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Wednesday, August 05, 2015

मूत्राशय में दर्द के निवारण की औषधि


मूत्र विकार के अंतर्गत कई रोग आते हैं जिनमें मूत्र की जलन, मूत्र रुक जाना, मूत्र रुक-रुककर आना, मूत्रकृच्छ और बहुमूत्र प्रमुख हैं। यह सभी रोग बड़े कष्टदायी होते हैं। यदि इनका यथाशीघ्र उपचार न किया जाए तो घातक परिणाम भुगतने पड़ते हैं। यदि मूत्राशय में पेशाब इकट्ठा होने के बाद किसी रुकावट की वजह से बाहर न निकले तो उसे मूत्रावरोध कहते हैं।

स्त्रियों में किसी बाहरी चीज के कारण तथा पुरुषों में सूजाक, गरमी आदि से मूत्राशय एवं मूत्र मार्ग पर दबाव पड़ता है जिससे पेशाब रुक जाता है। वृद्ध पुरुषों की पौरुष ग्रंथि (प्रोस्टेट ग्लैंड) बढ़ जाती है जिसके कारण उनका मूत्र रुक जाता है। मूत्रकृच्छ में पेशाब करते समय दर्द होता है। जब मूत्राशय में दर्द उत्पन्न होता है तो पेशाब रुक जाता है। इसी प्रकार हिस्टीरिया (स्त्री रोग), चिन्ता, सिर में चोट लग जाना, आमाशय का विकार, खराब पीना, आतशक, कब्ज, पौष्टिक भोजन की कमी आदि के कारण भी बार-बार पेशाब आता है।

मूत्र की कमी या न निकलने से मूत्राशय फूल जाता है। रोगी को बड़ी बेचैनी होती है| मूत्र बड़े कष्ट के साथ बूंद-बूंद करके निकलता है। कब्ज, मन्दाग्नि, अधिक प्यास, पेशाब अधिक आने, मूत्र पीला होने आदि के कारण रोगी को नींद नहीं आती। वह दिन- प्रतिदिन कमजोर होता जाता है। कमर, जांघों तथा पिंडलियों में दर्द होता है।

करे ये प्रयोग:-
  1. मक्के के भुट्टे (कच्ची मक्का) को पानी उबाल लें| फिर लगभग एक गिलास पानी छानकर उसमें मिश्री मिलाकर पी जाएं,  इससे पेशाब की जलन जाती रहती है।
  2. पेशाब की जलन दूर करने के लिए रात में तरबूज को ओस में रखें तथा सुबह उसका रस निकालकर मिश्री मिलाकर पी जाएं।
  3. एक गिलास पानी में 25 ग्राम जौ उबालें| फिर उसे ठंडा करके केवल पानी को घूंट-घूंट पिएं
  4. लगभग चार चम्मच ईसबगोल की भूसी पानी में भिगो दें, फिर उसमें बूरा डालकर पी जाएं, पेशाब की जलन शान्त हो जाएगी।
  5. चार चम्मच फालसे के रस में काला नमक डालकर पिएं, पेशाब की जलन जाती रहेगी।
  6. एक कप चावल का मांड़ लेकर उसमें चीनी मिलाकर पिएं।
  7. थोड़ा-सा बथुआ पानी में उबालें| फिर उसमें काला नमक, भुना जीरा, कालीमिर्च तथा जरा-सी शक्कर डालकर सेवन करें।
  8. 50 ग्राम प्याज के छोटे-छोटे टुकड़े काटें| फिर एक गिलास पानी में वह प्याज उबालकर छान लें| अब उसमें थोड़ी-सी चीनी डालकर सेवन करें| यह मूत्र रोगी के लिए बड़ा अच्छा नुस्खा है।
  9. एक कप अनार का शरबत सुबह नाश्ते के बाद सेवन करें।
  10. यदि पेशाब में जलन हो, खुलकर पेशाब न आए या बूंद-बूंद पेशाब हो तो पालक के एक कप रस में आधा कप नारियल का पानी मिलाकर पी जाएं।
  11. पीपल के वृक्ष की पांच कोंपलों को पानी में उबालें| जब पानी आधा रह जाए तो उसे छानकर शक्कर डालकर पी जाएं।
  12. हरे आंवले के रस को पानी में मिलाकर पिएं| स्वाद के लिए जरा-सी शक्कर या शहद डाल लें।
  13. कलमी शोरा दो चम्मच तथा बड़ी इलायची के दानों का चूर्ण एक चम्मच-दोनों को मिलाकर सेवन करें।
  14. बेल के पत्तों को पानी में पीस लें| इसमें जरा-सी कालीमिर्च तथा दो चम्मच शहद मिलाएं| फिर घूंट-घूंट पी जाएं।
  15. प्रतिदिन सुबह एक कप गाजर के रस में नीबू निचोड़कर पिएं।
  16. गन्ने के ताजे रस में नीबू तथा सेंधा नमक मिलाकर पीने से मूत्र की जलन दूर होती है| मूत्र खुलकर आता है।
  17. एक कप ककड़ी के रस में शक्कर मिलाकर सेवन करें।
  18. यदि पेशाब करते समय दर्द होता हो तो दूध में सोंठ और मिश्री मिलाकर सेवन करें।
  19. गुर्दे की खराबी के कारण यदि पेशाब बंद हो गया हो तो एक चम्मच मूली के रस में जरा- सा सेंधा नमक मिलाकर पी जाएं।
  20. अगर पेशाब में रक्त आता हो तो कुलफा के साग के पत्तों का रस चार-चार चम्मच की मात्रा में दिनभर में तीन बार पिएं।
  21. यदि पेशाब में रक्त आने की शिकायत हो तो एक चम्मच दूब के रस में जरा- सी नागकेसर मिलाकर सेवन करें।
  22. 6 माशा जवाखार में गुड़ मिलाकर सेवन करें।
  23. नीबू के बीजों को पीसकर नाभि पर लेप करने से रुका हुआ पेशाब शीघ्र आने लगता है।
  24. केले के तने का रस चार चम्मच पीने से पेशाब आ जाता है, मात्रा इससे जादा न ले।
  25. सुबह-शाम एक-एक चम्मच काले तिल चबाकर खाना चाहिए।
  26. आधा चम्मच अजवायन दिन में दो बार गुनगुने पानी के साथ सेवन करें।
  27. आंवले के एक चम्मच रस में एक चुटकी हल्दी तथा आधा चम्मच शहद मिलाकर सेवन करें।
  28. अनन्नास की फांकों पर पीपल का चूर्ण डालकर खाएं।
  29. मसूर की दाल सुबह पकवाकर खाली पेट पिएं।
  30. सेब खाने से बार-बार पेशाब आना कम हो जाता है।
  31. काले तिल में गुड़ मिलाकर खाने से बहुमूत्र रोग ठीक हो जाता है।
  32. दो चम्मच पालक के रस में काला नमक डालकर सेवन करें, रात को दूध में छुहारा डालकर पिएं।
  33. 1 ग्राम जावित्री तथा 5 ग्राम मिश्री को गाय के दूध के साथ लें।
  34. भुने हुए चने खाने से बार-बार पेशाब जाने की हालत ठहर जाती है।
  35. 3 ग्राम खसखस के दाने थोड़े से गुड़ में मिलाकर खा जाएं।
  36. पके हुए केले को आंवले के रस के साथ सेवन करें| पहले केला खाएं, ऊपर से रस पी लें।
  37. सुबह-शाम 5-5 ग्राम पिसी हल्दी को दूध के साथ लेने से बहुमूत्रता की व्याधि खत्म हो जाती है।
परहेज 
  • उचित समय पर पचने वाला हल्का भोजन करें| सब्जियों में लौकी, तरोई, टिण्डा, परवल, गाजर, टमाटर, पालक, मेथी, बथुआ, चौलाई, कुलफा आदि का सेवन करें| दालों में मूंग व चने की दाल खाएं।
  • फलों में सेब, पपीता, केला, नारंगी, संतरा, ककड़ी, खरबूजा, तरबूज, चीकू आदि का प्रयोग करें। 
  • अरहर, मलका, मसूर, मोठ, लोबिया, काबुली चने आदि का सेवन न करें।
  • गुड़, लाल मिर्च, मिठाई, तेल, खटाई, अचार, मसाले, मैथुन तथा अधिक व्यायाम से परहेज करें।

Tuesday, July 28, 2015

काले मस्से चेहरे से हटाये .?

शरीर पर मस्‍से बहुत अजीब लगते हैं। काले मस्‍से तो चेहरे की खूबसूरती को बिगाड़ देते हैं। त्‍वचा पर पेपीलोमा वायरस के कारण छोटे, खुरदुरे कठोर पिंड बन जाते हैं जिसे मस्‍सा कहते हैं। मस्‍से काले और भूरे रंग के होते हैं। मस्‍से 8 से 12 प्रकार के होते हैं। मस्‍से अक्‍सर अपने-आप समाप्‍त हो जाते हैं, लेकिन कुछ मस्‍से इलाज के बाद जाते हैं।

मस्‍से को काटने और फोड़ने के कारण मस्‍से का वायरस शरीर के अन्‍य हिस्‍सों में भी चला जाता है जिसके कारण मस्‍से हो जाते हैं। कभी कभी मस्‍से का वायरस एक आदमी से दूसरे आदमी की त्‍वचा पर आकर मस्‍सा बना देते हैं।

