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Tuesday, September 22, 2015

दांत दर्द या मुहं की बदबू -

दांत एवं मुख समस्या से पीड़ित व्यक्ति का जीवन कष्टमय होता है -उसे कुछ भी अच्छा नहीं लगता है -आपके जीवन में ये दन्त-मंजन एक नवीन संचार भर देगा-







बड़ी इलायची के बीज-10 ग्राम

लवंग-10 ग्राम


दाल चीनी-10 ग्राम


काली मिर्च-10 ग्राम


नौसादर -10 ग्राम


भुनी हुयी फिटकरी-10 ग्राम


काला नमक -30 ग्राम


माजूफल -10 ग्राम


इन सबको कूट पीस करले और अंत में कपूर की टिक्की पीश कर इसमें मिक्स करके छान कर एक सीसी जिसमे हवा प्रवेश न कर सके रख ले अगर किसी को दांत में ठंडा या गर्म लग रहा हो या फिर दांत में दर्द हो या मुख से बदबू आती हो तो दिन में २ बार दन्त मंजन करने से कुछ ही दिन में ठीक हो जायेगा तथा किसी दवा की आवश्यकता नहीं होगी।

उपचार और प्रयोग-

Monday, September 14, 2015

आँखों की समस्याओं और नेत्रज्योति-वृद्धि -

कान के पीछे गाय के घी की हल्के हाथ से रोजाना कुछ देर मालिश करे |



पद्मासन, सिद्धासन, वज्रासन में या कुर्सी पर आराम से बैठ जायें | रीढ़ की हड्डी, गला व सिर को सीधा रखें | आँखों के बराबर ऊँचाई पर रखे दीपक की ज्योति को एक मिनट तक एकटक देखें | फिर आँखों को एकाध मिनट बंद रखे | यह क्रिया 5 बार दोहरायें | इससे एकाग्रता व नेत्रज्योति दोनों में वृद्धि होती है | ये मेरा आजमाया हुआ एक ख़ास प्रयोग है जिसको जीवन में हमने अपनाया है और आज भी मेरी आँखे स्वास्थ है -

आँखों को स्वच्छ जल से धोकर नेत्रबिंदु डालें |

ॐ... ॐ.....मम आरोग्यशक्ति जाग्रय –जाग्रय’ अथवा ‘ॐ...ॐ.... मेरी आरोग्यशक्ति जाग्रत हो, जाग्रत हो ‘ – ऐसा कहते हुए या चितन करते हुए हाथों की हथेलियाँ आपस में रगडकर आँखों पर रखें | मौका मिले तो आँखों की पुतलियों को गोल घुमायें, फिर दायीं ओर व उसके बाद बायीं ओर ले जायें | सुबह मुँह में एक कुल्ला पानी भर लें, फिर कटोरी में थोडा पानी भर के उसमें आँखें डुबाकर पटपटायें, जिससे आँखों व् सिर की गर्मी निकल जाए | इससे सिरदर्द में आराम व नेत्रज्योति में वृद्धि होती है |

नेत्र –सुरक्षा व नेत्रज्योति-वृद्धि के लिये ध्यान रक्खे-

अपनी आँखों को सीधी धूप से बचायें |

सुबह-सुबह नंगे पैर हरी घास पर चलें |

भोजन में हरी पत्तेदार सब्जियाँ, ताजे फल व दूध का पर्याप्त मात्रा में सेवन करें |

जितना भी हो सके रात्रि-जागरण से बचे |

Monday, August 31, 2015

आँख-कान-नाक के रोगों उपचार -

नज़र की कमज़ोरी के लिए पचास ग्राम काला सुरमा, प्याज़ के पाँच सौ ग्राम रस में खरल करके, छानकर शीशी में भर लें। इस सुरमे की एक-एक सलाई, सुबह-शाम आँख में लगाएं। यह नज़र की कमज़ोरी के अलावा धुंध, जाला, रोहे आदि में भी कारगर है।


आँखों की गुहेरी, रतौंधी व मोतियाबिंद के लिए :-
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आँख की फुंसी (गुहेरी) के उपचार के लिए आम के पेड़ से पत्ता तोड़ने पर जो रस निकलता है, सावधानी पूर्वक उसे गुहेरी पर लगा लें। दो-तीन दिन उस गुहेरी वाली जगह पर कालापन रहेगा, पर बाद में ठीक हो जाएगा।


रतौंधी (रात में न दिखाई पड़ना) में नीम की दस ताजा पत्तियां, बीस ग्राम गुड़ मिलाकर सुबह खाली पेट और रात में सोते समय खाएं। पन्द्रह दिन सेवन करने से लाभ मिलता है।


काली मिर्च को दही में पीसकर आँखों में लगाएं। रतौंधी में उपयोगी है।


मोतियाबिंद होने पर सफेद फिटकरी लगभग पैंतीस ग्राम, नीला थोथा आधा ग्राम और छोटी इलायची लगभग साढ़े पांच ग्राम-तीनों को खूब बारीक पीसकर कपड़छन कर लें और फिर एक 750 मिली. वाली बोतल में डालकर, बोतल को गंगा जल से भरकर ढक्कन लगाकर रख दें। दस दिन तक बोतल को दिन में तीन-चार बार हिलाते रहें। ग्यारहें दिन से दवा का इस्तेमाल शुरु करें। रोज़ाना सोते समय 2-3 बूंद दवा आंख में डालें। उपयोगी नुस्खा है।


आँख आने पर अमरुद के पत्तों का रस दोनों आँखों में डालें व बर्फ से आँखों की सिंकाई करें।


आँखों की रोशनी कम होना...पाव भर दूध में थोड़ा शुद्ध घी मिलाकर अछवा गाय के ताज़े घी में मिश्री मिलाकर सेवन करने से आँखों की रोशनी बढ़ती है। काली मिर्च एक ग्राम, हल्दी तीन ग्राम और हरड़ दो ग्राम, गुलाबजल में मिलाकर आंखों पर लगाएं। जायफल को पानी में घिसकर आँखों की पलकों के ऊपर कुछ देर तक, दिन में एक बार लगाने से फायदा होता है।


असगंध का चूर्ण और मुलैठी का चूर्ण बराबर-बराबर (चार-चार ग्राम) और आंवले का रस आठ ग्राम तीनों को मिलाकर रोजाना एक बार सेवन करने से 6-7 माह मे आँखों की रोशनी बढ़ जाती है। रोज़ सवेरे आँखों में शुद्ध शहद को काजल की तरह लगाने से फायदा होता है।


गुहेरी होने पर छुआरे की गुठली को घिसकर फुंसी पर लगाएं।


इमली के बीज की गिरी को साफ पत्थर पर घिसकर गुहेरी पर लगाने से लाभ मिलता है। यह नुस्खा तभी आजमाएं जब फुंसी बाहर की तरफ हो ।


दो लौंग पानी में घिसकर गुहेरी पर लगाएं।


पचास ग्राम काला सुरमा, प्याज़ के पचास ग्राम रस में खरल करके, छानकर शीशी में भर लें। इस सुरमे की एक-एक सलाई, सुबह-शाम आँख में लगाएं। यह नज़र की कमज़ोरी के अलावा धुंध, जाला, रोहे आदि में भी कारगर है।


आँखें दुखना:-
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गरम पानी में जस्ते का फूला डालकर सेंकने से दर्द बंद होता है।


गेंदे के पत्ते पीसकर उसकी टिकिया बनाकर आँखों पर बांधें।


रुई के फाहों पर दूध की मलाई रखकर बांधें।


हल्दी के पानी में कपड़ा भिगोकर आँखों पर रखें।


गुलाबजल में थोड़ा फिटकरी का फूला डालकर उसे कई बार आँखें में बूंद-बूंद टपकाएं।


हल्दी, आँमा हल्की, रसौत, फिटकरी लोध्र इन्द्र जौ, अफीम, ग्वारपाठे का गूदा-इन्हें पीसकर पलकों पर व आँखों के पास-पास लेप करें।


हरड़-बहेड़ा आंवला और पोस्ते को डोडे में घोलकर छान लें और गर्म पानी में उबाली गई शीशी में रखें। दुखती हुई आंखों में दिन में चार बार दो दो बूंद दवा डालने से लाभ होता है।


अनार के पत्ते या कीकर के मुलायम पत्ते पानी में पीसकर टिकिया बनाकर रात को आंख पर रखकर बांधें। इससे आंखों की दुखन व जलन में लाभ मिलता है।


पचास ग्राम गुलाब जल में एक मध्यम आकार की हल्दी की गांठ कूटकर डालें। दूसरे दिन छानकर शीशी में रख लें। आँख में लाली बहुत हो, कड़कड़ाहट महसूस हो तो दो-दो बंदू, दिन में तीन-चार बार डालें। आंख के रोगी को भुने चने नहीं खाने चाहिए।


इमली के फूलों की पुल्टिश आँखों पर बांधने से आँखों की सूजन दूर होती है।


सुपारी (पान वाली) को पानी में सिल पर घिसकर लगाने से आँखों की सूजन दूर होती है। इसका लेप आँखों के ऊपर करना चाहिए।


अडूसा के ताज़े फूलों को गरम करके आँखों पर बांधने से आँखों की सूजन दूर होती है।


बिना किसी कष्ट के आँखों से पानी बहता रहता है। फिटकरी दो रत्ती, एक तोला गुलाब के अर्क में घोलकर आँखों में टपकाएं और इसी में रुई का फाहा भिगोकर आंख पर रखें।


पीली हरड़ का छिलका, बहेड़े का छिलका, आवंला गुठली निकला हुआ-ये तीनों वस्तुएं पांच-पांच तोला लेकर कूट-छानकर, दुगुने शहद में मिलाएं और बराबर मात्रा का घी मिलाकर प्रतिदिन एक तोला खाएं। आंखों से पानी आना रुक जाता है।


