर्ष के आयु के व्यक्तियों में पाई जाती है और स्त्रियों की अपेक्षा पुरूषों में चार गुना अधिक पाई जाती है। बच्चों और वृद्धों में मूत्राशय की पथरी ज्यादा बनती है, जबकि वयस्को में अधिकतर गुर्दो और मूत्रवाहक नली में पथरी बन जाती है। आज भारत के प्रत्येक 2000 परिवारों में से एक परिवार इस पीड़ादायक स्थिति से पीड़ित है, लेकिन सबसे दु:खद बात यह है कि इनमें से कुछ प्रतिशत रोगी ही इसका इलाज करवाते हैं। जिन मरीजों को मधुमेह की बीमारी है उन्हें गुर्दे की बीमारी होने की काफी संभावनाएं रहती हैं। अगर किसी मरीज को रक्तचाप की बीमारी है तो उसे नियमित दवा से रक्तचाप को नियंत्रण करने पर ध्यान देना चाहिए क्योंकि अगर रक्तचाप बढ़ता है, तो भी गुर्दे खराब हो सकते हैं।



किसी पदार्थ के कारण जब मूत्र सान्द्र (गाढ़ा) हो जाता है तो पथरी निर्मित होने लगती है। इस पदार्थ में छोटे छोटे दाने बनते हैं जो बाद में पथरी में तब्दील हो जाते है। इसके लक्षण जब तक दिखाई नहीं देते तब तक ये मूत्रमार्ग में बढ़ने लगते है और दर्द होने लगता है। इसमें काफी तेज दर्द होता है जो बाजू से शुरु होकर उरू मूल तक बढ़ता है।



रोजाना भोजन करते समय उनमें जो कैल्शियम फॉस्फेट आदि तत्व रह जाते हैं, पाचन क्रिया की विकृति से इन तत्वों का पाचन नहीं हो पाता है। वे गुर्दे में एकत्र होते रहते हैं। कैल्शियम, फॉस्फेट के सूक्ष्म कण तो मूत्र द्वारा निकलते रहते हैं, जो कण नहीं निकल पाते वे एक दूसरे से मिलकर पथरी का निर्माण करने लगते हैं। पथरी बड़ी होकर मूत्र नली में पहुंचकर मूत्र अवरोध करने लगती है। तब तीव्र पीड़ा होती है। रोगी तड़पने लगता है। इलाज में देर होने से मूत्र के साथ रक्त भी आने लगता है जिससे काफी पीड़ा होती है। तथा लंबे समय तक पाचन शक्ति ठीक न रहने और मूत्र विकार भी बना रहे तो गुर्दों में कुछ तत्व इकट्ठे होकर पथरी का रूप धारण कर लेते हैं।



किसी प्रकार से पेशाब के साथ निकलने वाले क्षारीय तत्व किसी एक स्थान पर रुक जाते है,चाहे वह मूत्राशय हो,गुर्दा हो या मूत्रनालिका हो,इसके कई रूप होते है,कभी कभी यह बडा रूप लेकर बहुत परेशानी का कारक बन जाती है,पथरी की शंका होने पर किसी प्रकार से इसको जरूर चैक करवा लेना चाहिये ! नए वैज्ञानिक अध्ययनों के आधार पर चिकित्सा विशेषज्ञों ने आशंका व्यक्त की है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण किडनी में पथरी की समस्या में आम तौर पर तेजी से वृद्धि होगी। कुछ खास क्षेत्रों में यह समस्या बहुत तेजी से बढ़ेगी।



पीठ के निचले हिस्से में अथवा पेट के निचले भाग में अचानक तेज दर्द, जो पेट व जांघ के संधि क्षेत्र तक जाता है। दर्द फैल सकता है या बाजू, श्रोणि, उरू मूल, गुप्तांगो तक बढ़ सकता है, यह दर्द कुछ मिनटो या घंटो तक बना रहता है तथा बीच-बीच में आराम मिलता है। दर्दो के साथ जी मिचलाने तथा उल्टी होने की शिकायत भीहो सकती है। यदि मूत्र संबंधी प्रणाली के किसी भाग में संक्रमण है तो इसके लक्षणों में बुखार, कंपकंपी, पसीना आना, पेशाब आने के साथ-साथ दर्द होना आदि भी शामिल हो सकते हैं ; बार बार और एकदम से पेशाब आना, रुक रुक कर पेशाब आना, रात में अधिक पेशाब आना, मूत्र में रक्त भी आ सकता है। अंडकोशों में दर्द, पेशाब का रंग असामान्य होना। गुर्दे की पथरी के ज्यादातर रोगी पीठ से पेट की तरफ आते भयंकर दर्द की शिकायत करते हैं। यह दर्द रह-रह कर उठता है और कुछ मिनटो से कई घंटो तक बना रहता है इसे ”रीलन क्रोनिन” कहते हैं। यह रोग का प्रमुख लक्षण है, इसमें मूत्रवाहक नली की पथरी में दर्दो पीठ के निचले हिस्से से उठकर जांघों की ओर जाता है।