कई बार मस्‍से आपके लिए परेशानी और शर्मिंदगी का कारण बन सकते हैं। अगर आप इनसे राहत पाना चाहते हैं, तो कुछ घरेलू उपाय आजमा सकते हैं। ये उपाय आपको त्‍वचा के इन बिन बुलाये मेहमानों से राहत दिलाने में मदद करेंगे।
  • लहसुन की कली को छील लीजिए, उसके बाद उसे काटकर मस्‍सों पर र‍गडि़ए, कुछ दिन बाद मस्‍से सूखकर झड़ जाएंगे।
  • बेकिंग सोडा और अरंडी के तेल को रात में मस्सों लगाकर सो जाइए, ऐसा करने से मस्‍से धीरे-धीरे मस्‍से समाप्‍त हो जाते हैं।
  • इनमें से सलिसिलिक अम्ल (salicylic acid) का मस्से पर प्रयोग सबसे कारगर पाया गया है।
  • मस्‍से को समाप्‍त करने के लिए प्‍याज भी फायदेमंद है। एक प्याज को लेकर उसके रस को दिन में एक बार नियमित रूप से लगाने से मस्‍से समाप्‍त होते हैं।
  • खट्टे सेब लेकर उनका जूस निकाल लीजिए और उसको दिन में कम से कम तीन बार मस्से की जगह पर लगाइए। इस जूस को नियमित रूप से लगाने पर आप पाएंगे कि मस्से धीरे-धीरे झड़ रहे हैं और तीसरे सप्ताह तक लगभग समाप्‍त हो जाएंगे।
  • मस्से को समाप्‍त करने के लिए एक अगरबत्ती जला लें और अगरबत्ती के जले हुए गुल को मस्से का स्पर्श कर तुरन्त हटा लें। ऐसा 8-10 बार करें, ऐसा करने से #मस्सा सूखकर झड़ जाएगा। अगर ज्‍यादा मस्से हों तो बारी-बारी से सभी मस्सों को इसी तरीके से जलाकर झड़ा दें। ध्यान रहे, अगरबत्ती का स्पर्श सिर्फ मस्से पर ही होना चाहिए।
  • मस्‍से वाले हिस्‍से को पाइनेपल के जूस में रखिए, इससे मस्‍से नष्‍ट करने वाले एंजाइम होते हैं।
  • अगर आपके घर पर एलोवेरा है, तो उसका एक छोटा का टुकड़ा काटिये और ताजा जैल मस्‍से पर लगायें। इससे मस्‍सा जल्‍दी ठीक हो जाता है।
  • रात को सोने से पहले और सुबह उठने के बाद मस्‍सों पर शहद लगाइए, इससे मस्‍से खत्‍म हो जाते हैं।
  • आलू का प्रयोग करने से भी मस्‍से समाप्‍त होते हैं। आलू को छीलकर काट लीजिए, उसके कटे हुए हिस्‍से को मस्‍सों पर रगडि़ए, ऐसा करने से कुछ दिनों में मस्‍से समाप्‍त हो जाते हैं।
  • बरगद के पेड़ के पत्तों का रस मस्सों के उपचार के लिए बहुत ही असरदार होता है। इस प्रयोग से त्वचा सौम्य हो जाती है और मस्से अपने आप गिर जाते हैं।
  • केले के छिलके को अंदर की तरफ से मस्से पर रखकर उसे एक पट्टी से बांध लें। और ऐसा दिन में दो बार करें और लगातार करते रहें जब तक कि मस्से ख़तम नहीं हो जाते।
  • अरंडी का तेल नियमित रूप से मस्सों पर लगायें। इससे मस्से नरम पड़ जायेंगे और धीरे धीरे गायब हो जायेंगे। अरंडी के तेल के बदले कपूर के तेल का भी प्रयोग कर सकते हैं।
  • पान में खाने का चूना मिलाकर घिसें। अम्लाकी को मस्सों पर तब तक मलते रहें जब तक मस्से उस रस को सोख न लें। या अम्लाकी के रस को मस्से पर मल कर पट्टी से बांध लें।
  • थूहर का दूध या कार्बोलिक एसिड सावधानीपूर्वक लगाने से मस्से निकल जाते हैं।
  • आश्चर्य जनक लाभ के लिए आप उसपर कच्चा लहसून भी लगा सकते हैं। दोनों को मस्सों पर लगाकर उसपर पट्टी बांधकर एक सप्ताह तक रहने दें। एक सप्ताह बाद पट्टी खोलने पर आप पाएंगे की मस्से गायब हो गए हैं।
मस्सों का होम्योपैथिक उपचार:-
  • थूजा:- ये एक प्रधान एंटीसाइकोटिक दवाहै। इस औषधि का प्रयोग किसी भी प्रकार के मस्सों में किया जा सकता है। मस्सों के यह सबसे अच्छी औषधि है। मस्सों के झुण्ड निकलने, सिर के पीछे मस्से जैसे दाने होने, ठोड़ी पर मस्से होने, लटकने वाले मस्से होने, खूनी मस्से जिससे कभी-कभी खून निकलता रहता है। इन सभी प्रकार के मस्सों को ठीक करने के लिए थूजा औषधि की 30 और 200 शक्ति का सेवन करना लाभदायक होता है। इन मस्सों में थूजा औषधि के सेवन के साथ-साथ थूजा Q (मूल अर्क ) को रूई पर लगाकर मस्सों पर लगाना चाहिए। गर्भावस्था के दौरान स्त्री को पहले कुछ दिनों तक सल्फर औषधि की 30 शक्ति का सेवन कराने और फिर कुछ दिनों तक थूजा औषधि की 30 शक्ति का सेवन कराने और अंत में मर्क सौल औषधि की 30 शक्ति सेवन कराने से बच्चे को मस्से नहीं होते। यदि त्वचा पर मस्से गोभी की तरह दिखाई दे तो इस औषधि का प्रयोग करना लाभकारी होता है। योनि के ऊपर -उसमे दर्द होता है की हाथ लगाया जाता स्वर यंत्र के अर्बुद में थूजा काफी लाभप्रद है।
  • नाइट्रिक ऐसिड का प्रयोग :- फूलगोभी की तरह बड़े खुरदरे मस्से, टेढ़े-मेढ़े मस्से एवं ऐसे मस्से जिसे धोने से बदबूदार खून निकलने लगता हो। छूने पर भी खून निकलने लगता है।इस तरह के मस्सों में नाइट्रिक ऐसिड औषधि की 12 शक्ति का प्रयोग किया जाता है। इस औषधि का प्रयोग लटकने एवं होंठों पर मस्से की तरह दाने होने पर भी किया जाता है।
  • नैट्रम म्यूर :-  पुराने मस्से, ऐसे मस्से जिसमें दर्द हो और मस्से को हल्का सा छू देने पर असहनीय दर्द हो। मस्से कभी-कभी जख्म में बदल जाता है।हाथ और अंगूठे में अनगिनित मस्से, ऐसे लक्षणों वाले मस्सों का उपचार नैट्रम-म्यूर औषधि की 30 शक्ति से फयदेमन्द होता है। यह रक्तहीन,कमजोर और हरित पाण्डु रोग ग्रस्त स्त्रियों की बीमारी में खास रूप से फायदा करती है।
  • ऐन्टिम टार्ट :- पुरुषों के जननेन्द्रिय की सुपारी के पीछे मस्से हो गए हों तो ऐन्टिम टार्ट औषधि की 12 शक्ति का प्रयोग किया जाता है। 
  • कॉस्टिकम :- कास्टिकम एक प्रधान सॉरा-बिष-नाशक और फास्फोरस की विरोधिनी दवा है। अगर शरीर पर छोटे-छोटे बहुत से ठोस मस्से हो गए हों जिसके जड़ मुलायम एवं ऊपर के मुंह कठोर और नोकदार हो तो ऐसे मस्सों को ठीक करने के लिए कॉस्टिकम औषधि की 30 शक्ति का प्रयोग करना लाभकारी होता है। नाखूनों के किनारे, बाहों, हाथों, पलकों एवं चेहरे पर होने वाले मस्सों में भी इस औषधि का उपयोग किया जाता है।
  • कैलि म्यूर :- हाथों पर मस्से होने पर कैलि म्यूर औषधि का सेवन करने के साथ इस औषधि की 3x मात्रा को एक चम्मच पानी में मिलाकर लोशन बनाकर मस्सों पर लगाना भी चाहिए।
  • सीपिया :- जननेन्द्रिय की आगे की त्वचा के अगले भाग या शरीर पर बड़े-बड़े कठोर एवं काले मस्से होने पर सीपिया औषधि की 30 शक्ति का प्रयोग करना हितकारी होता है। सीपिया के बाद सल्फर की जरूरत पड़ती है।
  • नैट्रम-म्यूर :- हथेलियों पर मस्से होने पर नैट्रम-म्यूर औषधि की 3x से 200 शक्ति का सेवन करना लाभकारी होता है।

Tuesday, June 30, 2015

राम बाण दवा-असगंध या अश्वगंधा


आयुर्वेद में जड़ी बूटियों का बड़ा महत्व है। इनके प्रयोग से मानव जाति को जीवनदान मिला है। इनमें से एक प्रसिध्द जड़ी बूटी है ‘असगंध’। अश्वगंधा एक बलवर्धक जड़ी है इसका पौधा झाड़ीदार होता है। जिसकी ऊंचाई आमतौर पर 3−4 फुट होती है। औषधि के रूप में मुख्यतः इसकी जड़ों का प्रयोग किया जाता है। कहीं−कहीं इसकी पत्तियों का प्रयोग भी किया जाता है। इसके बीज जहरीले होते हैं। असगंध बहमनेवर्री तथा बाराहरकर्णी इसी के नाम हैं। * अश्वगंधा या वाजिगंधा का अर्थ है अश्व या घोड़े की गंध। इसकी जड़ 4−5 इंच लंबी, मटमैली तथा अंदर से शंकु के आकार की होती है, इसका स्वाद तीखा होता है। चूंकि अश्वगंधा की गीली ताजी जड़ से घोड़े के मूत्र के समान तीव्र गंध आती है इसलिए इसे अश्वगंधा या वाजिगंधा कहते हैं। इस जड़ी को अश्वगंधा कहने का दूसरा कारण यह है कि इसका सेवन करते रहने से शरीर में अश्व जैसा उत्साह उत्पन्न होता है।