रोहे.....इन्हें कुकरे भी कहते हैं। इस रोग में आंख की पलक के अंदर बारीक-बारीक दाने निकल आते हैं जो चुभते हैं। इनकी वजह से आंखें लाल रहती हैं और आंखों से पानी बहता रहता है। आंखों में खुजली बनी रहती है। रोहों के इलाज़ के लिए रसौत दस ग्राम, फिटकरी तीन ग्राम, हल्दी तीन ग्राम और गुलाब-जल अर्क दस ग्राम-इन सभी वस्तुओं को रात में सोते समय किसी कांच के बर्तन में भिगो दें। प्रातःकाल इन्हें खूब मसलकर मोटे कपड़े से छान लीजिए। दिन में पांच-छः बार ड्रापर से दो-दो बूंद दोनों आंखों में डालने से रोहे और ढलके ठीक हो जाते हैं।


माजू को बारीक खरल करके रखें और पलकों को उलटकर चुटकी से इसे रोहों पर छिड़कें अथवा सलाई से रोहों पर लगाएं।


सुहागा व फिटकरी छः-छः माशा, शोरा कलमी तीन माशा को बारीक पीसकर रोगों पर छिड़कें। थोड़ी देर बाद ठंडे पानी से धोएं।


कान के रोग या कान का बहना:-
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फूले हुए सुहागे को पॉउडर करके, कपड़े में छानकर रख लें। इस पॉउडर को दिन में एक बार रोज़ाना, चार दिन तक छिड़कें।


बच्चों का कान बहता हो तो एक-दो बूंद चूने का पानी ड्रापर से डालें।


कान का दर्द के लिए आम के पत्तों का रस गुनगुना करके कान में डालने से फायदा होता है।


गाय के शुद्ध देसी घी में अजवायन डालकर अच्छी तरह पका लें। छानकर, गुनगुना एक दो बूंद कान में टपकाएं।


बच्चों में कान दर्द महसूस हो तो मां के दूध में समान मात्रा में कद्दू का रस मिलाकर दो बूंद कान में टपकाएं।


गेंदे के पत्तों का ताजा रस की कुछ बूंदें कान में डालने पर तुरंत राहत महसूस होती है।


अदरक के रस में शहद तथा नमक (थोड़ा-सा) डालकर अच्छी तरह मिला लें। उसे गुनगुना करके कानों में टपकाएं।


चुकंदर के पत्तों का रस गुनगुना करके दो-दो बूंद दोनों कानों में, तीन-तीन घंटे के अंतर से डालने से कान का दर्द दूर होता है।


तुलसी के पत्तों का रस या गेंदे के फूलों का रस कान में टपकाने से (दो बूंद) दर्द ठीक होता है।


पीली सरसों के तेल में लहसुन गरम करके गुनगुने तेल की दो-दो बूंद कान में डालने से कान का दर्द ठीक होता है।


बहरेपन के लिए लगभग छियालीस ग्राम कड़वे बादाम के तेल में लहसुन की बारह मध्यम आकार वाली कलियां डालकर तब तक पकाएं, जब तक कलियां जल न जाएं। इसके बाद लहसुन की कलियां निकालकर फेंक दें और तेल को छानकर रख लें। इस तेल को गुनगुना करके दो बूंद की मात्रा में रोज़ाना कान में डालें। इससे बहरेपन में लाभ होता है।


कान के दर्द में पुदीना का रस डालने से लाभ मिलता है।


केले के पत्तों के रस में समुद्रफेन मिलाकर डालने से आराम मिलता है।


कान का बहना - प्याज़ का रस थोड़ा-सा गर्म करके एक या दो बूंद कान में डालें। इससे कान का बहना, बहरापन व दर्द आदि रोग दूर होते हैं।


सरसों का तेल दस तोला लेकर उसमें रतनजोत एक तोला डालकर पकाएं। जब जलने लगे, तो इस तेल को साफ शीशी में भरकर रख लें। कान बहे या दर्द करे, सभी परिस्थितियों में यह प्रयोग लाभ पहुंचाता है।


फिटकरी 20 माशा, हल्दी एक माशा पीसकर रख लें। आवश्यकता पड़ने पर कान को रुई से साफ करके दो रत्ती दवा डालें। लाभ मिलता है।


कान का बहरापन यदि कोई व्यक्ति या महिला जन्मजात बहरा हो तो वह मात्र दवाओं से ठीक नहीं होता। किन्तु ऊंचा सुनने वालों के लिए ये नुस्खे लाभदायक हो सकेत हैं -


प्याज़ का रस, हलका गरम डालने से लाभ मिलता है। कड़वे बादाम का तेल कान में टपकाने से बहरापन ठीक हो जाता है।


नाक की बीमारियां-नज़ला (पुराना जुकाम) के लिए :-
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भुने चने का छिलका उतरा हुआ आटा 20 ग्राम मलाई और रबड़ी 20 ग्राम थोड़े शहद में मिलाकर, 4 बूंद अमृतधारा असली मिलाकर कुछ दिन रात में खाने से पुराने-से-पुराने नज़ले में लाभ पहुंचाता है।


नाक से दुर्गंध के लिए कद्दू का रस नाक में टपकाने से लाभ मिलता है। कद्दू का रस सुबह-शाम, पीस-छानकर नाक में टपकाएं। हाजमा ठीक रखें।


नाक से खून आने को नकसीर कहते हैं। माजूफल को बारीक पीसकर नाक में सुंघाने से नकसीर बंद हो जाती है।


सूखा आंवला 25 ग्राम पानी में भिगोकर रख दें। सुबह छानकर पानी पीएं तथा आंवलें को पीसकर तालू और माथे पर लेप करें।


10 ग्राम मुल्तानी मिट्टी कूट लें और एक प्याला पानी में भिगो दें। सुबह ऊपर का पानी पीने को दें तथा नीचे बैठी मिट्टी का माथे पर लेप करें।


यदि गर्मी के कारण नाक से खून आए तो चार आंवलें उबालकर शुद्ध घी में भूनने के बाद सिर पर लेप करने से लाभ मिलता है।


मेंहदी की ताजी पत्तियां पानी में पीसकर तलवों में लगाने से नकसीर बंद हो जाती है।


छोटी कटेरी के ताज़े पत्तों को कुचलकर उनका रस निकाल लें। इस रस को दो-दो बूंद नाक में टपकाने से लाभ होता है।


हरी दूब का ताज़ा रस या प्याज़ का रस निकालकर सूंघें।


अनार के फूल और हरी दूब समान मात्रा में पीस लें और दिन में दो बार दो-दो चम्मच लें।


जुकाम होना:-
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पांच ग्राम अदरक के रस में पांच ग्राम तुलसी का रस मिलाकर दस ग्राम शहद से लें। एक गिलास गर्म दूध में पांच काली मिर्च पकाएं और सुबह-शाम सेवन करें।


सुहागे को तवे पर फुलाकर महीने पीस लें। आधा ग्राम की मात्रा में दिन में तीन बार गरम पानी के साथ लें। तीन दिनों में फायदा हो जाएगा।


अडूसा के पत्तों का काढ़ा बनाकर पीने से सर्दी-जुकाम मिटता है। अमरूद के पत्ते चाय की तरह उबाल लें और पानी पीएं। बार-बार नकसीर फूटे तो आंवले का रस बीस-बीस ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम सेवन करें।


मुंह में छाले होने पर दो चम्मच हल्दी चूर्ण दो गिलास पानी में खूब उबालें। इसके बाद ठंडा करके उस पानी से गरारे करें। मुंह के छालों में उपयोगी है।


चमेली के पत्ते चबाने से मुंह के छाले ठीक होते हैं। मुंह के छाले होने पर मुलेठी चूसें।


मुंह के छालों में पेट साफ रखना भी जरूरी है। इसके लिए रात को सोते समय एक कप मीठे गर्म दूध में आधा चम्मच देसी घी डालकर पीएं।


कत्थे के साथ अमरूद की पत्तियां चबाने से मुंह के छाले ठीक हो जाते हैं।


एक ग्राम कत्थे को एक छोटी चम्मच शहद में मिलाकर रख लें। छालों पर उंगली से दिन में तीन बार लगाएं। साथ ही आधा चम्मच गुलकंद दिन में दो बार, दूध में मिलाकर पीएं।

Wednesday, August 26, 2015

आंखे कमजोर हैं नजदीक या दूर का चश्मा लगा है प्रयोग करे-

जिन की आंखे कमजोर हैं, जिन्हे नजदीक या दूर का चश्मा लगा हुआ है वह यह प्रयोग करे-







भारतीय वनौषधियों में गोरखमुंडी का विशेष महत्‍व है। सर्दी के मौसम में इसमें फूल और फल लगते हैं। इस पौधे की जड़, फूल और पत्‍ते कई रोगों के लिए फायदेमंद होते हैं। 


गोरखमुण्डी भारत के प्रायः सभी प्रान्तों में पाई जाती है।  संस्कृत में इसकी श्रावणी महामुण्डी अरुणा, तपस्विनी तथा नीलकदम्बिका आदि कई नाम हैं। यह अजीर्ण, टीबी, छाती में जलन, पागलपन, अतिसार, वमन, मिर्गी, दमा, पेट में कीड़े, कुष्ठरोग, विष विकार आदि में तो लाभदायक होती ही है, इसे बुद्धिवर्द्धक भी माना जाता है। गोरखमुंडी की गंध बहुत तीखी होती है।


गर्भाशय, योनि सम्बन्धी अन्य बीमारियों पथरी-पित्त सिर की आधाशीशी आदि में भी यह अत्यन्त लाभकारी औषधि है। 


गोरखमुंडी के चार ताजे फल तोड़कर भली प्रकार चबायें और दो घूंट पानी के साथ इसे पेट में उतार लें तो एक वर्ष तक न तो आंख आएगी और न ही आंखों की रोशनी कमजोर होगी। गोरखमुंडी की एक घुंडी प्रतिदिन साबुत निगलने कई सालों तक आंख लाल नहीं होगी। 


इसके पत्ते पीस कर मलहम की तरह लेप करने से नारू रोग (इसे बाला रोग भी कहते हैं, यह रोग गंदा पानी पीने से होता है) नष्ट हो जाते हैं।


गोरखमुंडी तथा सौंठ दोनों का चूर्ण बराबर-बराबर मात्रा में गर्म पानी से लेने से आम वात की पीड़ा दूर हो जाती है। 


गोरखमुंडी चूर्ण, घी, शहद को मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से वात रोग समाप्‍त होते हैं।


कुष्‍ठ रोग होने पर गोरखमुंडी का चूर्ण और नीम की छाल मिलाकर काढ़ा तैयार कीजिए, सुबह-शा‍म इस काढ़े का सेवन करने से कुष्‍ठ रोग ठीक हो जाता है। 