सबसे आम पथरी कैल्शियम पथरी है। पुरुषों में, महिलाओं की तुलना में दो से तीन गुणा ज्यादा होती है। सामान्यतः 20 से 30 आयु वर्ग के पुरुष इससे प्रभावित होते है। कैल्शियम अन्य पदार्थों जैसे आक्सलेट(सबसे सामान्य पदार्थ) फास्फेट या कार्बोनेट से मिलकर पथरी का निर्माण करते है। आक्सलेट कुछ खाद्य पदार्थों में विद्यमान रहता है। पुरुषों में यूरिक एसिड पथरी भी सामान्यतः पाई जाती है। किस्टिनूरिया वाले व्यक्तियों में किस्टाइन पथरी निर्मित होती है। महिला और पुरुष दोनों में यह वंशानुगत हो सकता है। मूत्रमार्ग में होने वाले संक्रमण की वजह से स्ट्रवाइट पथरी होती है जो आमतौर पर महिलाओं में पायी जाती है। स्ट्रवाइट पथरी बढ़कर गुर्दे, मूत्रवाहिनी या मूत्राशय को अवरुद्ध कर सकती है।



वैसे तो आमतौर पर यह ये पथरियां यूरीन के रास्ते शरीर से बाहर निकाल जाती है। पर बहुत से ऐसे घरेलू उपाय है जिनको अपनाकर इनसे निजात पाई जा सकती है।



जाने ऐसे ही कुछ घरेलू उपायों के बारे में:-
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करेला वैसे तो बहुत कड़वा होता है और आमतौर पर लोग इसे कम पसंद करते है। परन्‍तु पथरी में यह #रामबाण की तरह काम करता है। करेले में मैग्‍नीशियम और फॉस्‍फोरस नामक तत्‍व होते हैं, जो पथरी को बनने से रोकते हैं। अंगूर अंगूर में एल्ब्यूमिन और सोडियम क्लोराइड बहुत ही कम मात्रा में होता हैं, इसलिए किडनी में स्‍टोन के उपचार के लिए बहुत ही उत्तम माना जाता है। साथ ही अंगूर प्राकृतिक मूत्रवर्धक के रूप में उत्कृष्ट रूप में कार्य करता है क्योंकि इनमें पोटेशियम नमक और पानी भरपूर मात्रा में होते हैं।






केला भी पथरी की समस्‍या से निपटने के लिए एक उपाय है -केला खाना चाहिए क्‍योंकि इसमें विटामिन बी 6 होता है। विटामिन बी 6 ऑक्जेलेट क्रिस्टल को बनने से रोकता और तोड़ता है। साथ ही विटामिन बी-6, विटामिन बी के अन्य विटामिन के साथ सेवन करना किडनी में स्‍टोन के इलाज में काफी मददगार होता है। एक शोध के मुताबिक विटामिन-बी की 100 से 150 मिलीग्राम दैनिक खुराक गुर्दे की पथरी की चिकित्सीय उपचार में बहुत फायदेमंद हो सकता है।




नींबू का रस और जैतून का तेल नींबू का रस और जैतून के तेल का मिश्रण, गुर्दे की पथरी के लिए सबसे प्रभावी प्राकृतिक उपचार में से एक है। पत्‍थरी का पहला लक्षण होता है दर्द का होना। दर्द होने पर 60 मिली लीटर नींबू के रस में उतनी ही मात्रा में आर्गेनिक जैतून का तेल मिला कर सेवन करने से आराम मिलता है। नींबू का रस और जैतून का तेल पूरे स्वास्थ्य के लिए अच्छा रहता है और आसानी से उपलब्ध भी हो जाता हैं।




बथुए का साग किडनी में स्‍टोन को निकालने में बथुए का साग बहुत ही कारगर होता है। इसके लिए आप आधा किलो बथुए के साग को उबाल कर छान लें। अब इस पानी में जरा सी काली मिर्च, जीरा और हल्‍का सा सेंधा नमक मिलाकर, दिन में चार बार पीने से बहुत ही फायदा होता है।





प्‍याज प्‍याज में पथरी नाशक तत्‍व होते है इसका प्रयोग कर आप किडनी में स्‍टोन से निजात पा सकते है। लगभग 70 ग्राम प्‍याज को पीसकर और उसका रस निकाल कर पियें। सुबह खाली पेट प्‍याज के रस का नियमित सेवन करने से पथरी छोटे-छोटे टुकडे होकर निकल जाती है।