ये सस्ती होने के कारण यह मध्यम व निर्धन परिवारों के लिये रसायन का काम करती है। असगंध पंसारियों की दुकानों से सरलता से मिल जाती है। असगंध की जड़ भूरे रंग की होती है और स्वाद में कसैली होती है। इसकी जड़ कूटने से इसमें घोड़े के मूत्र की बू आती है।  नागपुर में उत्पन्न होने वाली असगंध उत्तम होती है, इसलिये इसे असगंध नागौरी कहते हैं। यह निम्नलिखित रोगों में प्रयोग की जाती है:-
  • असंगध से सूखा रोग से ग्रस्त, हड्डियों के पिंजर बच्चे मोटे ताजे हो जाते हैं। इसके प्रयोग से कमजोर बच्चों का वजन बढ़ जाता है। दूध पिलाने वाली स्त्रियों का दूध बढ़ जाता है।
  • इसके निरंतर प्रयोग से बुढ़ापा पास नहीं फटकता। सायु की कमजोरी, वात व सर्दी से उत्पन्न होने वाले रोगों में जैसे पट्ठों में दर्द होना। अंग सुन्न होना, कमर दर्द, पक्षाघात, शरीर पर च्युटियां चलना प्रतीत होना आदि पर असगंध सोने पर सोहागे का काम करता है।
  • पक्षाघात की दवाओं में जैसे महानारायण तेल, नारायण तेल अश्वगंधारिष्ट में इसका प्रयोग होता है।
  • असगंध एक वर्ष तक यथाविधि सेवन करने से शरीर रोग रहित हो जाता है। केवल सर्दीयों में ही इसके सेवन से दुर्बल व्यक्ति भी बलवान होता है। वृद्धावस्था दूर होकर नवयौवन प्राप्त होता है।
  • अश्वगंधा के चूर्ण की एक−एक ग्राम मात्रा दिन में तीन बार लेने पर शरीर में हीमोग्लोबिन लाल रक्त कणों की संख्या तथा बालों का काला पन बढ़ता है। रक्त में घुलनशील वसा का स्तर कम होता है तथा रक्त कणों के बैठने की गति भी कम होती है। अश्वगंधा के प्रत्येक 100 ग्राम में 789.4 मिलीग्राम लोहा पाया जाता है। लोहे के साथ ही इसमें पाए जाने वाले मुक्त अमीनो अम्ल इसे एक अच्छा हिमोटिनिक (रक्त में लोहा बढ़ाने वाला) टॉनिक बनाते हैं।
  • असंगध चूर्ण, तिल व घी 10-10 ग्राम लेकर और तीन ग्राम शहद मिलाकर नित्य सर्दी में सेवन करने से कमजोर शरीर वाला बालक मोटा हो जाता है।
  • अश्वगंधा का चूर्ण 6 ग्राम, इसमें बराबर की मिश्री और बराबर शहद मिलाकर इसमें 10 ग्राम गाय का घी मिलायें, इस मिश्रण को सुबह शाम शीतकाल में चार महीने तक सेवन करने से बूढ़ा व्यक्ति भी युवक की तरह प्रसन्न रहता है।
  • अश्वगंधा की जड़ के महीन चूर्ण को तीन ग्राम की मात्रा में गर्म प्रकृति वाली गाय के ताजे दूध से वात प्रकृति वाला शुद्ध तिल से और कफ प्रकृति का व्यक्ति गर्म पानी के साथ एक वर्ष तक सेवन करे तो निर्बलता दूर होकर सब व्याधियों का नाश होता है और निर्बल व्यक्ति बल प्राप्त करता है।
  • अश्वगंधा चूर्ण 20 ग्राम, तिल इससे दुगने, और उड़द आठ गुने अर्थात 140 ग्राम, इन तीनों को महीन पीसकर इसके बड़े बनाकर ताजे-ताजे एक ग्राम तक खायें।
  • अश्वगंधा चूर्ण और चिरायता बराबर-बराबर लेकर खरल (कूटकर) कर रखें। इस चूर्ण को 10-10 ग्राम की मात्रा में सुबह ग्राम शाम दूध के साथ खायें।
  • एक ग्राम अश्वगंधा चूर्ण में लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग मिश्री डालकर उबालें हुए दूध के साथ सेवन करने से वीर्य पुष्ट होता है, बल बढ़ता है।
  • शतावर, असगंधा, कूठ, जटामांसी और कटेहली के फल को 4 गुने दूध में मिलाकर या तेल में पकाकर लेप करने से लिंग मोटा होता है और लिंग की लम्बाई भी बढ़ जाती है।
  • कूटकटेरी, असगंध, वच और शतावरी को तिल के तेल में जला कर लिंग पर लेप करने से लिंग में वृद्धि होती है-असगंध चूर्ण को चमेली के तेल के साथ खूब मिलाकर लिंग पर लगाने से लिंग मज़बूत हो जाता है।
  • स्त्रियों को यह दवा खिलाते रहने से गर्भाशय के रोग दूर हो जाते हैं। बच्चा होने के पश्चात प्रसूता को असगंध का प्रयोग निरंतर कराते रहने से उसकी कमजोरी व दूसरे रोग दूर हो जाते हैं।
  • यदि प्रदर अधिक आता हो तो उसमें भी असगंध रामबाण का काम करती है।
  • जिन स्त्रियों के असमय ही स्तन ढीले हो जाते है असगंध का लेप करने से स्तन कड़े हो जाते हैं।
  • बांझ स्त्रियां यदि निरंतर प्रयोग करें तो भगवान की कृपा से संतान प्राप्ति होती है।
  • असगंध मर्दाना शक्ति उत्पन्न करती है। नपुंसकता को दूर करती है। वीर्य उत्पन्न करती है, शुक्रकीटों को बढ़ाती है।
  • शारीरिक, मानसिक और स्ायुविक कमजोरी, याद न रहना, आंखों में गढ़े पड़ जाना आदि रोगों में लाभदायक है।
  • स्वप्नदोष व प्रमेह को दूर करती है।
  • वात रोग जैसे गठिया, आमवात, जोड़ों का दर्द, शोच और जोड़ पत्थरा जाने पर असगंध खाने व लगाने पर कमाल का असर दिखाती है।
  • असगंध को गोमूत्र में घिस कर कंठमाला पर कुछ दिन लगाने से आराम होता है।
  • इसे बकरी के दूध के साथ प्रयोग करने से तपेदिक रोग ठीक हो जाता है।
  • असगंध पाचनांगों को शक्तिशाली बनाती है, भूख बढ़ाती है और भोजन की शरीरांश बनाती है।
  • असगंध मानसिक कमजोरी, पुराना सिर दर्द, नींद न आना, वहम व पागलपन जैसे रोगों की चोटी की दवा है।
  • हजारों वर्षों से असगंध का प्रयोग हमारे देश में होता आ रहा है।
  • बड़ों के लिये इसकी खुराक दो से चार ग्राम व बच्चों के लिये एक ग्राम प्रात: सायं दूध के साथ प्रयोग में लायें।

किसी भी प्रकार के बदन दर्द का घरेलू उपचार


सामग्री :- शुद्ध घानी का सरसों का तेल -100 ग्राम, लहसुन की कलियाँ -30 ग्राम, अजवाइन - 10 ग्राम, लौंग - 5 ग्राम, 
  • सरसों के तेल में सभी चीजो को डालकर धीमी-धीमी आंच पे पकाए सभी चीजे काली पड़ने पे उतार के ठंडा करे और छान कर एक शीशी में भर के रख ले .
  • जब भी लगाना हो एक कटोरी में थोडा निकाल कर गर्म कर ले और जितना सह सके मालिस करे इससे हर प्रकार का बदन दर्द दूर होता है इसे लगाने के बाद एक घंटे तक स्नान न करे .

Friday, April 24, 2015

क्या आप मच्छर भगाने के लिए अक्सर घर मे अलग- अलग दवाएं इस्तेमाल करते हैं

आप कोई कोई क्वाइल के रूप मे और कोई छोटी टिकिया के रूप मे तो कोई तो लिक्विड फॉर्म मे होती हैं एक सस्ता और घर पे ही मच्छर भगाने के लिए खुद ही बना ले ये हमने पुरे एक माह तक आजमाया है और आज भी यही प्रयोग कर रहे है।
नीम का तेल + कपूर = (All Out) या मोर्टीन का बाप:-
  • (All Out) की केमिकल वाली रीफिल खाली आपको आपके घर में मिल जायेगी या फिर अपने पडोसी से खाली रिफिल ले ले अब बाजार से आपको दो चीज लानी है एक तो नीम का तेल और कपूर।
  • खाली रिफिल में आप नीम का तेल डाले और थोड़ा सा कपूर भी डाल दे और रिफिल को मशीन में लगा दे पूरी रात मच्छर नही आयेगे।
  • जब एक प्राकृतिक तरीके से मच्छरो से छुटकारा मिल जाए तो पेस्टीसाइड का जहर अपने जिंदगी मे क्यो घोल रहे है ।
  • मच्छर भगाने वाली कवायल 100 सिगरेट के बराबर नुकसान करता है तो सावधान रहिए मच्छर भगाने का सबसे सस्ता, टिकाउ, आसान और देसी तरीका है पैसे और स्वास्थ दोनों की बचत है।
एक प्रयोग और भी आजमाए :-
  • आवश्यक सामग्री :- एक लैम्प (लालटेन) या स्प्रिट लैम्प, नीम का तेल, कपूर(Camphour), मिटटी का तेल(Kerosene Oil), नारियल का तेल(Coconut Oil)
  • कैसे बनाये :-  एक छोटी लैम्प में मिटटी के तेल में 30 बुँदे नीम के तेल की डालें, दो टिक्की कपूर को 20 ग्राम नारियल का तेल में पीस इसमें घोल लो इसे जलाने पर मच्छर भाग जाते है और जब तक वो लैम्प जलती रहती है मच्छर नहीं आते है आज ही लाये और खुद आजमाए।
  • दिया:- नारियल तेल में नीम के तेल को डाल कर उसका दिया जलाये इससे भी मच्छर नही आयेंगे.
  • नीबू का प्रयोग :-कभी -कभी आप इस प्रकार की खुली जगह पे सोने को मजबूर होते है जब घर में लाईट नहीं आती है तो छत पे सोना होता है और गुड नाईट या आल आउट न लगा पाना आपकी मज़बूरी है। और ये मच्छर महाशय आपको सोने नहीं देते है। फिर आप रात भर तालियाँ बजाते रहते है और सो नहीं पाते है। 
  • तो मित्रो एक साधारण सा उपाय है एक नीबू को बीच से आधा काट लो दोनों अलग -अलग टुकड़ों में 10-15 लौंग घुसा दीजिये, और साथ में रख लीजिये, मच्छर पास आने की हिम्मत भी नहीं करेंगे.