गले के लिए यह बहुत फायदेमंद है, यह आवाज को मीठा करती है। 


गोरखमुंडी का सुजाक, प्रमेह आदि धातु रोग में सर्वाधिक सफल प्रयोग किया गया है।


योनि में दर्द हो, फोड़े-फुन्सी या खुजली हो तो गोरखमुंडी के बीजों को पीसकर उसमें समान मात्रा में शक्कर मिलाकर रख लें और एक बार प्रतिदिन दो चम्मच ठंडे पानी से लेने से इन बीमांरियों में फायदा होता है। इस चूर्ण को लेने से शरीर में स्‍फूर्ति भी बढ़ती है।


गोरखमुडी का सेवन करने से बाल सफेद नही होते हैं। 


गोरखमुंडी के पौधे उखाड़कर उनकी सफाई करके छाये में सुखा लें। सूख जाने पर उसे पीस लीजिए और घी चीनी के साथ हलुआ बनाकर खाइए, इससे इससे दिल, दिमाग, लीवर को बहुत शक्ति मिलती है। 


गोरखमुडी का काढ़ा बनाकर प्रयोग करने से पथरी की समस्‍या दूर होती है।


पीलिया के मरीजों के लिए भी यह फायदेमंद औषधि है। 


गोरखमुंडी के पत्ते तथा इसकी जड़ को पीस कर गाय के दूध के साथ लिया जाये तो इससे यौन शक्ति बढ़ती है। यदि इसकी जड़ का चूर्ण बनाकर कोई व्यक्ति लगातार दो वर्ष तक दूध के साथ सेवन करता है तो उसका शरीर मजबूत हो जाता है। गोरखमुंडी का सेवन शहद, दूध मट्ठे के साथ किया जा सकता है।


गोरखमुंडी का प्रयोग बवासीर में भी बहुत लाभदायक माना गया है। गोरखमुंडी की जड़ की छाल निकालकर उसे सुखाकर चूर्ण बनाकर हर रोज एक चम्मच चूर्ण लेकर ऊपर से मट्ठे का सेवन किया जाये तो बवासीर पूरी तरह समाप्त हो जाती है। जड़ को सिल पर पीस कर उसे बवासीर के मस्सों में तथा कण्ठमाल की गाठों में लगाने से बहुत लाभ होता है। पेट के कीड़ों में भी इस की जड़ का पूर्ण प्रयोग किया जाता है, उससे निश्चित लाभ मिलता है।


जिन की आंखे कमजोर हैं, जिन्हे नजदीक या दूर का चश्मा लगा हुआ है वह यह प्रयोग करे:-
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ये सभी प्रयोग अनेक बार आजमाए हुए व सुरक्षित हैं। किसी को भी कोई हानी नहीं होगी। लाभ किसी को कम व किसी को अधिक हो सकता है परंतु लाभ सभी को होगा। हो सकता है किसी का चश्मा न उतरे परंतु चश्मे का नंबर जरूर कम होगा। प्रयोग करने से सिर मे दर्द नहीं होगा। बाल दोबारा काले हो जाएगे। बाल झड़ने रूक जाएगे। गोरखमुंडी एक एसी औषधि है जो आंखो को जरूर शक्ति देती है। अनेक बार अनुभव किया है। आयुर्वेद मे गोरखमुंडी को रसायन कहा गया है। आयुर्वेद के अनुसार रसायन का अर्थ है वह औषधि जो शरीर को जवान बनाए रखे।

गोरखमुंडी का पौधा यदि यह कहीं मिल जाए तो इसे जड़ सहित उखाड़ ले। इसकी जड़ का चूर्ण बना कर आधा आधा चम्मच सुबह शाम दूध के साथ प्रयोग करे । बाकी के पौधे का पानी मिलाकर रस निकाल ले। इस रस से 25% अर्थात एक चौथाई घी लेकर पका ले। इतना पकाए कि केवल घी रह जाए। यह भी आंखो के लिए बहुत गुणकारी है।

बाजार मे साबुत पौधा या जड़ नहीं मिलती। केवल इसका फल मिलता है। तब आप इस प्रकार प्रयोग करे ..100 ग्राम गोरखमुंडी लाकर पीस ले। बहुत आसानी से पीस जाती है। इसमे 50 ग्राम गुड मिला ले। कुछ बूंद पानी मिलाकर मटर के आकार की गोली बना ले। इसे भी ले सकते है .

जो अधिक गुणकारी बनाना चाहे तो ऐसे करे यह काम लौहे कि कड़ाही मे करना चाहिए । न मिले तो पीतल की ले। यदि वह भी न मिले तो एल्योमीनियम कि ले।  300 ग्राम गोरखमुंडी ले आए।लाकर पीस ले । 100 ग्राम छन कर रख ले। बाकी बची 200 ग्राम गोरखमुंडी को 500 ग्राम पानी मे उबाले। जब पानी लगभग 300 ग्राम बचे तब छान ले। साथ मे ठंडी होने पर दबा कर निचोड़ ले। इस पानी को मोटे तले कि कड़ाही मे डाले। उसमे 100 ग्राम गुड कूट कर मिलाकर धीमा धीमा पकाए। जब शहद के समान गाढ़ा हो जाए तब आग बंद कर दे। जब ठंडा जो जाए तो देखे कि काफी गाढ़ा हो गया है। यदि कम गाढ़ा हो तो थोड़ा सा और पका ले। फिर ठंडा होने पर इसमे 100 ग्राम बारीक पीसी हुई गोरखमुंडी डाल कर मिला ले। अब 50 ग्राम चीनी/मिश्री मे 10 ग्राम छोटी इलायची मिलाकर पीस ले। छान ले। हाथ को जरा सा देशी घी लगा कर मटर के आकार कि गोली बना ले। गोली बना कर चीनी इलायची वाले पाउडर मे डाल दे ताकि गोली सुगंधित हो जाए। 3 दिन छाया मे सुखाकर प्रयोग करे। इलायची केवल खुशबू के लिए है। 

प्रयोग विधि :-
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1-1 गोली 2 समय गरम दूध से हल्के गरम पानी से दिन मे 2 बार ले। सर्दी आने पर 2-2 गोली ले सकते हैं। इसका चमत्कार आप प्रयोग करके ही अनुभव कर सकते हैं। आंखे तो ठीक होंगी है रात दिन परिश्रम करके भी थकावट महसूस नहीं होगी। कील, मुहाँसे, फुंसी, गुर्दे के रोग सिर के रोग सभी मे लाभ करेगी। जिनहे पेशाब कम आता है या शरीर के किसी हिस्से से खून गिरता है तो ठंडे पानी से दे। इतनी सुरक्षित है कि गर्भवती को भी दे सकते हैं। ध्यान रहे 2-4 दिन मे कोई लाभ नहीं होगा। लंबे समय तक ले । गोली को अच्छी तरह सूखा ले। अन्यथा अंदर से फफूंद लग जाएगी।


ये पाचन शक्ति बढ़ाती है इसलिए भोजन समय पर खाए। चाय पी कर भूख खत्म न करे। चाय पीने से यह दवाई लाभ के स्थान पर हानि करेगी।

Thursday, July 23, 2015

टॉन्सिल क्या है करे उपचार .?

* गले के प्रवेश द्वार के दोनों तरफ मांस की गांठ सी होती है जिसे हम टॉन्सिल कहते हैं। जब इनमे सूजन आ जाती है इसे हम टॉन्सिल होना कहते हैं। ये सूजन कम या ज्यादा हो सकती है। इसमें गले में बहुत दर्द होता है। इनमें पैदा होने वाली सूजन को टॉन्सिलाइटिस कहा है - इसमें गले में बहुत दर्द होता है तथा खाने का स्वाद भी पता नहीं चलता है -








* चावल , ज्यादा ठन्डे पेय पदार्थों का सेवन , मैदा तथा ज्यादा खट्टी वस्तुओं का अधिक प्रयोग करना टॉन्सिल बढ़ने का मुख्य कारण है | इन सबसे अम्ल (गैस ) बढ़ जाती है जिससे कब्ज़ हो जाती है | सर्दी लगने से , मौसम के अचानक बदल जाने से , जैसे गर्म से अचानक ठंडा हो जाना तथा दूषित वातावरण में रहने से भी कई बार टॉन्सिल बढ़ जाते हैं | इस रोग के होते ही ठण्ड लगने के साथ बुखार भी आ जाता है , गले पर दर्द के मरे हाथ नहीं रखा जाता और थूक निगलने में भी परेशानी होती है |

 टॉन्सिलाइटिस दो प्रकार का होता है-

नए प्रकार का -

* पहले दोनों ओर की तालुमूल ग्रंथि (टॉन्सिल) या एक तरफ की एक टॉन्सिल, पीछे दूसरी तरफ की टॉन्सिल फूलती है। इसका आकार सुपारी के आकार का हो सकता है। उपजिह्वा भी फूलकर लाल रंग की हो जाती है। खाने-पीने की नली भी सूजन से अवरुद्ध हो जाती है‍ जिससे खाने-पीने के समय दर्द होता है। टॉन्सिल का दर्द कान तक फैल सकता है एवं 103-104 डिग्री सेल्सियस तक बुखार चढ़ सकता है।जबड़े में दर्द होता है। गले की गाँठ फूलती है, मुँह फाड़ नहीं सकता है। पहली अवस्था में अगर इलाज से रोग न घटे तो धीरे-धीरे टॉन्सिल पक जाता है और फट भी सकता है।

पुराने प्रकार का-

* जिन व्यक्तियों को बार-बार टॉन्सिल की बीमारी हुआ करती है तो वह क्रोनिक हो जाती है। इस अवस्था में श्वास लेने और छोड़ने में भी कठिनाई होती है तथा टॉन्सिल का आकार सदा के लिए सामान्य से बड़ा दिखता है।

आइये जानते हैं टॉन्सिलाइटिस के कुछ उपचार :—

* गर्म (गुनगुने ) पानी में एक चम्मच नमक डालकर गरारे करने से गले की सूजन में काफी लाभ होता है |