अजवाइन एक महान यूरीन ऐक्ट्यूऐटर है और किडनी के लिए टॉनिक के रूप में काम करता है। किडनी में #स्‍टोन के गठन को रोकने के लिए अजवाइन का इस्‍तेमाल मसाले के रूप में या चाय में नियमित रूप से किया जा सकता है।








गाजर में पायरोफॉस्फेट अम्ल पाया जाता हैं जो किडनी में स्‍टोन बनने की प्रक्रिया को रोकता है। साथ ही गाजर में पाया जाने वाला केरोटिन यूरीन की आंतरिक दीवारों को टूटने-फूटने से भी बचाता है।



गाजर व मूली के बीज 10-10 ग्राम, गोखरू 20 ग्राम, जवाखार और हजरुल यहूद 5-5 ग्राम, इन सबको कूट-पीसकर महीन चूर्ण कर लें। असकी 3-3 ग्राम की पुड़िया बना लें। एक खुराक 6 बजे, दूसरी खुराक 8 बजे और तीसरी शाम 4 बजे दूध-पानी की लस्सी के साथ लें .










तुलसी की चाय समग्र किडनी स्वास्थ्य के लिए बहुत ही सफल प्राकृतिक उपचार है। यह किडनी में स्‍टोन के उपचार के लिए एक आदर्श समाधान है। शुद्ध तुलसी का रस लेने से पथरी को यूरीन के रास्‍ते निकलने में मदद मिलती है। कम से कम एक म‍हीना तुलसी के पतों के रस के साथ शहद लेने से आप प्रभाव महसूस कर सकते है। साथ ही आप तुलसी के कुछ ताजे पत्तों को रोजाना चबा भी सकते हैं।
अनार का रस किडनी में स्‍टोन के खिलाफ एक बहुत ही अद्भुत और सरल घरेलू उपाय है। अनार के कई स्‍वास्‍थ्‍य लाभ के अलावा इसके बीज और रस में खट्टेपन और कसैले गुण के कारण इसे किडनी में स्‍टोन के लिए एक और प्राकृतिक उपाय के रूप में माना जाता है।


आयुर्वेद व घरेलू चिकित्सा में किडनी की पथरी में कुलथी को फायदेमंद माना गया है। गुणों की दृष्टि से कुल्थी पथरी एवं शर्करानाशक है। वात एवं कफ का शमन करती है और शरीर में उसका संचय रोकती है। कुल्थी में पथरी का भेदन तथा मूत्रल दोनों गुण होने से यह पथरी बनने की प्रवृत्ति और पुनरावृत्ति रोकती है। इसके अतिरिक्त यह यकृत व पलीहा के दोष में लाभदायक है।



250 ग्राम कुल्थी कंकड़-पत्थर निकाल कर साफ कर लें। रात में तीन लिटर पानी में भिगो दें। सवेरे भीगी हुई कुल्थी उसी पानी सहित धीमी आग पर चार घंटे पकाएं। जब एक लिटर पानी रह जाए (जो काले चनों के सूप की तरह होता है) तब नीचे उतार लें। फिर तीस ग्राम से पचास ग्राम (पाचन शक्ति के अनुसार) देशी घी का उसमें छोंक लगाएं। छोंक में थोड़ा-सा सेंधा नमक, काली मिर्च, जीरा, हल्दी डाल सकते हैं। पथरीनाशक औषधि तैयार है।

आप दिन में कम-से-कम एक बार दोपहर के भोजन के स्थान पर यह सारा सूप पी जाएं। 250 ग्राम पानी अवश्य पिएं। एक-दो सप्ताह में गुर्दे तथा मूत्राशय की पथरी गल कर बिना ऑपरेशन के बाहर आ जाती है, लगातार सेवन करते रहना राहत देता है।यदि भोजन के बिना कोई व्यक्ति रह न सके तो सूप के साथ एकाध रोटी लेने में कोई हानि नहीं है। गुर्दे में सूजन की स्थिति में जितना पानी पी सकें, पीने से दस दिन में गुर्दे का प्रदाह ठीक होता है। यह कमर-दर्द की भी रामबाण दवा है। कुल्थी की दाल साधारण दालों की तरह पका कर रोटी के साथ प्रतिदिन खाने से भी पथरी पेशाब के रास्ते टुकड़े-टुकड़े होकर निकल जाती है। यह दाल मज्जा (हड्डियों के अंदर की चिकनाई) बढ़ाने वाली है।



कुल्थी के अलावा खीरा, तरबूज के बीज, खरबूजे के बीज, चौलाई का साग, मूली, आंवला, अनन्नास, बथुआ, जौ, मूंग की दाल, गोखरु आदि खाएं। कुल्थी के सेवन के साथ दिन में 6 से 8 गिलास सादा पानी पीना, खासकर गुर्दे की बीमारियों में बहुत हितकारी सिद्ध होता है।