Thursday, April 23, 2015

चाक्षुषोपनिषद स्तोत्र से बढ़ाएं अपनी नेत्र ज्योति.......!

बात उन दिनों की है जब हम साधना में नए-नए आये ही थे हमने गुरु श्री निखिलेश्वरानंद जी से दीक्षा ली ही थी कि अचानक इलाहाबाद में मेरे एक मिलने वाले थे उनकी किसी कारण से नेत्रों की ज्योति लगभग 70 प्रतिशत समाप्त हो चुकी थी उनका एक अच्छा-ख़ासा रेस्टोरेंट हुआ करता था मुझसे उनकी ये हालत देखी नहीं जा रही थी।

उनका फेसला था कि उनके घर में उनके कारोबार को कोई देखने वाला नहीं था इसलिए रेस्टोरेंट को बंद करने का विचार बना चुके थे तभी मुझे गुरदेव से प्राप्त हुई "चाक्षुषोपनिषद स्तोत्र" का ख़याल आया कि क्यों न इसका उपयोग करके इसके जीवन में रोशनी कि एक नई किरण का संचार किया जाए। बस उस वक्त हमने इस प्रयोग को सम्पन्न किया और सफल पाया आज आपके सामने हम इस प्रयोग का वर्णन करने जा रहे है। ताकि पीड़ित व्यक्ति के लिए कोई भी संकल्प ले के उसके लाभ के लिए प्रयोग श्रधा और विश्वास से करके उसे लाभ करा सकता है। 

आपकी नेत्र ज्योति कमजोर है और बचपन में ही आपको चश्मा पहनना पड़ गया है तो इस चाक्षुषोपनिषद स्तोत्र के नियमित जप से आप भी अपनी नेत्र ज्योति (Eye Sight) ठीक कर सकते हैं। यह चाक्षुषोपनिषद स्तोत्र इतना प्रभाव शाली है की यदि आपको आँखों से सम्बंधित कोई बीमारी है तो अगर एक ताम्बे के लोटे में जल भरकर, पूजा स्थान में रखकर उसके सामने नियमित इस स्तोत्र के २१ बार पाठ करने के उपरान्त उस जल से दिन में ३-४ बार आँखों को छींटे मारने पर कुछ ही समय में नेत्र रोग से मुक्ति मिल जाती है। बस आवश्यकता है , श्रद्धा, विश्वास एवं अनुष्ठान आरम्भ करने की।

आईये इस स्तोत्र को जानते हैं:-
  • किसी भी महीने के शुक्ल पक्ष रविवार को सूर्योदय के आसपास आरम्भ करके रोज इस स्तोत्र के ५ पाठ करें। 
  • सर्वप्रथम भगवान सूर्य नारायण का ध्यान करके दाहिने हाथ में जल, अक्षत, लाल पुष्प लेकर विनियोग मंत्र पढ़े।
विनियोग मंत्र :-
  • ॐ अस्याश्चाक्षुषीविद्याया अहिर्बुधन्य ऋषिः गायत्री छन्दः सूर्यो देवता चक्षुरोगनिवृत्तये विनियोगः।
  • अब इस चाक्षुषोपनिषद स्तोत्र का पाठ आरम्भ करें।
  • "ॐ चक्षुः चक्षुः चक्षुः तेजः स्थिरो भव। मां पाहि पाहि। त्वरितम् चक्षुरोगान शमय शमय। मम जातरूपम् तेजो दर्शय दर्शय। यथाहम अन्धो न स्यां कल्पय कल्पय। कल्याणम कुरु कुरु। यानि मम पूर्वजन्मोपार्जितानी चक्षुः प्रतिरोधकदुष्क्रतानि सर्वाणि निर्मूलय निर्मूलय। ॐ नमः चक्षुस्तेजोदात्रे दिव्याय भास्कराय। ॐ नमः करुणाकरायामृताय। ॐ नमः सूर्याय। ॐ नमो भगवते सूर्यायाक्षितेजसे नमः। खेचराय नमः। महते नमः। रजसे नमः। तमसे नमः। असतो मां सदगमय। तमसो मां ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मा अमृतं गमय। उष्णो भगवाञ्छुचिरूपः। हंसो भगवान शुचिरप्रतिरूपः। य इमां चक्षुष्मतिविद्यां ब्राह्मणो नित्यमधीते न तस्याक्षिरोगो भवति। न तस्य कुल अन्धो भवति। अष्टौ ब्राह्मणान ग्राहयित्वा विद्यासिद्धिर्भवति। "
  • हिंदी भावार्थ :- विनियोग:- 'ॐ इस चाक्षुषी विद्या क ऋषि अहिर्बुध्न्य हैं, गायत्री छन्द है, सूर्यनारायण देवता हैं तथा नेत्ररोग शमन हेतु इसका जाप होता है। "हे परमेश्वर, हे चक्षु के अभिमानी सूर्यदेव। आप मेरे चक्षुओं में चक्षु के तेजरूप से स्थिर हो जाएँ। मेरी रक्षा करें। रक्षा करें। मेरी आँखों का रोग समाप्त करें। समाप्त करें। मुझे आप अपना सुवर्णमयी तेज दिखलायें। दिखलायें। जिससे में अँधा न होऊं। कृपया वैसे ही उपाय करें, उपाय करें। आप मेरा कल्याण करें, कल्याण करें। मेरे जितने भी पीछे जन्मों के पाप हैं जिनकी वजह से मुझे नेत्र रोग हुआ है उन पापों को जड़ से उखाड़ दे, दें। हे सच्चिदानन्दस्वरूप नेत्रों को तेज प्रदान करने वाले दिव्यस्वरूपी भगवान भास्कर आपको नमस्कार है। ॐ सूर्य भगवान को नमस्कार है। ॐ नेत्रों के प्रकाश भगवान सूर्यदेव आपको नमस्कार है। ॐ आकाशविहारी आपको नमस्कार है। परमश्रेष्ठ स्वरुप आपको नमस्कार है। ॐ रजोगुण रुपी भगवान सूर्यदेव आपको नमस्कार है। तमोगुण के आश्रयभूत भगवान सूर्यदेव आपको नमस्कार है। हे भगवान आप मुझे असत से सत की और जाईये। अन्धकार से प्रकाश की और ले जाइये। मृत्यु से अमृत की और ले चलिये। हे सूर्यदेव आप उष्णस्वरूप हैं, शुचिरूप हैं। हंसस्वरूप भगवान सूर्य, शुचि तथा अप्रतिरूप रूप हैं। उनके तेजोमयी स्वरुप की समानता करने वाला कोई भी नहीं है। जो ब्राह्मण इस चक्षुष्मतिविद्या का नित्य पाठ करता है उसे कभी नेत्र सम्बन्धी रोग नहीं होता है। उसके कुल में कोई अँधा नहीं होता। आठ ब्राह्मणो को इस विद्या को देने (सिखाने) पर इस विद्या की सिद्धि प्राप्त हो जाती है। "
  • इस मन्त्र पाठ के समय एक कांसे की थाली में पानी रख ले उस थाली में अक्षत और गुडहल (सूर्य को प्रिय )डाले और उसमे सूर्य का प्रतिबिम्ब देखते हुए मन्त्र जप करे एवं मन्त्र समाप्ति के बाद थाली में रक्खे जल से रोगी के आँखों का प्रक्षालन करे तथा हर रविवार को ब्रत रक्खे और एक समय फलाहार करे . रविवार को 11 बार इसी मन्त्र से हवन सूर्य को अर्पित करे तथाआहुति गाय के देशी घी की दे .ये प्रयोग कम से कम 13 रविवार करना चाहिए . प्रयोग समाप्त होते -होते आँखों के 70 प्रतिशत रोग समाप्त हो जाते है और उसके एक माह बाद व्यक्ति पूर्णत स्वस्थ हो जाता है ये मेरा आजमाया हुआ प्रयोग है और सफल भी हुआ है बीच में किसी भी कारण ये प्रयोग खंडित होने पे दुबारा करने का प्रविधान है प्रयोग को रविपुष्य योग में आरम्भ करने से सफलता निश्चित रूप से प्राप्त होती है .
नेत्र रोग शमन के लिए अन्य उपयोगी सूर्य साधनाएं :-
  • नेत्र रोग से पीड़ित व्यक्ति प्रतिदिन सुबह हल्दी के घोल से अनार की कलम से दिए गए यन्त्र को कांसे की थाली में बनाये। फिर उस यंत्र पर तांबे की थाली में चतुर्मुख (चार बत्ती वाला) घी का दीपक जलाये। फिर लाल पुष्प, चावल, चन्दन आदि से इस यन्त्र की पूजा करें। इसके बाद पूर्व दिशा की और मुख करके बैठ जाएँ। और हल्दी की माला से "ॐ ह्रीं हंसः" इस मन्त्र की ७ माला जाप करें। उसके पश्चात ऊपर लिखा चाक्षुषोपनिषद स्तोत्र 12 पाठ करें व अन्त में "ॐ ह्रीं हंसः" मन्त्र की पुनः ७ माला जाप करें। इसके बाद भगवान सूर्य को सिन्दूर मिश्रित जल से अर्घ्य दें व अपना नेत्र रोग की ठीक होने की प्रार्थना करें। 
  • नेत्र रोग को ठीक करने हेतु इस अक्ष्युपनिषद स्तोत्र का पाठ भी अत्यंत लाभकारी है।
  • "हरिः ॐ। अथ ह सांकृतिर्भगवानादित्यलोकम जगाम। स आदित्यं नत्वा चक्षुष्मतिविद्यया तमस्तुवत। ॐ नमो भगवते श्रीसूर्यायाक्षितेजसे नमः। ॐ खेचराय नमः। ॐ महासेनाय नमः। ॐ तमसे नमः। ॐ रजसे नमः ॐ सत्वाय नमः। ॐ असतो मा सद गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मा अमृतं गमय। हंसो भगवाञ्छुचिरूपः अप्रतिरूपः। विश्वरूपम घृणिनं जातवेदसं हिरण्यमयं ज्योतिरूपं तपन्तम्। सहस्र रश्मिः शतधा वर्तमानः पुरः प्रजानामुदयत्येष सूर्यः। ॐ नमो भगवते श्री सूर्यायादित्या याक्षितेजसे अहोवाहिनी वाहिनी स्वाहेति। एवं चक्षुष्मतिविद्यया स्तुतः श्रीसूर्यनारायणः सुप्रीतो ब्रवीच्चक्षुमतिविद्यां ब्राह्मणो यो नित्यमधीते न तस्याक्षिरोगो भवति। न तस्य कुले अन्धो भवति। अष्टौ ब्राह्ममाण ग्राहयित्वाथ विद्यासिद्धिर्भवति। य एवं वेद स महान भवति।"