* दालचीनी को पीस कर चूर्ण बना लें | इसमें से चुटकी भर चूर्ण लेकर शहद में मिलाकर प्रितिदिन 3 बार चाटने से टॉन्सिल के रोग में सेवन करने से लाभ होता है | इसी प्रकार तुलसी की मंजरी के चूर्ण का उपयोग भी किया जा सकता है |

* एक गिलास पानी में एक चम्मच अजवायन डालकर उबाल लें | इस पानी को ठंडा करके उससे गरारे और कुल्ल्ला करने से टॉन्सिल में आराम मिलता है |

* दो चुटकी पिसी हुई हल्दी, आधी चुटकी पिसी हुई कालीमिर्च और एक चम्म्च अदरक के रस को मिलाकर आग पर गर्म कर लें और फिर शहद में मिलाकर रात को सोते समय लेने से दो दिन में ही टॉन्सिल की सूजन दूर हो जाती है |

* गले में टॉन्सिल होने पर सिंघाड़े को पानी में उबालकर उसके पानी से कुल्ला करने से आराम होता है |

* भोजन में बिना नमक की उबली हुई सब्ज़ियाँ खाने से टॉन्सिल में जल्दी आराम आ जाता है | मिर्च-मसाले , ज्यादा तेल की सब्ज़ी , खट्टी व ठंडी वस्तुओं का सेवन नहीं करना चाहिए | गर्म पदार्थों के सेवन के पश्चात ठंडे पदार्थों का सेवन कदापि न करें |

होमियोपेथी इलाज :-
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साधारण औषधि :-
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बेराईटा, बेलाडोना, एसिड बेन्जो, बार्बेरिस, कैन्थर, कैप्सिकम, सिस्टस, फेरमफॉस, गुएकेम, हिपर सल्फर, हाईड्रैस्टीस, इग्नेसिया, कैलीबाईक्रोम, लैकेसिस, मरक्युरियस, लाईकोपोडियम, मर्क प्रोटो ऑयोड, मर्क बिन आमोड, नेट्रम सल्फ, एसिड नाइट्रीकम, फाईटोलैक्का, रसटक्स, सालिसिया, सल्फर एवं एसिड सल्फर कारगर दवाएँ हैं।

क्रोनिक की अवस्था में:-
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* 200 पोटेन्सी की उपरोक्त लक्षणानुसार दवा बारंबारता से दोहराव करने पर रोग का कुछ महीनों में शमन होता है एवं आरोग्यता आती है।

जो रोगी जो सर्जरी से बचना चाहते हैं या कम उम्र के बच्चे , डायबिटीज अथवा हृदय रोग से पी‍ड़ित रोगी जिन्हें टॉन्सिल्स हैं, एक बार होम्योपैथिक दवाओं का चमत्कार आजमा कर स्वस्थ हो सकते हैं।

उपचार स्वास्थ्य और प्रयोग-

Saturday, June 27, 2015

टिनिटस क्या है जाने लक्षण एवं उपचार....!

* ये एक अजीब सी बीमारी है जिसके अंतर्गत कानों के अंदर बिना किसी वजह के एक आवाज़ गूंजती रहती है। यह कोई आम समस्या नहीं है। यह कोई बीमारी नहीं है बल्कि किसी बीमारी का लक्षण है। यह रक्तवाहिनियों की समस्या या उम्र के साथ सुनने की शक्ति क्षीण पड़ने से जोड़ी जा सकती है। लोग टिनिटस से काफी परेशान रहते हैं क्योंकि इससे सुनने की क्षमता पर असर पड़ता है जो कि हमारे जीवन का काफी महत्वपूर्ण भाग है। इसके बावजूद टिनिटस कोई बड़ी समस्या नहीं है। उम्र के साथ लोगों के सुनने की क्षमता कम होती जाती है। कुछ उपचारों की मदद से आप इसे ठीक कर सकते हैं।

टिनिटस के लक्षण:-
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* आसपास किसी भी तरह की आवाज़ ना होते हुए भी आपके कानों में किसी आवाज़ का गूंजना ही टिनिटस कहलाता है।

इसके कुछ लक्षण हैं:-
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सिसकारी

दहाड़

कानबजना

आवाज़गूंजना

* स्थिति के गंभीर होने के मुताबिक़ कान में आवाज़ का गूंजना कम या ज़्यादा हो सकता है। कुछ लोगों को ये आवाज़ें एक कान में ही सुनाई देती है तो कुछ को दोनों कानों में। कुछ लोगों को ये आवाज़ें इतनी तेज़ सुनाई देती है कि वो असली आवाज़ ही नहीं सुन पाते। कुछ लोगों के लिए यह समस्या अस्थायी रूप से परेशान करने वाली होती है और अन्य लोगों को काफी दिनों तक ये समस्या सताती है।

टिनिटस के प्रकार:-
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व्यक्तिपरक टिनिटस:-
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* यह एक ख़ास प्रकार का टिनिटस होता है जिसमें आप सुन सकते हैं। ज़्यादातर लोग इस प्रकार के टिनिटस से जूझते हैं। इस प्रकार के टिनिटस का मुख्य कारण कान के अंदरूनी, बाहरी तथा मध्य भाग में समस्या होना है। अगर आप सुनने की नसों में आई समस्याओं से परेशान हैं तो आपको व्यक्तिपरक टिनिटस की समस्या है।

वस्तुगत टिनिटस:-
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* यह टिनिटस काफी कम लोगों में पाया जाता है तथा सिर्फ डॉक्टर ही जांच के दौरान इसे सुन सकते हैं। इस प्रकार के टिनिटस का मुख्य कारण खून की धमनियों में किसी प्रकार की कोई समस्या है। यह अंदरूनी हड्डियों की कोई समस्या मांसपेशियों में मरोड़ की परेशानी हो सकती है।

टिनिटस के कारण:-
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* तेज़ आवाज़ों के संपर्क में रहना

* आमतौर पर फैक्ट्री में भारी उपकरणों की आवाज़ से काफी शोर पैदा होता है। इसके अलावा गाने बजाने के तमाम उपकरण काफी शोर पैदा करते हैं। अगर आप इनमें से किसी चीज़ के संपर्क में हैं तो आपको टिनिटस होने की संभावना काफी ज़्यादा है।

कान की हड्डियों में परिवर्तन:-
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* अगर आपके कान की हड्डी कान के बीच में कड़ी हो रही है तो इससे आपके सुनने की क्षमता पर असर पड़ता है। यह हड्डियों के अतिरिक्त रूप से बढ़ने की वजह से भी होती है जिसका कारण आनुवांशिक हो सकता है।

उम्र आधारित समस्या:-
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* उम्र बढ़ने के साथ शरीर में कई समस्याएं आती हैं। सुनने की क्षमता क्षीण होने का उम्र के साथ भी सम्बन्ध हो सकता है। इससे टिनिटस की समस्या भी हो सकती है। ६० साल की उम्र से यह समस्या शुरू हो सकती है।

इसका एक चिकित्सकीय नाम भी है – प्रेस्बाईक्यूसिस।

कान में वैक्स जमा होना:-
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* कानों का मोम कानों में गन्दगी एवं बैक्टीरिया जाने से रोकता है। पर कभी कभी अतिरिक्त मात्रा में मोम हमारे कानों में एकत्रित हो जाता है। ऐसे में भी टिनिटस की समस्या हो सकती है।

टिनिटस का उपचार:-
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* बार-बार दवाई बदलना कई बार दवाइयों के साइड इफ़ेक्ट से भी टिनिटस होता है, अतः अपनी दवाइयों को कम बदलें।

* कान का मोम निकालें अगर आपके कान में काफी मोम जम गया है तो इसे निकालना आवश्यक है। परन्तु इसके लिए हेयर पिन का प्रयोग न करें क्योंकि इससे कानों को हानि पहुँच सकती है।

* कान ढकने का यंत्र आप अब कानों को स्वस्थ रखने के लिए कान ढकने के मास्क का प्रयोग कर सकते हैं। इसको पहनने के बाद आपको बाहरी शोर का सामना नहीं करना पडेगा।

* वाइट नॉइज़ मशीन ये ऐसे यंत्र होते हैं जो पर्यावरण सम्बन्धी आवाज़ निकालते हैं जैसे समुद्र की लहरें और बारिश। यह टिनिटस का काफी महत्वपूर्ण उपचार है।

उपचार स्वास्थ्य और प्रयोग-

Tuesday, April 14, 2015

अगर आपको एलर्जी है धूल से तो करे ये उपाय -

सांस लेते ही हवा में उपस्थित अनगिनत बारीक कण हमारे श्वसन संस्थान के सम्पर्क में आते है और कुछ फेफड़ों में भी पहुंच जाते हैं। एक स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में यह बारीक कण छनकर बाहर हो जाते हैं और इस तरह वो बीमारी से बच जाते हैं-




प्रतिरोधक शक्ति श्वसन संस्था की सतह पर हमेशा सक्रिय रहती है, जिससे जीवाणु संक्रमण नहीं हो पाता परन्तु विषाणु संक्रमण से बीमारी हो सकती है, जिनमें इन्फ्लूएंजा बायरस खतरनाक हो सकता है। हवा में मौजूद एलरजेन या रासायनिक तत्व श्वसन संस्था के रोग पैदा कर सकते हैं। नाक, गले में या फिर फेफड़ों में सूजन पैदा होना, फेफड़ों का दाह, दमा या ब्रोन्काइटिस जैसे रोग प्रकट होते हैं। वायु प्रदर्शन से भी श्वसन रोग पैदा हो जाते है, जिससे दमा रोग भयंकर रूप में भी एलर्जी तथा फेफड़ों का दाह लम्बे समय में फेफड़ों को नष्ट कर देता है।

एलरजेन’ यानी क्या?