पालक, टमाटर, बैंगन, चावल, उड़द, लेसदार पदार्थ, सूखे मेवे, चॉकलेट, चाय, मद्यपान, मांसाहार आदि। मूत्र को रोकना नहीं चाहिए। लगातार एक घंटे से अधिक एक आसन पर न बैठें। कुल्थी का पानी विधिवत लेने से गुर्दे और मूत्रशय की पथरी निकल जाती है और नयी पथरी बनना भी रुक जाता है। किसी साफ सूखे, मुलायम कपड़े से कुल्थी के दानों को साफ कर लें। किसी पॉलीथिन की थैली में डाल कर किसी टिन में या के मर्तबान में सुरक्षित रख लें।



कुल्थी का पानी केसे बनाये - किसी कांच के गिलास में 250 ग्राम पानी में 20 ग्राम कुल्थी डाल कर ढक कर रात भर भीगने दें। प्रात: इस पानी को अच्छी तरह मिला कर खाली पेट पी लें। फिर उतना ही नया पानी उसी कुल्थी के गिलास में और डाल दें, जिसे दोपहर में पी लें। दोपहर में कुल्थी का पानी पीने के बाद पुन: उतना ही नया पानी शाम को पीने के लिए डाल दें।



इस प्रकार रात में भिगोई गई कुल्थी का पानी अगले दिन तीन बार सुबह, दोपहर, शाम पीने के बाद उन कुल्थी के दानों को फेंक दें और अगले दिन यही प्रक्रिया अपनाएं। महीने भर इस तरह पानी पीने से गुर्दे और मूत्राशय की पथरी धीरे-धीरे गल कर निकल जाती है।



साथ ही अगर आप कुल्थी के पानी के साथ हिमालय ड्रग कंपनी की सिस्टोन की दो गोलियां दिन में 2-3 बार प्रतिदिन लेने से शीघ्र लाभ होता है। कुछ समय तक नियमित सेवन करने से पथरी टूट-टूट कर बाहर निकल जाती है। यह मूत्रमार्ग में पथरी, मूत्र में क्रिस्टल आना, मूत्र में जलन आदि में दी जाती है।

Monday, December 22, 2014

वीर्य के सम्बंध में गलत धारणाए.....!


* बहुत से लोगों को वीर्य के संबंध में गलत धारणाएं हो जाती हैं। वैसे देखा जाए तो सेक्स से संबंधित बहुत सारे रोग तो ऐसे होते हैं जो गलत धारणाएं तथा भम्र के कारण ही उत्पन्न होते हैं। लेकिन वीर्य से संबंधित रोगों के होने की समस्या और भी गंभीर होती है। सेक्स के बारे में जिन लोगों को ठीक प्रकार से ज्ञान नहीं होता है, उन युवकों को सेक्स से संबंधित कई प्रकार के रोग हो जाते हैं और वे ही इनसे अधिक प्रभावित होते हैं।




* कुछ लोग तो ऐसे भी होते हैं जो सेक्स से संबंधित सामान्य रोग के लक्षणों तथा परिवर्तनों को गंभीर समस्या अथवा रोग मान बैठते हैं और व्यर्थ की चिंता में परेशान होने लगते हैं। ऐसे लोग इन कारणों से मुक्ति पाने के लिए वैद्यों, नीम-हकीमों के चक्कर में फंसकर अपना धन बर्बाद कर बैठते हैं। इन लोगों को सेक्स के बारे में पुराने और अधकचरे ज्ञान के चलते अनेक विद्वान समझे जाने वाले लोग भी इस बारे में किशोर तथा युवा को वास्तविक जानकारी दे पाने में असफल रहते हैं।

* आज बहुत से ऐसे झूठे वैद्य तथा नीम-हकीमों ने युवा तथा किशोर वर्ग के लोगों को डराने के लिए यह बात फैला रखी है कि वीर्य का निर्माण व्यक्ति के खून से होता है और 40 बूंद खून से मात्र एक बूंद वीर्य बनता है जो व्यक्ति हस्तमैथुन द्वारा वीर्य का नाश करते हैं या जो स्वप्नदोष जैसी समस्या से ग्रस्त हों, उसमें खून की कमी हो जाती है, यह कमी कई प्रकार के रोगों को पैदा कर देती है, सबसे बड़ी समस्या यह बतायी जाती है कि शरीर में खून की कमी के कारण कमजोरी आ जाती है जिससे व्यक्ति की कामशक्ति भी प्रभावित हो जाती है। यह सभी प्रकार की धारणाएं गलत हैं। क्योंकि सामान्य प्रकार से सेक्स संबंधों में स्खलन होने पर वीर्य की मात्रा लगभग आधे से एक चम्मच होती ही है। ऐसे झूठे तथा ढोंगी वैद्यों तथा नीम-हकीमों की बातों को झूठा साबित करने के लिए नीचे गणित की भाषा के अनुसार दिया जा रहा है, इसे ध्यान से देखें:-