Wednesday, April 22, 2015

आलू में विटामिन बहुत होता है

आलू में कैल्शियम, लोहा, विटामिन-बी तथा फास्फोरस बहुतायत में होता है। आलू खाते रहने से रक्त वाहिनियां बड़ी आयु तक लचकदार बनी रहती हैं तथा कठोर नहीं होने पातीं, इसलिए आलू खाकर लम्बी आयु प्राप्त की जा सकती है। आलू में विटामिन बहुत होता है। इसको मीठे दूध में भी मिलाकर पिला सकते हैं। आलू को छिलके सहित गरम राख में भूनकर खाना सबसे अधिक गुणकारी है या इसको छिलके सहित पानी में उबालें और गल जाने पर खाएं।
  • रक्तपित्त बीमारी में कच्चा आलू बहुत फायदा करता है।
  • कभी-कभी चोट लगने पर नील पड़ जाती है। नील पड़ी जगह पर कच्चा आलू पीसकर लगाएँ ।
  • शरीर पर कहीं जल गया हो, तेज धूप से त्वचा झुलस गई हो, त्वचा पर झुर्रियां हों या कोई त्वचा रोग हो तो कच्चे आलू का रस निकालकर लगाने से फायदा होता है।
  • भुना हुआ आलू पुरानी कब्ज और अंतड़ियों की सड़ांध दूर करता है। आलू में पोटेशियम साल्ट होता है जो अम्लपित्त को रोकता है।
  • चार आलू सेंक लें और फिर उनका छिलका उतार कर नमक, मिर्च डालकर नित्य खाएं। इससे गठिया ठीक हो जाता है।
  • गुर्दे की पथरी में केवल आलू खाते रहने पर बहुत लाभ होता है। पथरी के रोगी को केवल आलू खिलाकर और बार-बार अधिक पानी पिलाते रहने से गुर्दे की पथरियाँ और रेत आसानी से निकल जाती हैं।
  • उच्च रक्तचाप के रोगी भी आलू खाएँ तो रक्तचाप को सामान्य बनाने में लाभ करता है।
  • आलू को पीसकर त्वचा पर मलें। रंग गोरा हो जाएगा।
  • कच्चा आलू पत्थर पर घिसकर सुबह-शाम काजल की तरह लगाने से 5 से 6 वर्ष पुराना जाला और 4 वर्ष तक का फूला 3 मास में साफ हो जाता है।
  • आलू का रस दूध पीते बच्चों और बड़े बच्चों को पिलाने से वे मोटे-ताजे हो जाते हैं। आलू के रस में मधु मिलाकर भी पिला सकते हैं।
  • आलुओं में मुर्गी के चूजों जितना प्रोटीन होता है, सूखे आलू में 8.5 प्रतिशत प्रोटीन होता है। आलू का प्रोटीन बूढ़ों के लिए बहुत ही शक्ति देने वाला और बुढ़ापे की कमजोरी दूर करने वाला होता है।

Sunday, April 19, 2015

गर्दन में दर्द है तो करे ये उपाय.....!

यह किसी भी उम्र वाले को और कभी भी हो सकता है। कई बार तो ऐसा होता है कि हम रात में सोते हैं और जैसे ही सुबह उठते हैं, हमें पता लगता है कि हमारे गर्दन में दर्द है।
  • कभी-कभी तो गर्दन ऐसे अकड़ती है कि यह सीधा ही नहीं होता। जिस दिशा में अकड़ी होती है, अपने गर्दन और सिर को भी उसी दिशा में रखना हमारी मजबूरी बन जाता है। गर्दन में जरा-सा लोच आया कि दर्द शुरू। बहरहाल, गर्दन के दर्द में हमें कोई गंभीर नुकसान का खतरा नहीं रहता, लेकिन फिर भी सावधानी और दर्द हो जाने पर इसे दूर करने के लिए समुचित प्रबंध करना ही सबसे बेहतर और सुरक्षित है।
  • बच्चों एवं युवाओं एवं प्रौढ़ों में सरवाईकल स्पांडिलाइसिस या सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस गर्दन के आसपास के मेरुदंड की हड्डियों की असामान्य बढ़ोतरी और गर्दन के कशेरुकाओं के बीच के इंटरवर्टिब्रल डिस्क में कैल्सियम का डी-जेनरेशन इन discs के अपने स्थान से सरक जाने की वजह से होता है। वृद्धों में सरवाइकल मेरुदंड में डी-जेनरेटिव बदलाव साधारण क्रिया है और सामान्यतया इसके कोई लक्षण भी नहीं उभरते। सामान्यतः C5-C6, C6-C7 और C4 और C5 के बीच के डिस्क ही ज्यादातर प्रभावित होते हैं।
  • लगातार लंबे समय तक कंप्यूटर या लैपटॉप पर बैठे रहना, बेसिक या मोबाईल फोन पर गर्दन झुकाकर देर तक बात करना, लेटकर टीवी देखना, अधिक समय तक टीवी देखना, लम्बे समय तक गर्दन को झुकाकर पढ़ाई-लिखाई व अन्य कार्य करना, जोर से गर्दन को झटका देना अथवा किसी कारण से गर्दन पर जोर का झटका पड़ना, ज्यादा ऊँचे और कठोर तकिये का इस्तेमाल करना, तथा और फास्ट-फूड्स व जंक-फूड्स एवं अन्य अनियमित एवं गरिष्ठ भोजन का सेवन करना, इस मर्ज के होने के कुछ प्रमुख कारण हैं।
  • आपके गर्दन में दर्द की शुरूआत कई सामान्य कारणों जैसे लेटकर और अधिक समय तक टीवी देखने, लम्बे समय तक पढ़ाई व लिखाई करने, जोर से गर्दन को झटका देने, ज्यादा ऊंचे और कठोर तकिये का इस्तेमाल करने से हो सकती है। वैसे तो इसका उपचार आप घर बैठे ही कर सकते हैं, लेकिन जब कभी लगे कि यह गंभीर होता जा रहा है, तो जरूर किसी डॉक्टर की सलाह लें, क्योंकि गर्दन आपके शरीर का बेहद नाजुक और अहम् हिस्सा है।
इस तरह के दर्द को ठीक करने के कुछ घरेलू उपाय इस प्रकार हैं :-
  • गर्दन को घड़ी की दिशा में हौले-हौले पांच से दस बार घुमाएं। अब इसे विपरीत दिशा में भी करें। इसके बाद अपने सिर को ऊपर-नीचे, दाएं-बाएं घुमाएं। अपने सिर के साथ इस क्रिया को तब तक करते रहें, जब तक आप इसे कर सकते हैं। जब दर्द होने लगे तो छोड़ दें।
  • गर्दन में दर्द होने पर तेल से हलका मालिश करें। मालिश हमेशा गर्दन से कंधे की ओर करें।
  • मालिश के बाद गर्म पानी की थैली से या कांच की बोतल में गर्म पानी भरकर सेंकाई करें। सेंकाई के तुरंत बाद खुली हवा में न जाएं और न ही कोई ठंडा पेय पीने की कोशिश करें।
  • लेटकर टीवी न देखें। अधिक समय तक टीवी न देखें। अगर देखना ही हो, तो बीच-बीच में उठकर टहल लिया करें।
  • कम ऊंचाई वाले तकिये का प्रयोग करें। बिस्तर का समतल होना भी जरूरी है।
  • कठोर तकिये का प्रयोग न करें। यह गर्दन में दर्द का कारण बन सकता है।

Friday, April 17, 2015

सरसों में है रोग प्रतिरोधक क्षमता ...!