* कोई भी ऐसे पदार्थ, जिनके कणों से एलर्जी शुरू होने लगे। एलरजेन्स हजारों प्रकार के हो सकते हैं। परागकण से अंडों के प्रोटीन तक सभी एलरजेन का काम करते हैं। कोई भी रसायन एलर्जी की क्रिया पैदा कर सकता है। इनें घर की धूल, पौधे या धास के परागकण, आहार के प्रोटीन, अंडे, फल्लीदाना भी आते हैं। बिल्ली या कुत्ते के बाल, धूल, डैड्रफ, लार भी उनके बालों में लगी रहती है। यह सब एलर्जी पैदा करने में सक्षम है। सामान्य एलर्जी इम्युनोग्लोब्यूलिन ‘इ’ से संबंधित है। हे-फीवर इसी टाइप की एलर्जी है। सांस में आए एलरजेन, परागकण नाक के सम्पर्क में आते ही छींक आने लगती है। नाक में सूजन भी आ जाती है।

* एलर्जी के लक्षणों में बुखार, सर्दी, नाम में सूजन आ जाती है। बुखार, दमा, एग्जिमा (चर्म रोग) इन तीनों का कहर एक साथ भी हो सकता है, जिसे ‘एटोपी’ कहते हैं। इनके पीछे भी इम्युनो ग्लोब्यूलिन ई के एंटीबॉडी रहते हैं। ग्रामीण वायु प्रदूषण में कीटनाशक तक रंग पैदा कर सकते हैं। अनाज की धूल तथा लकड़ी की धूल से खांसी, छाती में जकड़न, दमा मुख्य रूप से नजर आते हैं। कान, नाक और गला वायु प्रदूषण के एलरजेन के शिकार होते हैं। गला दुखना, सर्दी-खांसी वायु में उपस्थित एलरजेन्स से ही होते हैं।

* एलर्जी से सर्दी एक सामान्य वातावरण की बीमारी है। सांस में आए एलरजेन्स से हिस्टान नामक तत्व उत्पन्न होने से सर्दी व नाक तेजी से बहना शुरू हो सकती है। धूल के प्रभाव से भी अनेक लक्षण प्रकट हो सकते हैं। धूल श्वसन संस्था में प्रवेश करके फेफड़ों को नष्ट कर देती है। नाक बहने से हथेली से नाक रगड़ने से उसे एलर्जीक सेल्यूट कहते हैं। हे फीवर (पराग कण से एलर्जी) में नाक से पानी बहना भी कुछ मौसम में सामान्य होते हैं। खांसी, छाती में दर्द, सांस लेते वक्त आवाज आना, दम फूलना, गला दुखना भी सामान्य लक्षण हो सकते हैं। गले में ग्लैंड भी बढ़ सकते हैं।

* कुछ आहार से सर्दी की बीमारी 20 मिनट में, 4-6 घंटों में या 24-48 घंटों में भी आ सकती है। इसमें ठंड लगना, सिरदर्द, कान दुःखना भी हो सकती है। एलर्जी से चर्मरोग में एग्जिमा होता है, जिसमें चमड़ी खुजलाती है और लाल रंग की हो जाती है। चमड़ी की परतें निकलती हैं। इसमें अत्यधिक खुजलाहट होती है।

* चेहरे पर, कान के पीछे, कोहनी पर, घुटने के पीछे एग्जिमा एलर्जी से होता है। एग्जिमा शरीर की प्रतिकार शक्ति से भी संबंधित हो सकता है। वायु प्रदूषण से उपजे एलरजेन या रासायनिक तत्व से श्वसन रोग, फेफड़ों का दाह, नाक में सूजन, फेफड़ों की सूजन से दमा की शिकायत हो जाती है।

* वायु प्रदूषण में कण अस्थमा के कारण बन सकते हैं। अस्थमा (दमा) एलर्जी से होता है। एलर्जी हवा से या आहार में बदलाव से कम कर सकते हैं। वसंत ऋतु या गर्मी में परागकण दमा की शिकायत लाते हैं। घर के भीतर हवा में उपस्थित एलरजेन सालभर दमा के लक्षण पैदा करते हैं। धूल के जंतु ठंड के दिनों में एलर्जी से दमा पैदा करने में सक्षम होते हैं। धूम्रपान सदैव दमा वाले रोगी की समस्या बना रहता है। बाहरी वायु प्रदूषण बढ़ती हुई समस्या है।

* बाहर या घर में भी रासायनिक प्रदूषण से बचाव जरूरी है। पालतू जानवरों से भी एलर्जी रोकना जरूरी है। कागज, कपड़े, खिलौने भी वायु प्रदूषण से एलरजेन और रसायन कमरे मेें लाते हैं। अतः इन्हें अपने शयन कक्ष से दूर रखने के प्रयत्न जरूरी है। गर्म पानी और साबुन से बेहतर सफाई होती है, अतः इनका अक्सर उपयोग करें। फल, अनाज, लकड़ी की धूल भी एलरजेन या विषैले पदार्थ पैदा करती है, जिससे श्वसन रोग संभव है। सांस के द्वारा धूल के कण में फंगस या उनके बीज फेफड़ों में पहुंच जाते हैं, जिनमें एस्परजिलस, पेनीसिलम म्युकर प्रमुख हैं। ये सब दमा, निमोनिया तथा फेफड़ों में फंगल रोग पैदा करने में सक्षम है।

* डस्टमाईट धूल के बारीक जंतु बिस्तर, कारपेट, टेबल, कुर्सी, पुराने कपड़ों में या खिलौना में रहते हैं। ये मानव चमड़ी पर आ सकते हैं। जब ये सांस में आते हैं, तब दमा या एग्जिमा पैदा कर सकते हैं। वायु प्रदूषण में ओजोन एलरजेन के साथ में दमा बढ़ा देते हैं। घर के भीतर की हवा को स्वच्छ रखना अनिवार्य है। कपड़े से धूल साफ नहीं होती। धूल को वैक्यूम क्लीनर से ही साफ कर सकते हैं। बिस्तर के नीच की जगह में धूल जमा हो जाती है। कपड़े से तो धूल फैलती है। वैक्यूम क्लीनर के नोजल पर कपड़ा बांधकर छोटी चीजों की धूल साफ करें। तकिया या बिस्तर को एलरजेन से बचाव करने वाले कवर से ढकें और हर दिन उन्हें वैक्यूम क्लीनर से साफ करें। बिस्तर की चादर को नियमित धोना, वह भी गर्म पानी से, बहुत जरूरी है। हर मौसम में अपने कारपेट और फर्श की सफाई अवश्य करें। भीतरी हवा की सफाई और प्रदूषित तत्व कम करने के लिए एयर प्यूरीफायर का उपयोग कर सकते हैं। धूल से बचाव के लिए बिस्तर व तकिये को ढककर रखें। पॉलिस्टर फिल पिलो का उपयोग करें तो ही होगा। कारपेट का उपयोग न करें। यदि कारपेट हाें तो हफ्ते में 1-2 बार उसे वैक्यूम क्लीनर से साफ करें। यदि बड़े परदे लगाते हों तो उन्हें समय-समय पर धुलवा दें। ब्लेंकेट गर्म पानी में धुलवाएं।

*  जिस व्यक्ति को एलर्जी हो, उसे घर की सफाई नहीं करनी चाहिए, खासकर वसंत ऋतु में। यदि एलर्जी वाला व्यक्ति ही साफ-सफाई करे तो मुंह पर मास्क पहने। फिर आधे घंटे के लिए बाहर ही रहें, जब तक की कमरे की धूल न हो जाए। गीले कपड़ों से धूल साफ करना सही होगा। एलरजेन का वायु में स्तर दिसम्बर महीने में कुछ ज्यादा हो सकता है। एलर्जी प्रतिकार शक्ति के द्वारा संचालित होती है। इनमें से फीवव, एग्जिमा, अस्थमा, एनाफाइलेक्सीस, भीतरी कान का बहना, जोड़ों का दर्द, सोरायसिस, लम्बी अवधि की थकान, विभाग की एलर्जी, हर समय बीमार होना सामान्य है।

* बच्चों में नाक बहना, कान बहना, सर्दी-खांसी, दमा, सिरदर्द, पैरों का दर्द, टांसिल्स, एग्जिमा, डिप्रेशन तथा आहार से एलर्जी सामान्य है। इनसे बचाव करना आवश्यक है। याद रखें, साधारण धुल भी खतरनाक हो सकती है। एलर्जी शॉट्स थैरेपी में इम्यूनोथैरेपी मुख्य है, जिससे एलर्जी कम होने लगती है, लक्षण घट सकते हैं। बच्चों में दमा या नाक का बहना ठीक हो सकता है। सही डाक्टर से ही एलर्जी शॉट्स सुरक्षित होता है और वहां पर इमर्जेंसी केयर यूनिट भी हो। यह इलाज 3-5 साल तक लेना पड़ सकता है। हृदय रोग में यह इलाज वर्जित है। एड्स की बीमारी में भी यह इलाज न करवाएं। धूल से बचाव ही धूल की एलर्जी से बचाता है।

 स्थानानुसार  एलर्जी  के  लक्षण :-
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 नाक    की  एलर्जी:-
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* नाक  में  खुजली होना ,छीकें आना ,नाक  बहना ,नाक  बंद होना  या  बार  बार जुकाम  होना आदि l

आँख की एलर्जी :-
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* आखों में लालिमा ,पानी आना ,जलन होना ,खुजली आदि l

श्वसन संस्थान की एलर्जी :-
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* इसमें खांसी ,साँस लेने में तकलीफ एवं अस्थमा जैसी गंभीर समस्या हो सकती  है l

त्वचा की एलर्जी :-
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* त्वचा की एलर्जी काफी कॉमन है और बारिश का मौसम त्वचा की एलर्जी के लिए बहुत ज्यादा    मुफीद है त्वचा की एलर्जी में त्वचा पर खुजली होना ,दाने निकलना ,एक्जिमा ,पित्ती  उछलना आदि होता है l

खान पान से एलर्जी :-
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* बहुत से लोगों को खाने पीने  की चीजों जैसे दूध ,अंडे ,मछली ,चॉकलेट  आदि से एलर्जी  होती  है l

सम्पूर्ण शरीर की एलर्जी :-
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* कभी कभी कुछ लोगों में एलर्जी से गंभीर स्तिथि उत्पन्न हो जाती है और सारे शरीर में  एक साथ गंभीर लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं ऐसी स्तिथि में तुरंत हॉस्पिटल लेकर जाना चाहिए l

अंग्रेजी दवाओं से एलर्जी:-
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* कई अंग्रेजी दवाएं भी एलर्जी का सबब बन जाती हैं जैसे पेनिसिलिन का  इंजेक्शन जिसका रिएक्शन बहुत खतरनाक होता है और मौके पर ही मोत हो जाती है इसके अलावा  दर्द की गोलियां,सल्फा ड्रग्स एवं कुछ एंटीबायोटिक दवाएं भी सामान्य से गंभीर एलर्जी के लक्षण उत्पन्न  कर सकती हैं l