1 बूंद वीर्य = 40 बूंद खून

16 बूंद वीर्य= 1 मिली. खून

हम जानते हैं कि एक बार संभोग करने पर लगभग 48 बूंद वीर्य स्खलन होता है।

तब

50 बूंद वीर्य= 3 मि.ली. खून

50 बूंद वीर्य×40 बूं. खून=2000 बूंद रक्त

2000/16=125 मि. ली. खून

अब इस भ्रम को आधार मानकर चलते हैं तो 40 बूंद खून से 1 बूंद वीर्य बनता है तो एक बार के स्खलन के बाद 120 मि.ली. खून नष्ट हो जाता है। हम सभी जानते हैं कि विवाह के पहले के दिनों में लगभग सभी विवाहित व्यक्ति औसतन प्रतिदिन एक बार शारीरिक संबंध जरूर बनाता है।

इस आधार पर गणित से यह हल निकलता है कि –

1 महीने में शारीरिक संबंध = 30 बार।

30×120 मि.ली.=3600 मि.ली. खून।

*वैज्ञानिक जांच के अनुसार यह पता चलता है कि शरीर में खून की कुल मात्रा लगभग साढ़े तीन लीटर होती है। इस आधार पर यह गणित मान लीजिए की ठीक है तो विवाह के एक महीने के बाद सभी विवाहित पुरुषों को मर जाना चाहिए क्योंकि रक्त के बिना तो व्यक्ति जीवित रह नहीं सकता है। यहां पर ऐसे झूठे तथा ढोंगी वैद्यों तथा नीम-हकीमों की बात पूरी तरह से झूठ साबित होती है। 


* आज हम सभी जानते हैं कि विवाह के बाद सभी पुरुष ज्यादा प्रसन्न तथा तरोताजा दिखाई देते हैं। इसका मुख्य कारण संभोग को माना गया है। अच्छे तथा संतुष्टपूर्वक संबंध बनाने से व्यक्ति में नयी ऊर्जा का संचार होता है। इसके अलावा एक बात और ध्यान देने योग्य है कि यदि रक्त से ही वीर्य का निर्माण होता तो फिर स्त्रियों में वीर्य का निर्माण क्यों नहीं होता ? और हम सभी को पता है कि स्त्रियों में भी रक्त का संचार होता ही है। प्रकृति ने स्त्री एवं पुरुषों को अलग-अलग प्रकार की विशेषताएं प्रदान की हैं। इसलिए स्त्रियों में वीर्य का निर्माण नहीं होता है। वीर्य केवल पुरुष की जननेन्द्रियों का स्राव मात्र है जिसका प्रमुख कार्य शुक्राणुओं को प्रजनन के लिए योनि मार्ग से गर्भाशय मुख तक ले जाना होता है

Sunday, December 21, 2014

क्या है थायराइड की वजह ....!