सरसों भारतीय रसोई का एक अहम हिस्‍सा है। सरसों के तेल और इसके दाने सदियों से भारतीय पकवानों का हिस्‍सा है। सरसों की पत्तियां भी बहुत फायदेमंद है। इस तेल को मालिश के लिए भी इस्‍तेमाल किया जाता है।

इसकी मालिश से रक्‍त-संचार बढ़ता है, मांसपेशियां विकसित और मजबूत होती है, त्‍वचा की बनावट में सुधार होता है। बच्‍चों को भी सरसों के उबटन की मालिश की जाती है। सरसों का तेल जीवाणुरोधी होता है। खाने में पौष्टिक और बहुपयोगी के औषधीय गुणों के बारे में हम आपको बताते हैं।

सरसों के लाभ :-
  • सरसों के तेल में ओलिक एसिड और लीनोलिक एसिड पाया जाता है, यह फैटी एसिड होते हैं जो बालों के लिए फायदेमंद हैं। इनसे बालों की जड़ो को पोषण मिलता है। अगर आप इस तेल को हफ्ते में दो दिन इस्‍तेमाल करेंगे तो बाल झड़ना कम हो जाता है।
  • दातों और मसूड़ों पर सरसों का तेल रगड़ने से वह मजबूत होते हैं। पायरिया के मरीजों के लिए भी यह फायदेमंद है।
  • इसके अलावा यह सर्दी, जुखाम, सिरदर्द और शरीर के दर्द में भी बहुत फायदा देता है।
  • सरसों के तेल में एलिल आइसोथियोसाइनेट के गुण मौजूद होते हैं। त्वचा विकारों के लिए सबसे अच्छे इलाज के रूप में काम करता है। साथ ही यह शरीर के किसी भी भाग में फंगस को बढ़ने से रोकता है।
  • सरसों शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करता है। यह शरीर को गर्माहट भी प्रदान करता है, अगर इसे ठंडक में खाया जाए तो ठंड बिलकुल नहीं लगेगी।
  • अगर आपको भूख नहीं लगती तो अपने खाने को सरसों के तेल में बनाना शुरु कर दीजिए, क्‍योंकि यह तेल भूख बढ़ा कर शरीर में पाचन क्षमता को बढ़ाता है।
  • सरसों के तेल में विटामिन ई होता है। इसे त्‍वचा पर लगाने से सूर्य की अल्‍ट्रावायलेट की किरणों से बचाव होता है।
  • सरसों का तेल साथ ही यह झाइयों और झुर्रियों से भी काफी हद तक राहत दिलाता है।
  • सरसों के तेल से मालिश करने से गठिया और जोड़ो का दर्द भी ठीक हो जाता है। गठिया के रोगी सरसों के तेल में कपूर मिलाकर मालिश करें फायदा होगा।
  •  सरसों का तेल खाने से कोरोनरी हार्ट डिज़ीज का खतरा भी थोड़ा कम हो जाता है।
  • जिन लोगों की त्‍वचा रूखी-सूखी है, वे लोग अपने हाथों, पैरों में तेल लगाने के बाद पानी से स्‍नान कर लें। इससे त्‍वचा को पोषण मिलता है और त्‍वचा नम हो जाती है।
  • सरसो के दानों को पीसकर लेप लगाने से किसी भी प्रकार की सूजन ठीक हो जाती है
  • सरसों के दानों को पीसकर शहद के साथ चाटने से कफ और खांसी समाप्त हो जाती है।
  • सरसों के तेल को एक टॉनिक के रूप में प्रयोग किया जाता है। इसका इस्‍तेमाल करने से शरीर की कार्य क्षमता बढ़ा कर शरीर की कमजोरी को एकदम दूर कर देता है।

Thursday, April 16, 2015

घरेलु सात्त्विक शिशु आहार (Baby Food)....!

आजकल बालकों को दूध के आलावा बाजारू बेबीफ़ूड (फँरेक्स आदि) खिलाने की रीति चल पड़ी है | बेबीफ़ूड बनाने की प्रक्रिया में अधिकांश पोषक तत्त्व नष्ट हो जाते हैं, कई बार कृतिम रूप से वापस मिलाये जाते हैं, जिसे बालकों की आँते अवशोषित नही कर पाती | बेबीफूड का मुख्य घटक अतिशय महीन पिसा हुआ गेहूँ का आटा है, जो चिकना होने के कारण आँतों में चिपक जाता है |

आटा पीसने के बाद एक हप्ते में ही गुणहीन हो जाता है जबकि बेबीफ़ूड तैयार होने के बाद हाथ में आने तक तो कई हफ्ते गुजर जाते हैं | ऐसे हानिकारक बेबीफ़ूड की अपेक्षा शिशुओं के लिए ताजा, पौष्टिक व सात्त्विक खुराक परम्परागत रीति से हम घर में ही बना सकते हैं |
  • विधि : - एक कटोरी चावल (पुराने हो तो अच्छा), दो -दो चम्मच मूँग की दाल व गेंहूँ  इन सबको साफ़ करके धोकर छाँव में अच्छी तरह से सुखा लें | धीमी आँच पर अच्छे से सेंक लें | मिक्सर में महीन पीस के छान लें | तीन -चार माह के बालक के लिए शुरुआत में आधा कप पानी में आधा छोटा चम्मच मिलाकर पका लें | थोडा–सा सेंधा नमक डालकर पाचनशक्ति अनुसार दिन में एक या दो वार दे सकते हैं | धीरे-धीरे मात्रा बढ़ाते जायें | बालक बड़ा होने पर इसमें उबली हुई हरी सब्जियाँ, पिसा जीरा, धनिया भी मिला सकते हैं | हर 7 दिन बाद ताजा खुराक बना लें |यह स्वादिष्ट व पचने में अतिशय हल्का होता है | साथ ही शारीरिक विकास के लिए आवश्यक प्रोटीन्स, खनिज व कार्बोहाइड्रेटस की उचित मात्रा में पूर्ति करता है |

Sunday, April 12, 2015

जूते-चप्पल चोरी होना अच्छी बात है


हम नहीं चाहते कि कोई भी हमारी चीज चोरी हो या गुम हो । किसी भी प्रकार की चोरी को अशुभ माना जाता है लेकिन ज्योतिष के अनुसार जूते-चप्पल चोरी होना शुभ माना गया है। और अगर शनिवार के दिन ऐसा होता है तो इससे शनि के दोषों में राहत मिलती है।

वैसे तो चोरी होना आपके धन की हानि को दर्शाता है लेकिन जूते-चप्पल की चोरी को शुभ माना जाता है। खासतौर पर यदि शनिवार के दिन चमड़े के जूते चोरी होते हैं तो इसे बहुत अच्छा समझना चाहिए। जो लोग जूते-चप्पल चोरी होने के ज्योतिषीय लाभ जानते हैं वे शनि मंदिरों में जूते-चप्पल स्वयं छोड़ आते हैं।

आखिर शनिवार को जूते चोरी हो जाने से क्या लाभ होता है.? ऐसा क्यों माना जाता है कि चमड़े के जूते चोरी हो जाएं तो सारी परेशानी उसके साथ चली जाती हैं... ?
  • वास्तव में यह मान्यता ज्योतिषीय आधार पर प्रचलित है। ज्योतिष शास्त्र में शनि को क्रूर और कठोर ग्रह माना गया है। शनि जब किसी व्यक्ति को विपरित फल देता है तो उससे कड़ी मेहनत करवाता है और नाम मात्र का प्रतिफल प्रदान करता है। जिन लोगों की कुंडली में साढ़ेसाती या ढैय्या हो, या जिसकी राशि में शनि अच्छे स्थान पर न हो, उन्हें कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है। शनिवार शनि का दिन माना जाता है। हमारे शरीर के अंग भी ग्रहों से प्रभावित होते हैं। त्वचा (चमड़ी) और पैरों में शनि का वास माना गया है। पैर और त्वचा से संबंधित चीजें शनि के निमित्त दान की जाए तो कई शुभ फल प्राप्त होते हैं और पैर तथा त्वचा से संबंधित बीमारियों में भी राहत मिलती है।
  • हमारी त्वचा और पैर का कारक ग्रह शनि है। अत: चमड़े के जूते अगर शनिवार को चोरी होते हैं तो मानना चाहिए कि हमारी परेशानी कम हो जाएगी। शनि अब ज्यादा परेशान नहीं करेगा। शनिवार को शनि मंदिरों में जूते भी छोडऩे से शनि के कष्ट कम हो जाते हैं।

Friday, April 10, 2015

छुई-मुई भी एक गजब की अौषिधि है.......!

शर्मिली छुई-मुई गजब की है औषधि, जानकर हैरान हो जाएंगे आप
  • छुई-मुई को आदिवासी बहुगुणी पौधा मानते हैं, उनके अनुसार यह पौधा घावों को जल्द से जल्द ठीक करने के लिए बहुत ज्यादा सक्षम होता है। इसकी जड़ों का 2 ग्राम चूर्ण दिन में तीन बार गुनगुने पानी के साथ लिया जाए तो आंतरिक घाव जल्द आराम पड़ने लगते हैं।
  • आधुनिक विज्ञान की शोधों से ज्ञात होता है कि हड्डियों के टूटने और मांस-पेशियों के आंतरिक घावों के उपचार में छुई-मुई की जड़ें काफी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती हैं। घावों को जल्दी ठीक करने में इसकी जड़ें सक्रियता से कार्य करती हैं।
छुई-मुई नाम का यह पौधा है आप जाने इसके फायदे
  • आप इसे छुने जाइए, इसकी पत्तियां शर्मा कर सिकुड़ जाएंगी, अपने इस स्वभाव की वजह से इसे शर्मिली के नाम से भी जाना जाता है। शर्मिले स्वभाव के इस पौधे में जिस तरह के औषधीय गुण हैं, आप भी जानकर दांतों तले उंगली दबा लेंगे। छुई-मुई को जहां एक ओर देहातों में लाजवंती या शर्मीली के नाम से जाना जाता है, वहीं इसे वनस्पति जगत में माईमोसा पुदिका के नाम से जाना जाता है। संपूर्ण भारत में उगता हुआ दिखाई देने वाला यह पौधा आदिवासी अंचलों में हर्बल नुस्खों के तौर पर अनेक रोगों के निवारण के लिए उपयोग में लाया जाता है। 
  • छुई-मुई को आदिवासी बहुगुणी पौधा मानते हैं, उनके अनुसार यह पौधा घावों को जल्द से जल्द ठीक करने के लिए बहुत ज्यादा सक्षम होता है। इसकी जड़ों का 2 ग्राम चूर्ण दिन में तीन बार गुनगुने पानी के साथ लिया जाए तो आंतरिक घाव जल्द आराम पड़ने लगते हैं। आधुनिक विज्ञान की शोधों से ज्ञात होता है कि हड्डियों के टूटने और मांस-पेशियों के आंतरिक घावों के उपचार में छुई-मुई की जड़ें काफी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती हैं। घावों को जल्दी ठीक करने में इसकी जड़ें सक्रियता से कार्य करती हैं।
चोट या घाव लगने पर
  • छुई-मुई की जड़ों और बीजों का चूर्ण दूध के साथ लेने से पुरूषों में वीर्य की कमी की शिकायत में काफी हद तक फायदा होता है। पातालकोट के आदिवासी रोगियों को जड़ों और बीजों के चूर्ण की 4 ग्राम मात्रा हर रात एक गिलास दूध के साथ लेने की सलाह देते हैं। ऐसा एक माह तक लगातार किया जाए तो सकारात्मक परिणाम देखे जा सकते हैं।
  • पातालकोट के आदिवासियों के अनुसार छुई-मुई की जड़ और पत्तों का पाउडर दूध में मिलाकर दो बार देने से बवासीर और भंगदर रोग ठीक होता है। डांग में आदिवासी पत्तियों के रस को बवासीर के घाव पर सीधे लेपित करने की बात करते हैं। इनके अनुसार यह रस घाव को सुखाने का कार्य करता है और अक्सर होने वाले खून के बहाव को रोकने में भी मदद करता है।
बवासीर की दिकक्त होने पर
  • मध्यप्रदेश के कई इलाकों में आदिवासियों छुई-मुई के पत्तों का 1 चम्मच पाउडर मक्खन के साथ मिलाकर भगंदर और बवासीर होने पर घाव पर रोज सुबह-शाम या दिन में 3 बार लगाते हैं।
  • छुई-मुई के पत्तों को पानी में पीसकर नाभि के निचले हिस्से में लेप करने से पेशाब का अधिक आना बंद हो जाता है। आदिवासी मानते हैं कि पत्तियों के रस की 4 चम्मच मात्रा दिन में एक बार लेने से भी फायदा होता है।
शुगर लेवल को सही रखने के लिए
  • यदि छुई-मुई की 100 ग्राम पत्तियों को 300 मिली पानी में डालकर काढा बनाया जाए तो यह काढा मधुमेह के रोगियों को काफ़ी फ़ायदा होता है।
  • इसके बीजों को एकत्र कर सुखा लिया जाए और चूर्ण तैयार किया जाए। पातालकोट के आदिवासी हर्बल जानकार इसके बीजों के चूर्ण (3 ग्राम) को दूध के साथ मिलाकर प्रतिदिन रात को सोने से पहले लिया जाए तो शारीरिक दुर्बलता दूर कर ताकत प्रदान करता है।
खूनी दस्त होने पर
  • छुई-मुई और अश्वगंधा की जड़ों की समान मात्रा लेकर पीस लिया जाए और तैयार लेप को ढीले स्तनों पर हल्के हल्के मालिश किया जाए तो स्तनों का ढीलापन दूर होता है।
  • छुई-मुई की जड़ों का चूर्ण (3 ग्राम) दही के साथ खूनी दस्त से ग्रस्त रोगी को खिलाने से दस्त जल्दी बंद हो जाती है। वैसे डांगी आदिवासी मानते हैं कि जड़ों का पानी में तैयार काढा भी खूनी दस्त रोकने में कारगर होता है।