मधु मक्खी ततैया आदि का काटना :-
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* इनसे भी कुछ लोगों में सिर्फ त्वचा की सूजन और दर्द की  परेशानी होती है जबकि कुछ लोगों को  इमर्जेन्सी में जाना पड़ जाता है l

एलर्जी  से  बचाव :-
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 एलर्जी से बचाव ही एलर्जी का सर्वोत्तम इलाज है इसलिए एलर्जी से बचने के लिए इन उपायों का पालन करना चाहिए:-

* य़दि आपको एलर्जी है तो सर्वप्रथम ये पता करें की आपको किन किन चीजों से एलर्जी है इसके लिए आप ध्यान  से अपने खान पान और रहन सहन को वाच करें l

* घर के आस पास गंदगी ना होने दें  l

* घर में अधिक से  अधिक  खुली और ताजा हवा आने का मार्ग  प्रशस्त करें  l

* जिन खाद्य  पदार्थों  से एलर्जी है उन्हें न खाएं l

* एकदम गरम से ठन्डे और ठन्डे से गरम वातावरण में ना जाएं l

* बाइक चलाते समय मुंह और नाक पर रुमाल बांधे,आँखों पर धूप का अच्छी क़्वालिटी का चश्मा  लगायें l

* गद्दे, रजाई,तकिये के कवर एवं चद्दर आदि समय समय पर गरम पानी से धोते रहे l
रजाई ,गद्दे ,कम्बल आदि को समय समय पर धूप दिखाते रहे l

* पालतू  जानवरों से एलर्जी है तो उन्हें घर में ना रखें l

* ज़िन पौधों के पराग कणों से एलर्जी है उनसे दूर रहे l

* घर में मकड़ी वगैरह के जाले ना लगने दें समय समय पर साफ सफाई करते रहे l

* धूल मिटटी से बचें ,यदि धूल मिटटी भरे वातावरण में काम करना ही पड़ जाये तो फेस मास्क पहन कर काम करेंl

नाक की एलर्जी :-
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* जिन लोगों को नाक की एलर्जी बार बार होती है उन्हें सुबह भूखे पेट 1 चम्मच गिलोय और 2 चम्मच आंवले के रस में 1चम्मच शहद मिला कर कुछ समय तक लगातार लेना चाहिए इससे नाक की एलर्जी में आराम आता है ,सर्दी में घर पर बनाया हुआ या किसी अच्छी कंपनी का च्यवनप्राश  खाना भी नासिका एवं साँस की   एलर्जी से बचने में सहायता करता है आयुर्वेद की दवा सितोपलादि पाउडर एवं गिलोय पाउडर को 1-1 ग्राम की मात्रा   में सुबह शाम भूखे पेट शहद के साथ कुछ समय तक लगातार लेना भी नाक एवं श्वसन संस्थान की एलर्जी में बहुत आराम देता है

* जिन्हे  बार बार त्वचा की एलर्जी होती है उन्हें मार्च अप्रेल के महीने में जब नीम के पेड़ पर कच्ची  कोंपलें आ रही हों उस समय 5-7 कोंपलें 2-3 कालीमिर्च के साथ अच्छी तरह चबा चबा कर 15-20 रोज तक खाना  त्वचा के रोगों से बचाता है, हल्दी से बनी आयुर्वेद की दवा हरिद्रा खंड भी त्वचा के एलर्जी जन्य रोगों में बहुत गुणकारी  है इसे किसी आयुर्वेद चिकित्सक की राय से सेवन कर सकते हैं l

* सभी एलर्जी जन्य रोगों में खान पान और रहन सहन का बहुत महत्व है इसलिए अपना खान पान और रहन सहन ठीक रखते हुए यदि ये उपाय अपनाएंगे  तो अवश्य एलर्जी से लड़ने में सक्षम होंगे और एलर्जी जन्य रोगों से बचे रहेंगे एलर्जी जन्य रोगों में अंग्रेजी दवाएं रोकथाम तो करती हैं लेकिन बीमारी को जड़ से ख़त्म नहीं करती है जबकि आयुर्वेद की दवाएं यदि नियम पूर्वक ली जाती है तो रोगों को जड़ से ख़त्म करने की ताकत रखती हैं l

उपचार और प्रयोग -

Monday, April 13, 2015

मोतियाबिंद का आयुर्वेदिक इलाज -

मोतियाबिंद रोग कई कारणों से होता है। आंखों में लंबे समय तक सूजन बने रहना, जन्मजात सूजन होना, आंख की संरचना में कोई कमी होना, आंख में चोट लग जाना, चोट लगने पर लंबे समय तक घाव बना रहना, कनीनिका में जख्म बन जाना, दूर की चीजें धूमिल नजर आना या सब्जमोतिया रोग होना, आंख के परदे का किसी कारणवश अलग हो जाना, कोई गम्भीर दृष्टि दोष होना, लंबे समय तक तेज रोशनी या तेज गर्मी में कार्य करना, डायबिटीज होना, गठिया होना, धमनी रोग होना, गुर्दे में जलन का होना, अत्याधिक कुनैन का सेवन, खूनी बवासीर का रक्त स्राव अचानक बंद हो जाना आदि समस्याएँ मोतियाति‍बिंद को जन्म दे सकती हैं।



मोतियाबिंद एक आम समस्या बनता जा रहा है, अब तो युवा भी इस रोग के शिकार होने लगे हैं। अगर इस रोग का समय रहते इलाज न किया जाए तो रोगी अंधेपन का शिकार हो जाता है।

रक्त मोतियाबिंद में सभी चीजें लाल, हरी, काली, पीली और सफेद नजर आती हैं। परिम्लामिन मोतियाबिंद में सभी ओर पीला-पीला नजर आता है। ऐसा लगता है जैसे कि पेड़-पौधों में आग लग गई हो।

सभी प्रकार के मोतियाबिंद में आंखों के आस-पास की स्थिति भी अलग-अलग होती है। वातज मोतियाबिंद में आंखों की पुतली लालिमायुक्त, चंचल और कठोर होती है। पित्तज मोतियाबिंद में आंख की पुतली कांसे के समान पीलापन लिए होती है।

कफज मोतियाबिंद में आंख की पुतली सफेद और चिकनी होती है या शंख की तरह सफेद खूँटों से युक्त व चंचल होती है। सन्निपात के मोतियाबिंद में आंख की पुतली मूंगे या पद्म पत्र के समान तथा उक्त सभी के मिश्रित लक्षणों वाली होती है। परिम्लामिन में आंख की पुतली भद्दे रंग के कांच के समान, पीली व लाल सी, मैली, रूखी और नीलापन लिए होती है।

आंखों में लगाने वाली औषधियाँ:-
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त्रिफला के जल से आंखें धोना:-
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आयुर्वेद में हरड़ की छाल (छिलका), बहेड़े की छाल और आमले की छाल - इन तीनों को त्रिफला कहते हैं । यह त्रिदोषनाशक है अर्थात् वात, पित्त, कफ इन तीनों दोषों के कुपित होने से जो रोग उत्पन्न होते हैं उन सबको दूर करने वाला है । मस्तिष्क सम्बन्धी तथा उदर रोगों को दूर भगाता है तथा इन्हें शक्ति प्रदान करता है । सभी ज्ञानेन्द्रियों के लिये लाभदायक तथा शक्तिप्रद है । विशेषतया चक्षुरोग के लिये तो रामबाण है । कभी-कभी स्वस्थ मनुष्यों को भी त्रिफला के जल से अपने नेत्र धोते रहना चाहिये । नेत्रों के लिए अत्यन्त लाभदायक है । कभी-कभी त्रिफला की सब्जी खाना भी हितकर है ।

धोने की विधि:-
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त्रिफला को जौ से समान (यवकुट) कूट लो और रात्रि के समय किसी मिट्टी, शीशे वा चीनी के पात्र में शुद्ध जल में भिगो दो । दो तोले वा एक छटांक त्रिफला को आधा सेर वा एक सेर शुद्ध जल में भिगोवो । प्रातःकाल पानी को ऊपर से नितारकर छान लो । उस जल से नेत्रों को खूब छींटे लगाकर धोवो । सारे जल का उपयोग एक बार के धोने में ही करो । इससे निरन्तर धोने से आंखों की उष्णता, रोहे, खुजली, लाली, जाला, मोतियाबिन्द आदि सभी रोगों का नाश होता है । आंखों की पीड़ा (दुखना) दूर होती है, आंखों की ज्योति बढ़ती है । शेष बचे हुए फोकट सिर पर रगड़ने से लाभ होता है ।

त्रिफला की टिकिया:-
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त्रिफला को जल के साथ पीसकर टिकिया बनायें और आंखों पर रखकर पट्टी बांध दें । इससे तीनों दोषों से दुखती हुई आंखें ठीक हो जाती हैं ।

हरड़ की गिरी (बीज) को जल के साथ निरन्तर आठ दिन तक खरल करो । इसको नेत्रों में डालते रहने से मोतियाबिन्द रुक जाता है । यह रोग के आरम्भ में अच्छा लाभ करता है ।

मोतियाबिंद की शुरुआती अवस्था में भीमसेनी कपूर स्त्री के दूध में घिसकर नित्य लगाने पर यह ठीक हो जाता है।

हल्के बड़े मोती का चूरा 3 ग्राम और काला सुरमा 12 ग्राम लेकर खूब घोंटें। जब अच्छी तरह घुट जाए तो एक साफ शीशी में रख लें और रोज सोते वक्त अंजन की तरह आंखों में लगाएं। इससे मोतियाबिंद अवश्य ही दूर हो जाता है।

छोटी पीपल, लाहौरी नमक, समुद्री फेन और काली मिर्च सभी 10-10 ग्राम लें। इसे 200 ग्राम काले सुरमा के साथ 500 मिलीलीटर गुलाब अर्क या सौंफ अर्क में इस प्रकार घोटें कि सारा अर्क उसमें सोख लें। अब इसे रोजाना आंखों में लगाएं।