थायराइड मानव शरीर मे पाए जाने वाले एंडोक्राइन ग्लैंड में से एक है। थायरायड ग्रंथि गर्दन में श्वास नली के ऊपर एवं स्वर यन्त्र के दोनों ओर दो भागों में बनी होती है। इसका आकार तितली जैसा होता है। यह थाइराक्सिन नामक हार्मोन बनाती है जिससे शरीर के ऊर्जा क्षय, प्रोटीन उत्पादन एवं अन्य हार्मोन के प्रति होने वाली संवेदनशीलता नियंत्रित होती है।
यह ग्रंथि शरीर के मेटाबॉल्जिम को नियंत्रण करती है यानि जो भोजन हम खाते हैं यह उसे उर्जा में बदलने का काम करती है।
* इसके अलावा यह हृदय, मांसपेशियों, हड्डियों व कोलेस्ट्रोल को भी प्रभावित करती है।
*आमतौर पर शुरुआती दौर में थायराइड के किसी भी लक्षण का पता आसानी से नहीं चल पाता, क्योंकि गर्दन में छोटी सी गांठ सामान्य ही मान ली जाती है। और जब तक इसे गंभीरता से लिया जाता है, तब तक यह भयानक रूप ले लेता है।
*आखिर क्या कारण हो सकते है जिनसे थायराइड होता है।
* थायरायडिस- यह सिर्फ एक बढ़ा हुआ थायराइड ग्रंथि (घेंघा) है, जिसमें थायराइड हार्मोन बनाने की क्षमता कम हो जाती है।
* इसोफ्लावोन गहन सोया प्रोटीन, कैप्सूल, और पाउडर के रूप में सोया उत्पादों का जरूरत से ज्यादा प्रयोग भी थायराइड होने के कारण हो सकते है।
* कई बार कुछ दवाओं के प्रतिकूल प्रभाव भी थायराइड की वजह होते हैं।
* थायराइट की समस्या पिट्यूटरी ग्रंथि के कारण भी होती है क्यों कि यह थायरायड ग्रंथि हार्मोन को उत्पादन करने के संकेत नहीं दे पाती।
* भोजन में आयोडीन की कमी या ज्यादा इस्तेमाल भी थायराइड की समस्या पैदा करता है।
* सिर, गर्दन और चेस्ट की विकिरण थैरेपी के कारण या टोंसिल्स, लिम्फ नोड्स, थाइमस ग्रंथि की समस्या या मुंहासे के लिए विकिरण उपचार के कारण।
* जब तनाव का स्तर बढ़ता है तो इसका सबसे ज्यादा असर हमारी थायरायड ग्रंथि पर पड़ता है। यह ग्रंथि हार्मोन के स्राव को बढ़ा देती है।
* यदि आप के परिवार में किसी को थायराइड की समस्या है तो आपको थायराइड होने की संभावना ज्यादा रहती है। यह थायराइड का सबसे अहम कारण है।
* ग्रेव्स रोग थायराइड का सबसे बड़ा कारण है। इसमें थायरायड ग्रंथि से थायरायड हार्मोन का स्राव बहुत अधिक बढ़ जाता है। ग्रेव्स रोग ज्यादातर 20और 40 की उम्र के बीच की महिलाओं को प्रभावित करता है, क्योंकि ग्रेव्स रोग आनुवंशिक कारकों से संबंधित वंशानुगत विकार है, इसलिए थाइराइड रोग एक ही परिवार में कई लोगों को प्रभावित कर सकता है।
* थायराइड का अगला कारण है गर्भावस्था, जिसमें प्रसवोत्तर अवधि भी शामिल है। गर्भावस्था एक स्त्री के जीवन में ऐसा समय होता है जब उसके पूरे शरीर में बड़े पैमाने पर परिवर्तन होता है, और वह तनाव ग्रस्त रहती है।
* रजोनिवृत्ति भी थायराइड का कारण है क्योंकि रजोनिवृत्ति के समय एक महिला में कई प्रकार के हार्मोनल परिवर्तन होते है। जो कई बार थायराइड की वजह बनती है।
*थायराइड के लक्षण:--
कब्ज- थाइराइड होने पर कब्ज की समस्या शुरू हो जाती है। खाना पचाने में दिक्कत होती है। साथ ही खाना आसानी से गले से नीचे नहीं उतरता। शरीर के वजन पर भी असर पड़ता है।
हाथ-पैर ठंडे रहना- थाइराइड होने पर आदमी के हाथ पैर हमेशा ठंडे रहते है। मानव शरीर का तापमान सामान्य यानी 98.4 डिग्री फॉरनहाइट (37 डिग्री सेल्सियस) होता है, लेकिन फिर भी उसका शरीर और हाथ-पैर ठंडे रहते हैं।
प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होना- थाइराइड होने पर शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता कम़जोर हो जाती है। इम्यून सिस्टम कमजोर होने के चलते उसे कई बीमारियां लगी रहती हैं।
थकान– थाइराइड की समस्या से ग्रस्त आदमी को जल्द थकान होने लगती है। उसका शरीर सुस्त रहता है। वह आलसी हो जाता है और शरीर की ऊर्जा समाप्त होने लगती है।
त्वचा का सूखना या ड्राई होना– थाइराइड से ग्रस्त व्यक्ति की त्वचा सूखने लगती है। त्वचा में रूखापन आ जाता है। त्वचा के ऊपरी हिस्से के सेल्स की क्षति होने लगती है जिसकी वजह से त्वचा रूखी-रूखी हो जाती है।
जुकाम होना– थाइराइड होने पर आदमी को जुकाम होने लगता है। यह नार्मल जुकाम से अलग होता है और ठीक नहीं होता है।
डिप्रेशन- थाइराइड की समस्या होने पर आदमी हमेशा डिप्रेशन में रहने लगता है। उसका किसी भी काम में मन नहीं लगता है, दिमाग की सोचने और समझने की शक्ति कमजोर हो जाती है। याद्दाश्त भी कमजोर हो जाती है।
बाल झड़ना- थाइराइड होने पर आदमी के बाल झड़ने लगते हैं तथा गंजापन होने लगता है। साथ ही साथ उसके भौहों के बाल भी झड़ने लगते है।
मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द- मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द और साथ ही साथ कमजोरी का होना भी थायराइड की समस्या के लक्षण हो सकते है।
शारीरिक व मानसिक विकास- थाइराइड की समस्या होने पर शारीरिक व मानसिक विकास धीमा हो जाता है।
अगर आपको ऐसे कोई भी लक्षण दिखाई दे तो तुरन्त अपने डाक्टर से संपर्क करें आपको थाइराइड समस्या हो सकती है।
साथ ही आप ALOEVERA GEL (जूस) का सेवन करें….साथ ही तुलसी व गिलोय को खली पेट लेना शुरू करे लाभ होगा

बड़ी तोंद नहीं चाहते हैं तो नमक कम खाइए....!