भुई आंवला के लाभ एवं कुछ रोचक प्रयोग

गमलों में क्यारियों में एक पौधा अपनी आप उग आता है , जिसकी पत्तियां आंवले जैसी होती है. इन्ही पत्तियों के नीचे की ओर छोटे छोटे फुल आते है जो बाद में छोटे छोटे आंवलों में बदल जाते है . इसे भुई आंवला कहते है. इस पौधे को भूमि आंवला या भू धात्री भी कहा जाता है .यह पौधा लीवर के लिए बहुत उपयोगी है.इसका सम्पूर्ण भाग , जड़ समेत इस्तेमाल किया जा सकता है.
  • लीवर या यकृत की यह सबसे अधिक प्रमाणिक औषधि है . लीवर बढ़ गया है या या उसमे सूजन है तो यह पौधा उसे बिलकुल ठीक कर देगा . बिलीरुबिन बढ़ गया है , पीलिया हो गया है तो इसके पूरे पढ़े को जड़ों समेत उखाडकर , उसका काढ़ा सुबह शाम लें . सूखे हुए पंचांग का 3 ग्राम का काढ़ा सवेरे शाम लेने से बढ़ा हुआ बाईलीरुबिन ठीक होगा और पीलिया की बीमारी से मुक्ति मिलेगी .
  • अगर वर्ष में एक महीने भी इसका काढ़ा ले लिया जाए तो पूरे वर्ष लीवर की कोई समस्या ही नहीं होगी.
  • हीपेटाईटिस -B और C के लिए यह रामबाण है . भुई आंवला +श्योनाक +पुनर्नवा ; इन तीनो को मिलाकर इनका रस लें . ताज़ा न मिले तो इनके पंचांग का काढ़ा लेते रहने से यह बीमारी बिलकुल ठीक हो जाती है .
  • स्तन में सूजन या गाँठ हो तो इसके पत्तों का पेस्ट लगा लें पूरा आराम होगा .
  • जलोदर या अर्थराइटिस में लीवर की कार्य प्रणाली को ठीक करने के लिए 5 ग्राम भुई आंवला +1/2 ग्राम कुटकी +1 ग्राम सौंठ का काढ़ा सवेरे शाम लें .
  • इसमें शरीर के विजातीय तत्वों को दूर करने की अद्भुत क्षमता है .
  • मुंह में छाले हों तो इनके पत्तों का रस चबाकर निगल लें या बाहर निकाल दें .
  • यह मसूढ़ों के लिए भी अच्छा है और मुंह पकने पर भी लाभ करता है .
  • पेट में दर्द हो और कारण न समझ आ रहा हो तो इसका काढ़ा ले लें . पेट दर्द तुरंत शांत हो जाएगा . ये पाचन प्रणाली को भी अच्छा करता है .
  • यह किडनी के इन्फेक्शन को भी खत्म करती है . इसका काढ़ा किडनी की सूजन भी खत्म करता है . प्रदर या प्रमेह की बीमारी भी इससे ठीक होती है .
  • शुगर की बीमारी में घाव न भरते हों तो इसका पेस्ट पीसकर लगा दें . इसे काली मिर्च के साथ लिया जाए तो शुगर की बीमारी भी ठीक होती है .
  • रक्त प्रदर की बीमारी होने पर इसके साथ दूब का रस मिलाकर 2-3 चम्मच प्रात: सायं लें. आँतों का इन्फेक्शन होने पर या अल्सर होने पर इसके साथ दूब को भी जड़ सहित उखाडकर , ताज़ा ताज़ा आधा कप रस लें . रक्त स्त्राव 2-3 दिन में ही बंद हो जाएगा .
  • पीलिया में इसकी पत्तियों के पेस्ट को छाछ के साथ मिलाकर दिया जाता है।
  • पुराना बुखार हो और भूख कम लगती हो तो , इसके साथ मुलेठी और गिलोय मिलाकर ; काढ़ा बनाकर , लें . इसका उपयोग घरेलू औषधीय के रूप में जैसे ऐपेटाइट, कब्ज. टाइफाइट, बुखार, ज्वर एवं सर्दी किया जाता है।
  • मलेरिया के बुखार में इसके संपूर्ण पौधे का पेस्ट तैयार करके छाछ के साथ देने पर आराम मिलता है।
  • खांसी में इसके साथ तुलसी के पत्ते मिलाकर काढ़ा बनाकर लें .
  • पस सेल्स बढने पर भी इसे लिया जा सकता है .
  • खुजली होने पर इसके पत्तों का रस मलने से लाभ होता है .
  • * इसके पेस्ट को बकरी के दूध के साथ मिलाकर भी दिया जाता है। पीलिया के शुरूआती लक्षण दिखाई देने पर भी इसकी पत्तियों को सीधे खाया जाता है।
  • प्लीहा एवं यकृत विकार के लिये इसकी जडों के रस को चावल के पानी के साथ लिया जाता है।
  • इसे मूत्र तथा जननांग विकारों के लिये उपयोग किया जाता है।
  • इसकी पत्तियों का पेस्ट आंतरिक घावों सुजन एवं टूटी हड्डियो पर बाहरी रूप से लगाने में किया जाता है।
  • इसे बच्चों के पेट में कीडे़ होने पर देने से लाभ पहुँचाता है। तथा इसकी जडों का पेस्ट बच्चों में नींद लाने हेतु किया जाता है।
  • इसकी जड़ो एवं बीजों का पेस्ट तैयार करके चांवल के पानी के साथ देने पर महिलाओ में रजोनिवृत्ति के समय लाभ मिलता है।
  • एनीमिया, अस्थमा, ब्रोकइटिस, खांसी, पेचिश, सूजाक, हेपेटाइटिस, पिलिया एवं पेट में ट्यूमर होने की दशा में उपयोग किया जा सकता है।
  • इसकी पत्तियाँ शीतल होती है. इसकी पत्तियाँ गर्भाधान को प्रोत्सहित करती है।

Wednesday, April 08, 2015

सोरायसिस आखिर क्या है और क्या है उपचार ...!