10 ग्राम गिलोय का रस, 1 ग्राम शहद, 1 ग्राम सेंधा नमक सभी को बारीक पीसकर रख लें। इसे रोजाना आंखों में अंजन की तरह प्रयोग करने से मोतियाबिंद दूर होता है।

मोतियाबिंद में उक्त में से कोई भी एक औषधि आंख में लगाने से सभी प्रकार का मोतियाबिंद धीरे-धीरे दूर हो जाता है। सभी औषधियां परीक्षित हैं।

नेत्र रोगों में कुदरती पदार्थों से ईलाज करना फ़ायदेमंद रहता है। मोतियाबिंद बढती उम्र के साथ अपना तालमेल बिठा लेता है। अधिमंथ बहुत ही खतरनाक रोग है जो बहुधा आंख को नष्ट कर देता है।

आंखों की कई बीमारियों में नीचे लिखे सरल उपाय करने हितकारी सिद्ध होंगे:-

सौंफ़ नेत्रों के लिये हितकर है। मोतियाबिंद रोकने के लिये इसका पावडर बनालें। एक बडा चम्मच भर सुबह शाम पानी के साथ लेते रहें। नजर की कमजोरी वाले भी यह उपाय करें।

विटामिन ए नेत्रों के लिये अत्यंत फ़ायदेमंद होता है। इसे भोजन के माध्यम से ग्रहण करना उत्तम रहता है। गाजर में भरपूर बेटा केरोटिन पाया जाता है जो विटामिन ए का अच्छा स्रोत है। गाजर कच्ची खाएं और जिनके दांत न हों वे इसका रस पीयें। २०० मिलि.रस दिन में दो बार लेना हितकर माना गया है। इससे आंखों की रोशनी भी बढेगी। मोतियाबिंद वालों को गाजर का उपयोग अनुकूल परिणाम देता है।

आंखों की जलन,रक्तिमा और सूजन हो जाना नेत्र की अधिक प्रचलित व्याधि है। धनिया इसमें उपयोगी पाया गया है।सूखे धनिये के बीज १० ग्राम लेकर ३०० मिलि. पानी में उबालें। उतारकर ठंडा करें। फ़िर छानकर इससे आंखें धोएं। जलन,लाली,नेत्र शौथ में तुरंत असर मेहसूस होता है।

आंवला नेत्र की कई बीमारियों में लाभकारी माना गया है। ताजे आंवले का रस १० मिलि. ईतने ही शहद में मिलाकर रोज सुबह लेते रहने से आंखों की ज्योति में वृद्धि होती है। मोतियाबिंद रोकने के तत्व भी इस उपचार में मौजूद हैं।

भारतीय परिवारों में खाटी भाजी की सब्जी का चलन है। खाटी भाजी के पत्ते के रस की कुछ बूंदें आंख में सुबह शाम डालते रहने से कई नेत्र समस्याएं हल हो जाती हैं। मोतियाबिंद रोकने का भी यह एक बेहतरीन उपाय है।

अनुसंधान में साबित हुआ है कि कद्दू के फ़ूल का रस दिन में दो बार आंखों में लगाने से मोतियाबिंद में लाभ होता है। कम से कम दस मिनिट आंख में लगा रहने दें।

घरेलू चिकित्सा के जानकार विद्वानों का कहना है कि शहद आंखों में दो बार लगाने से मोतियाबिंद नियंत्रित होता है।

लहसुन की २-३ कली रोज चबाकर खाना आंखों के लिये हितकर है। यह हमारे नेत्रों के लेंस को स्वच्छ करती है।

पालक का नियमित उपयोग करना मोतियाबिंद में लाभकारी पाया गया है। इसमें एंटीआक्सीडेंट तत्व होते हैं। पालक में पाया जाने वाला बेटा केरोटीन नेत्रों के लिये परम हितकारी सिद्ध होता है। ब्रिटीश मेडीकल रिसर्च में पालक का मोतियाबिंद नाशक गुण प्रमाणित हो चुका है।

एक और सरल उपाय बताते हैं- अपनी दोनों हथेलियां आंखों पर ऐसे रखें कि ज्यादा दबाव मेहसूस न हो। हां, हल्का सा दवाब लगावे। दिन में चार-पांच बार और हर बार आधा मिनिट के लिये करें। मोतियाबिंद से लडाई का अच्छा तरीका है।

किशमिश ,अंजीर और खारक पानी में रात को भिगो दें और सुबह खाएं । मोतियाबिंद की अच्छी घरेलू दवा है।

भोजन के साथ सलाद ज्यादा मात्रा में शामिल करें । सलाद पर थोडा सा जेतून का तेल भी डालें। इसमें प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत करने के गुण हैं जो नेत्रों के लिये भी हितकर है।

मोतियाबिंद दो प्रकार का होता है:-

nuclear cataract.

cortical cataract.

उक्त दोनो तरह के मोतियाबिंद बनने से रोकने के लिये विटामिन ए तथा बी काम्प्प्लेक्स का दीर्घावधि तक उपयोग करने की सलाह दी जाती है। अगर मोतियाबिंद प्रारंभिक हालत में है तो रोक लगेगी।

खाने वाली औषधियाँ:-
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आंखों में लगने वाली औषधि के साथ-साथ जड़ी-बूटियों का सेवन भी बेहद फायदेमन्द साबित होता है। एक योग इस प्रकार है, जो सभी तरह के मोतियाबिंद में फायदेमन्द है-

500 ग्राम सूखे आँवले गुठली रहित, 500 ग्राम भृंगराज का संपूर्ण पौधा, 100 ग्राम बाल हरीतकी, 200 ग्राम सूखे गोरखमुंडी पुष्प और 200 ग्राम श्वेत पुनर्नवा की जड़ लेकर सभी औषधियों को खूब बारीक पीस लें। इस चूर्ण को अच्छे प्रकार के काले पत्थर के खरल में 250 मिलीलीटर अमरलता के रस और 100 मिलीलीटर मेहंदी के पत्रों के रस में अच्छी तरह मिला लें। इसके बाद इसमें शुद्ध भल्लातक का कपड़छान चूर्ण 25 ग्राम मिलाकर कड़ाही में लगातार तब तक खरल करें, जब तक वह सूख न जाए। इसके बाद इसे छानकर कांच के बर्तन में सुरक्षित रख लें। इसे रोगी की शक्ति व अवस्था के अनुसार 2 से 4 ग्राम की मात्रा में ताजा गोमूत्र से खाली पेट सुबह-शाम सेवन करें।

फायदेमन्द व्यायाम व योगासन:-
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औषधियाँ प्रयोग करने के साथ-साथ रोज सुबह नियमित रूप से सूर्योदय से दो घंटे पहले नित्य क्रियाओं से निपटकर शीर्षासन और आंख का व्यायाम अवश्य करें।

आंख के व्यायाम के लिए पालथी मारकर पद्मासन में बैठें। सबसे पहले आंखों की पुतलियों को एक साथ दाएँ-बाएँ घुमा-घुमाकर देखें फिर ऊपर-नीचे देखें। इस प्रकार यह अभ्यास कम से कम 10-15 बार अवश्य करें। इसके बाद सिर को स्थिर रखते हुए दोनों आंखों की पुतलियों को एक गोलाई में पहले सीधे फिर उल्टे (पहले घड़ी की गति की दिशा में फिर विपरीत दिशा में) चारों ओर घुमाएँ। इस प्रकार कम से कम 10-15 बार करें। इसके बाद शीर्षासन करें।

कुछ खास हिदायतें:-
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मोतियाबिंद के रोगी को गेहूँ की ताजी रोटी खानी चाहिए। गाय का दूध बगैर चीनी का ही पीएँ। गाय के दूध से निकाला हुआ घी भी सेवन करें। आंवले के मौसम में आंवले के ताजा फलों का भी सेवन अवश्य करें। फलों में अंजीर व गूलर अवश्यक खाएं।

सुबह-शाम आंखों में ताजे पानी के छींटे अवश्य मारें। मोतियाबिंद के रोगी को कम या बहुत तेज रोशनी में नहीं पढ़ना चाहिए और रोशनी में इस प्रकार न बैठें कि रोशनी सीधी आंखों पर पड़े। पढ़ते-लिखते समय रोशनी बार्ईं ओर से आने दें।

वनस्पति घी, बाजार में मिलने वाले घटिया-मिलावटी तेल, मांस, मछली, अंडा आदि सेवन न करें। मिर्च-मसाला व खटाई का प्रयोग न करें। कब्ज न रहने दें। अधिक ठंडे व अधिक गर्म मौसम में बाहर न निकलें.

आभार -बालकृष्ण जी महराज

Monday, February 09, 2015

चाय, कॉफी और कोल्डड्रिंक -दांतों के दुश्मन -

आमतौर पर ये धारणा होती है कि सिर्फ गुटखा, तंबाकु और सुपारी खाने से ही दांत खराब होते हैं। लेकिन हाल में इंडियन डेंटल एसोसिएशन द्वारा किए गए सर्वे में खुलासा हुआ कि चाय, कॉफी, कोल्ड ड्रिंक और ज्यूस भी दांतों का पीलापन बढ़ता है। अस्पताल में पहुंचने वाले डेंटल मरीजों में से 50 प्रतिशत मरीजों के दांत इसी वजह से पीले हुए हैं।




ये खुलासा गत दिनों इंडियन डेंटल एसोसिएशन द्वारा किए गए सर्वे में हुअा। कई लोग दांतों का पीलापन दूर करने ब्लीचिंग तकनीक का इस्तेमाल करते हैं। फिलहाल ये तकनीक डेंटल कॉलेज में ही उपलब्ध हैं। सर्वे में ये बात भी सामने आई है कि ज्यादातर ऐसे लोग हैं जिनके दांत स्मोकिंग, गुटाखा, पान मसाला या सुपारी खाने से पीले पड़े। लेकिन ऐसे मरीज भी कम नहीं जिनके दांत ज्यादा काेल्डड्रिंक, चाय, कॉफी अौर ज्यूस पीने पड़े हैं।