बढ़ते मोटापे से देश में सभी परेशान हैं। जिसे देखो बाहर निकले पेट से परेशान है। पेट का बाहर निकल आना न सिर्फ भद्दा लगता है, बल्कि कई बीमारियों को न्यौता देने वाला भी साबित हो सकता है। लेकिन, अब आपको परेशान होने की जरूरत नहीं। वैज्ञानिकों ने इसका उपाय खोज लिया है। एक स्वास्थ्य विशेषज्ञ के अनुसार, प्रतिदिन अपने भोजन में नमक की मात्रा घटाकर और पोटैशियम से भरपूर फाइबर युक्त भोजन खाकर हम तोंद से बच सकते हैं।

* अमेरिका के वॉशिंगटन में डाइजेस्टिव सेंटर की स्थापना करने वाले गैस्ट्रोइंट्रोलॉजिस्ट रॉबिन चुटकन ने अपनी नई पुस्तक में कहा है कि पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं में तोंद निकलने की शिकायत अधिक होती है। इसका मुख्य कारण यह है कि औरतों के आंत की लंबाई अधिक होती है।

* वेबसाइट फीमेलफस्र्ट डॉट को डॉट यूके के अनुसार, चुटकन ने अपनी इस नई पुस्तक में बताया है कि महिलाओं एवं पुरुषों के पाचन तंत्र में कुछ मूल अंतर होते हैं। इसलिए पेट को निकलने से बचाने के लिए कुछ परहेज बरते जाने चाहिए।
नमक कम खाएंः भोजन में नमक का अधिक प्रयोग करने से भी पेट फूल सकता है। एक दिन में अधिकतम 1,500 मिलीग्राम नमक ही खाना चाहिए।

* अधिकतर रेशेयुक्त भोजन लेंः घुलनशील एवं अघुलनशील रेशेयुक्त भोजन की मिश्रित मात्रा का प्रयोग करना चुस्त-दुरुस्त एवं छरहरा रहने का सबसे अच्छा तरीका है। पेट के अत्यधिक भरे होने से बचें, क्योंकि इससे कब्ज होती है।

* पोटैशियम से भरपूर भोजन लेंः सोडियम चूंकि शरीर में जल के स्तर को बनाए रखता है, वहीं पोटैशियम अतिरिक्त जल से निजात दिलाने में मददगार होता है। केले और शकरकंद जैसे पोटैशियम से भरपूर खाद्य पदार्थ का सेवन करने से कमर के मध्य हिस्से को पतला करने में मदद मिलती है।

* शरीर में पानी की मात्रा बरकरार रखेंः पर्याप्त मात्रा में पानी का सेवन करने से भोजन के रेशे अपना कार्य कहीं बेहतर तरीके से कर पाते हैं और कब्ज की शिकायत को दूर रखते हैं।


* पाचन के तनाव से बचेंः ऐसे खाद्य पदार्थों से दूर रहें जो पचने में मुश्किल हों, जैसे चीनी या वसायुक्त खाद्य पदार्थ।

* कृत्रिम मिठास वाले पदार्थों से बचेंः फ्लेवर्ड पेय पदार्थों, कम कार्बाेहाइड्रेट वाले एवं चीनी रहित खाद्य पदार्थों को हमारा शरीर आसानी से नहीं पचा पाता। बड़ी आंत में पाए जाने वाले जीवाणु उन्हें फर्मेंट करने की कोशिश करते हैं, जिसके कारण पेट में गैस बनती है और पेट फूल जाता है।

दही खाएं पेट के रोग भगाएं.....!


भारतीय संस्कृति में चिरकाल से दही की महत्ता को स्वीकार किया गया है। यज्ञ, हवन, विवाह संस्कार तथा मंदिरों में प्रसाद आदि के मांगलिक अवसरों पर दही का प्रयोग होता रहा है। आज भी शुभ कार्य के लिए जाते समय घर के बुजुर्ग दही या गुड़ खाकर जाने को कहते हैं। दही को सेहत के लिए बहुत अच्छा माना जाता है।