ऐसेहोती है दांतों की ब्लीचिंग :-
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डेंटलस्पेशलिस्ट डॉ. रेखा मीणा ने बताया कि दांतों की ब्लीचिंग दो तरह से होती है। पहली तकनीक में दांतों पर सिंपल ब्लीच कर दिया जाता है जिससे दांत कुछ दिनों के लिए सफेद हो जाते हैं। दूसरी तकनीक में पेस्ट मेटेरियल बना कर कुछ हफ्तों के लिए दांतों पर लगाकर रखना पड़ता है। इस तकनीक से दांत एक दो साल तक सफेद बने रहते हैं।

स्थाई सफेदी भी बनी रह सकती है :-
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डॉ.मीणा ने बताया कि दांतों को परमानेंट सफेद बनाए रखने के लिए उन पर पोर्सलिन का लेमिनेशन किया जाता है। इसके लिए पहले दांतों को पहले थाेड़ा घिसा जाता है। फिर दांतों का साइज लिया जाता है। जिनके आधार पर लैब में पोर्सलिन लेमिलेशन तैयार करके दांतों पर लगा दिया जाता है। इस तकनीक से कई साल तक दांत सफेद बने रहते है।

दांतों की ब्लीचिंग के बारे में अभी ज्यादा लोगों को जानकारी नहीं है। ये सही है कि चाय कॉफी और कोल्ड ड्रिंक से भी दांतों में पीलापन आता है। लेकिन दांतों की ब्लीचिंग या पोर्सलिन लेमिलेशन के साइड इफेक्ट भी हैं। इससे सेंस्टीविटी होने के साथ दांत कमजोर भी हो जाते हैं।

स्पोर्ट्स ड्रिंक दांत के कुदरती कड़ापन को कम करता है और उस पर पाई जाने वाली बेहद उपयोगी एनामेल परत को नष्ट कर देता है। एक नए शोध से पता चलता है कि इस उत्पाद में घुला अम्ल दांत की ऊपरी चमकीली परत को भारी नुकसान पहुंचाता है। एनामेल को दांत का सुरक्षा कवच माना जाता है। एनामेल की परत नष्ट होने के बाद दांत खुरदरी हड्डी की तरह दिखने लगते हैं। इस परत के नष्ट होने की सूरत में कोई भी ठंडा या गर्म आहार लेने पर दांत में असहनीय सिहरन पैदा होती है या दर्द होता है।

वैज्ञानिकों द्वारा किए गए शोध से स्पष्ट हुआ है कि अभी तक दांतों की सुंदरता का दुश्मन समझा जाने वाला पनीर ही दांतों में होने वाले छिद्रों को दूर रखने का काम करता है। वैज्ञानिकों ने करीब 25 वर्षों तक दांतों का गहन अध्ययन करने पर पाया कि पनीर में मौजूद कैल्शियम और लार मिलकर जो जटिल आणविक संरचना बनाते हैं, वह दांतों की घटती सुरक्षा परत को पहले जैसा करने का काम करती है। पनीर में मौजूद चर्बी और नमक के कारण इसे मोटापा बढ़ाने वाला माना जाता था। इस अध्ययन से यह भी पता चला है कि पनीर खाने वाले व्यक्तियों के दांतों की सुरक्षा परत को होने वाला नुकसान 71 प्रतिशत कम हो जाता है।


 शोधकर्ताओं का मानना है कि पनीर में मौजूद कैल्शियम और फास्फेट सुरक्षा परत अथवा एनेमल को टूटने व कमजोर होने से बचाते हैं और इसे चबाने के कारण मुंह में लार भी ज्यादा बनती है, जो दांतों को साफ करने का कार्य करती है। पोषण विज्ञानी कहते हैं कि पनीर दांतों में होने वाली सड़न और छिद्रों से लड़ने का कारगर तरीका है किन्तु इसका सेवन भी एक निर्धारित मात्रा में ही किया जाना चाहिए।
उपचार और प्रयोग -

Friday, January 30, 2015

मोटी आवाज है बनाये आप #सुरीली आवाज .....!

* हर व्यक्ति कद्रदान है मीठी,स्पष्ट लहजे वाली और मन में गहरे उतर जाने वाली आवाज और ये सभी चाहते हैं। यह आपको मिलती भी है, लेकिन उम्र बढ़ने के साथ इसका असर कम होता जाता है। अगर आप अपनी आवाज पर उम्र का असर नहीं होने देना चाहते है तो कुछ उपाय है जिनको करके पा सकते है सुरीली आवाज ...!


* आप गले को हमेशा तर रखिये मेरा मतलब पानी तथा नारियल पानी जैसे कुछ पेय पदार्थों से है। आपकी वोकल कॉर्ड्‌स हमेशा अपने आस-पास उपस्थित ग्लैंड्स से निकलने वाले लार जैसे पदार्थ से चिकनी बनी रहती हैं। इस चिकनेपन को बनाए रखने के लिए शरीर को पर्याप्त नम बनाए रखने की जरूरत होती है। तो बस गला तर करते रहिए।

* बहुत ज्यादा मसालेदार, चटपटा तथा चरबीयुक्त भोजन भी गले के लिए खतरनाक हो सकता है। पेट में होने वाली गड़बड़ियों के फलस्वरूप 'एसिड रिफ्लक्स' जैसी दिक्कत पनप सकती है। इससे गला बार-बार चोक होता है व आवाज पर असर पड़ता है।

* रोज कुछ न कुछ बक-बक कीजिए जी हाँ ..रोजाना कुछ देर की गई बातचीत वोकल कॉर्ड्स को एक तरह की कसरत करवाती हैं और इन्हें लंबे समय तक जवान बनाए रखती हैं।

* शॉवर के नीचे नहाते हुए गाना गाने से आपकी 'लैरिंक्स' (कंठ) की मांसपेशियां ताकतवर बनी रहती हैं। साथ ही वॉइस बॉक्स में चिकनापन बना रहता है।

* आप चिल्लाओ मत इससे वोकल कॉर्ड्स को खुलने-बंद होने में परेशानी होगी। अगर ऐसा बार-बार हुआ तो कॉर्ड्स में नोड्यूल्स यानी सेल्यूलोज जैसा जमाव हो सकता है। इससे कंठ की मांसपेशियां जल्दी थकेंगी और आराम की स्थिति में नहीं रहेंगी।

* दांतों की हिफाजत करे  जी हां, जब आप कोई भी दांत खोते हैं तो जबड़े की हड्डी ढीली हो जाती है। और परिणामस्वरूप आपका चेहरा अंदर की ओर धंसने लगता है और अब मुंह की मसल्स बोलने में पहले जैसी मदद नहीं कर पातीं। साथ ही जबान को भी बोलते समय मुंह में गति करने में दिक्कत आती है। इसलिए कोशिश करें कि बेवजह दांतों को नुकसान न पहुंचे।

* थके और ढीले तरीके से खड़े रहने-बैठने से भी आवाज पर असर पड़ता है। इसके कारण पूरी वोकल ट्रेक्ट बदल जाती है।

करे आप ये उपाय :-
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* 2-2 ग्राम मुलहठी, आँवले और मिश्री का 20 से 50 मिलिलीटर काढ़ा देने से या भोजन के पश्चात् 1 ग्राम काली मिर्च के चूर्ण में घी डालकर चटाने से लाभ होता है।

* आवाज सुरीली बनाने के लिए 10 ग्राम बहेड़ा की छाल को गोमूत्र में भावित कर (किसी चूर्ण को किसी द्रव्य के साथ मिलाकर सूख जायें तब तक घोंटना = भावित करना) चूसने से आवाज एकदम सुरीली होती है। यह प्रयोग खाँसी में भी लाभदायक है।

* 10-10 ग्राम अदरक व नींबू के रस में एक ग्राम सेंधा नमक मिलाकर दिन में तीन बार धीरे-धीरे पीने से आवाज मधुर होती है।

* आवाज सुरीली करने के लिए घोड़ावज का आधा या 1 ग्राम चूर्ण 2 से 5 ग्राम शहद के साथ लेने से लाभ होता है। यह प्रयोग कफ होने पर भी लाभकारी है।

* जामुन की गुठलियों को पीसकर शहद में मिलाकर गोलियाँ बना लें। दो-दो गोली नित्य चार बार चूसें। इससे बैठा गला खुल जाता है। आवाज का भारीपन ठीक हो जाता है। अधिक बोलने-गानेवालों के लिए यह विशेष चमत्कारी प्रयोग है।

* 400 ग्राम शक्कर 400 ग्राम गाय का घी 64 ग्राम बिदारी कंद 128 ग्राम बंस लोचन 128 ग्राम शहद इन सभी को एक मिटटी के पात्र में मिला के रख ले और 25 ग्राम सुबह प्रात काल इसका सेवन करे दो माह आवाज सुरीली हो जायेगी..!

Wednesday, October 15, 2014

गला बैठ गया है -

बहुत से लोगो का मौसम बदलने से या सर्दी-गर्मी से -या जादा ठंडा पानी पीने से या बहुत तेज चिल्लाने से गला बेठ जाता है -उनके लिए कुछ उपाय है जिनको करे और लाभ ले-







कच्चा सुंहागा आधा ग्राम (मटर के बराबर सुहागे को टुकड़ा) मुँह में रखें और रस चुसते रहें। उसके गल जाने के बाद स्वरभंग तुरंत आराम हो जाता है। दो तीन घण्टों मे ही गला बिलकुल साफ हो जाता है। उपदेशकों और गायकों की बैठी हुई आवाज खोलने के लिये अत्युत्तम है।

सोते समय एक ग्राम मुलहठी के चूर्ण को मुख में रखकर कुछ देर चबाते रहे। फिर वैसे ही मुँह में रखकर सो रहें। प्रातः काल तक गला अवश्य साफ हो जायेगा। मुलठी चुर्ण को पान के पत्ते में रखकर लिया जाय तो और भी आसान और उत्तम रहेगा। इससे प्रातः गला खुलने के अतिरिक्त गले का दर्द और सूजन भी दूर होती है।

रात को सोते समय सात काली मिर्च और उतने ही बताशे चबाकर सो जायें। सर्दी जुकाम, स्वर भंग ठीक हो जाएगा। बताशे न मिलें तो काली मिर्च व मिश्री मुँह में रखकर धीरे-धीरे चुसते रहने से बैठा खुल जाता है।

भोजन के पश्चात दस काली मिर्च का चुर्ण घी के साथ चाटें अथवा दस बताशे की चासनी में दस काली मिर्च का चुर्ण मिलाकर चाटें।