* इसमें कुछ ऐसे रासायनिक पदार्थ होते हैं, जिसके कारण यह दूध की अपेक्षा जल्दी पच जाता है। जिन लोगों को पेट की परेशानियां जैसे- अपच, कब्ज, गैस बीमारियां घेरे रहती हैं, उनके लिए दही या उससे बनी लस्सी, म-ा, छाछ का उपयोग करने से आंतों की गरमी दूर हो जाती है। डाइजेशन अच्छी तरह से होने लगता है और भूख खुलकर लगती है। 

दही के फायदे --
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* अमेरिका के आहार विशेषज्ञों ने निष्कर्ष निकाला है कि दही के नियमित सेवन से आंतों के रोग और पेट की बीमारियां नहीं होती हैं तथा कई प्रकार के विटामिन बनने लगते हैं। दही में जो बैक्टीरिया होते हैं, वे लेक्टेज बैक्टीरिया उत्पन्न करते हैं।

* मोटापा कम करने के लिए दही प्रभावशाली है। 

* दही में हृदय रोग, हाई ब्लड प्रेशर और गुर्दों की बीमारियों को रोकने की अद्भुत क्षमता है। यह हमारे रक्त में बनने वाले कोलेस्ट्रोल नामक घातक पदार्थ को बढऩे से रोकता है, जिससे वह नसों में जमकर ब्लड सर्कुलेशन को प्रभावित न करे और हार्टबीट सही बनी रहे। 

* दही में कैल्शियम की मात्रा अधिक पाई जाती है, जो हमारे शरीर में हड्डियों का विकास करती है। दांतों एवं नाखूनों की मजबूती एवं मांसपेशियों के सही ढंग से काम करने में भी सहायक है। 

ये रोग हो तो दही खाएं --
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* पेट में गड़बड़ हो, पतले दस्त हों तो दही के साथ ईसबगोल की भूसी लें। दही के साथ चावल खाएं। 

* बवासीर के रोगियों को चाहिए कि दोपहर में भोजन के बाद एक गिलास छाछ में अजवायन डालकर पीएं। 

* पेट के रोगियों को चाहिए कि ज्वार की रोटी के साथ दही लें। दही का सेवन भुने हुए जीरे व सेंधा नमक के साथ करें। 

* दही में शहद मिलाकर चटाने से छोटे बच्चों के दांत आसानी से निकलते हैं। 

* मुंह के छालों में दही कम करने के लिए दिन में कई बार दही की मलाई लगाएं। इसके अलावा शहद व दही की समान मात्रा मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से मुंह के छाले दूर हो जाते हैं। 

* दही के सेवन से शरीर की फालतू चर्बी कम करने में सहायता मिलती है। 

* गर्मी के मौसम में दही की छाछ या लस्सी बनाकर पीने से पेट की गर्मी शांत हो जाती है। इसे पीकर बाहर निकलें तो लू लगने का डर भी नहीं रहता है। 

* दुबले व्यक्तियों को चाहिए कि दही में किशमिश, बादाम, छुहारा आदि मिलाकर पीएं। इससे वजन बढ़ता है। 

* दही में नींबू का रस मिलाकर चेहरे, गर्दन, कोहनी, एड़ी, हाथों पर लगाएं। कुछ देर बाद कुनकुने पानी से धो डालें। 

* बालों को सुंदर, स्वस्थ व नीरोग रखने के लिए बालों को धोने के लिए दही या छाछ का प्रयोग करना चाहिए क्योंकि दही में वे सब तत्व मौजूद रहते हैं, जिनकी बालों को आवश्यकता रहती है। स्नान से पूर्व दही को बालों में डालकर अच्छी तरह मालिश करें ताकि बालों की जड़ों तक दही पहुंच जाए। कुछ समय बाद बालों को धो दें। दही के प्रयोग से खुश्की, रूसी व फियास समाप्त हो जाती है। 

* दही को जीरे व हींग का छौंक लगाकर खाने से जोड़ों के दर्द में लाभ पहुंचता है। यह स्वादिष्ट और पौष्टिक होता है। 

* गर्मी के दिनों में पसीना काफी निकलता है। पसीने की बदबू दूर करने के लिए दही और बेसन मिलाकर शरीर पर मालिश करें तथा कुछ देर बाद स्नान करें, इससे पसीने की बदबू दूर हो जाती है। 

* नींद न आने से परेशान रहने वाले लोगों को दही व छाछ का सेवन करना चाहिए। 

सावधानियां --
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* सायंकालीन भोजन व रात्रि में दही का सेवन नहीं करें। 
* विद्यार्थियों को परीक्षा के दिनों में दही का सेवन कम मात्रा में करना चाहिए। जिन छात्रों को दोपहर व सायंकाल परीक्षा का समय    हो तो विशेष सावधानी रखना चाहिए। दही आलस्य लाता है। 
* खट्टा दही सेवन न करें। ताजे दही का प्रयोग करें। 
* सर्दी, खांसी, अस्थमा के रोगियों को भी दही से परहेज करना चाहिए।