सोरायसिस त्वचा की ऊपरी सतह का एक चर्म रोग है ये वंशानुगत है लेकिन ये और भी कई कारणों से भी हो सकता है। आनु्‌वंशिकता के अलावा इसके लिए पर्यावरण भी एक बड़ा कारण माना जाता है। यह असाध्य बीमारी कभी भी किसी को भी हो सकती है। कई बार इलाज के बाद इसे ठीक हुआ समझ लिया जाता है जबकि यह रह-रहकर सिर उठा लेता है। शीत ऋतु में यह बीमारी प्रमुखता से प्रकट होती है।

सोरयासिस एक प्रकार का चर्म रोग है जिसम त्वचा में cells की तादाद बढने लगती है।चमडी मोटी होने लगती है और उस पर खुरंड और पपडीयां उत्पन हो जाती हैं। ये पपडीया सफेद चमकीली हो सकती है।इस रोग के भयानक रूप में पूरा शारीर मोट लाल रंग का पपडीदार चमडी से ढक जाता है।यह रोग अधिकतर के कोहनी,घुटना और खोपडी पर होता है।अच्छी बात ये है की यह रोग छू तहा याने संक्रमक नही है। रोगी के संपर्क से अन्य लोगो को कोई खतरा नहीं है।

सोरायसिस चमड़ी की एक ऐसी बीमारी है जिसके ऊपर मोटी परत जम जाती है। दरअसल चमड़ी की सतही परत का अधिक बनना ही सोरायसिस है। त्वचा पर भारी सोरायसिस की बीमारी सामान्यतः हमारी त्वचा पर लाल रंग की सतह के रूप में उभरकर आती है और स्केल्प (सिर के बालों के पीछे) हाथ-पाँव अथवा हाथ की हथेलियों, पाँव के तलवों, कोहनी, घुटनों और पीठ पर अधिक होती है। 1-2 प्रतिशत जनता में यह रोग पाया जाता है।
चिकित्सा में अभी तक ऐसा परिणय नहीं है जससे सोरयासिस रोग का पता लगाया जा सके। खून की जांच से भी इस रोग का पता नही चलता है।

लक्षण
  • रोग से ग्रसित (आक्रांत) स्थान की त्वचा चमकविहीन, रुखी-सूखी, फटी हुई और मोटी दिखाई देती है तथा वहाँ खुजली भी चलती है। सोरायसिस के क्रॉनिक और गंभीर होने पर 5 से 40 प्रतिशत रोगियों में जोड़ों का दर्द और सूजन जैसे लक्षण भी पाए जाते हैं एवं कुछ रोगियों के नाखून भी प्रभावित हो जाते हैं और उन पर रोग के चिह्न (पीटिंग) दिखाई देते हैं।
क्यों और किसे होता है सोरायसिस
  • सोरायसिस क्यों होता है इसका सीधे-सीधे उत्तर देना कठिन है क्योंकि इसके मल्टी फ्लेक्टोरियल (एकाधिक) कारण हैं। अभी तक हुई खोज (रिसर्च) के अनुसार सोरायसिस की उत्पत्ति के लिए मुख्यतः जेनेटिक प्री-डिस्पोजिशन और एनवायरमेंटल फेक्टर को जवाबदार माना गया है।सोरायसिस हेरिडिटी (वंशानुगत) रोगों की श्रेणी में आने वाली बीमारी है एवं 10 प्रतिशत रोगियों में परिवार के किसी सदस्य को यह रोग रहता है।
  • किसी भी उम्र में नवजात शिशुओं से लेकर वृद्धों को भी हो सकती है। यह इंफेक्टिव डिसिज (छूत की बीमारी) भी नहीं है। सामान्यतः यह बीमारी 20 से 30 वर्ष की आयु में प्रकट होती है, लेकिन कभी-कभी इस बीमारी के लक्षण क्रॉनिक बीमारियों की तरह देरी से उभरकर आते हैं। सोरायसिस एक बार ठीक हो जाने के बाद कुछ समय पश्चात पुनः उभर कर आ जाता है और कभी-कभी अधिक उग्रता के साथ प्रकट होता है। ग्रीष्मऋतु की अपेक्षा शीतऋतु में इसका प्रकोप अधिक होता है।
रोग होने पर क्या करें
  • सोरायसिस होने पर विशेषज्ञ चिकित्सक के बताए अनुसार निर्देशों का पालन करते हुए पर्याप्त उपचार कराएँ ताकि रोग नियंत्रण में रहे। थ्रोट इंफेक्शन से बचें और तनाव रहित रहें, क्योंकि थ्रोट इंफेक्शन और स्ट्रेस सीधे-सीधे सोरायसिस को प्रभावित कर रोग के लक्षणों में वृद्धि करता है। त्वचा को अधिक खुश्क होने से भी बचाएँ ताकि खुजली उत्पन्न न हो।
क्या है इसके लिए उपचार
  • सोरायसिस के उपचार में बाह्य प्रयोग के लिए एंटिसोरियेटिक क्रीम/ लोशन/ ऑइंटमेंट की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। रोग की तीव्रता न होने पर साधारणतः मॉइस्चराइजिंग क्रीम इत्यादि से ही रोग नियंत्रण में रहता है। लेकिन जब बाह्योपचार से लाभ न हो तो मुँह से ली जाने वाली एंटीसोरिक और सिमटोमेटिक औषधियों का प्रयोग आवश्यक हो जाता है। आजकल अल्ट्रावायलेट लाइट से उपचार की विधि भी अत्यधिक उपयोगी और लाभदायक हो रही है।
  • कुछ रोगी बताते है की गर्मी के मौसम में और धूप से उनको राहत मिलती है। एलोपेथिक चिकित्सा मे यह रोग लाईलाज माना गया है। उनके मतानुसार यह रोग सारे जीवन भुगतना पडता है।लेकिन कुछ कुदरती चीजे है जो इस रोग को काबू में रखती हैं और रोगी को सुकून मिलता है। मै आपको एसे ही उपचार के बारे मे जानकारी दे रहा हूँ .
  • बादाम १० नग का पावडर बना ले। इसे पानी में उबाले। यह दवा सोरयासिस रोग की जगह पर लगाये। रात भर लगी रहने के बाद सुबह मे पानी से धो ले। यह उपचार अच्छे परिणाम दर्शाता है।
  • एक चम्मच चंदन का पावडर ले।इसे आधा लीटर गरम पानी में उबले। तीसरा हिस्सा रहने पर उतार ले। अब इसमें थोडा गुलाब जल और शक्कर मिला दे। यह दवा दन म ३ बार पिए।बहुत कारगर उपचार है।
  • पत्तागोभी सोरयासिस में अच्छा प्रभाव दिखाती है। उपर का पत्ता ले। इसे पानी से धोले।हथेली से दबाकर सपाट कर ले।इसे थोडा सा गरम करके प्रभावित हिस्से पर रखकर उपर सूती कपडा लपेट दे। यह उपचार लम्बे समय तक दिन में दो बार करने से जबरदस्त फ़ायदा होता है।
  • पत्तागोभी का सूप सुबह शाम पीने से सोरयासिस में लाभ होते देखा गया है।प्रयोग करने योग्य है।
  • निम्बू के रस में थोडा पानी मिलाकर रोग स्थल पर लगाने से सुकून मलता है। निम्बू का रस तीन घंट के अंतर से दिन में ५ बार पीते रहने से छाल रोग ठीक होने लगता है।
  • शिकाकाई पानी मे उबालकर रोग के धब्बो पर लगाने से नियंत्रित होता है।
  • आप केले के पत्तो को प्रभावित जगह पर रखे। ऊपर कपडा लपेटे। इससे भी आपको काफी फ़ायदा होगा।
  • कुछ चिकित्सक जडी-बूटी की दवाई में steroids मिलाकर ईलाज करते है जससे रोग शीघ्रता से ठीक होता प्रतीत होता है। लेकिन ईलाज बंद करने पर रोग पुन: भयानक रूप में प्रकट हो जाता है।
  • इस रोग को ठक करने के लिए जीवन शैली में बदलाव करना जरूरी है। सर्दियों में ३ लीटर और गर्मियों में ५ से ६ लीटर पानी पीने की आदत बना ले। इससे वर्जतीय पदार्थ शारीर से बाहर निकलेगे ।
  • सोरयासिस चिकित्सा का एक नियम यह है की रोगी को १० से १५ दिन तक सिर्फ फ़लाहार पर रखना चाहिये। उसके बाद दूध और फ़ल का रस चालू करना चाहये।
  • रोगी के कब्ज़ निवारण के लिये गुन गुने पानी का एनीमा देना चाहिये। इससे रोग की तीव्रता घट जाती है।
  • अपरस वाले भाग को नमक मले पानी से धोना चाहये फिर उस भाग पर जेतुन का तेल लगाना चाहिए।
  • खाने में नमक बिलकुल ही वर्जित है। पीडित भाग को नमक मिले पानी से धोना चाहये।
  • धुम्रपान करना और अधिक शराब पीना तो विशेष रूप से हानिकारक है। ज्यादा मिर्च मसालेदार चीज़े भी न खाएं।
यूनानी प्रयोग
  • सोरायसिस के इलाज के लिए शरबत मुरक्कब मुसफ्फी खून शरबत उन्नाब, इत्रिफल शाहतरा, रोगन नीम, माजून फलासफा जैसी दवाएं पाउडर, चटनी, तेल व काढ़े के रूप मेे देते हैं। यह इलाज रोग के आधार पर 4-6 माह तक चलता है।
परहेज भी जरूरी:-
  • इस पद्धति से इलाज के दौरान मरीज को अचार, बैंगन, आलू और बादी करने वाली चीजों से परहेज करना होता है। साथ ही बैलेंस डाइट के साथ ओमेगा थ्री फैटी एसिड युक्तखाद्य पदार्थ जैसे बादाम, अखरोट, अलसी के बीज, राजमा और जैतून का तेल प्रयोग करें।
  • आजकल कुछ चिकित्सक इस रोग क उपचार मरहम/आयन्टमेन्ट आदि लगा-लगा कर रहे है जबकि यह बीमारी केवल खाने-पीने की दवाओं द्वारा ही जड़ से समूल नष्ट की जा सकती है। चर्म रोग होने पर उसे ऊपरी उपचार द्वारा दबाना अन्य कई प्रकार की बीमारियों को नियंत्रण देना है। इससे रक्तचाप व मानसिक बीमारियां व अन्य घातक बीमारियां स्वः ही पैदा होने लगती हैं। प्रभावित चर्म स्थान पर मरह्म व अन्य दवाओं के उपयोग से बीमारी समाप्त न होकर शरीर के अन्दरूनी अंगों को हानि पहुंचाती है।
  • इस बीमारी का सही प्रकार से उपचार करने से पूर्व रोग की जड़ को दूर करना आवश्यक होता है। पहले ह रोगी की शारीरिक मानसिक प्रकृति को जानकार खाने व पीने की औषधियां देते हैं। अनन्तः रोगी की प्रतिरोधक शक्ति को बढ़ाकर बीमारी को जड़ से दूर किया जाता है। उपचार से पहले या उपचार के दौरान यदि रोगों को ज्यादा परेशानी होती है तो तात्कालिक उपचार के लिए अन्य प्रकार की औषधियां दी जाती हैं।
  • इस बीमारी में दवाओं का सेवन लम्बे समय तक करना आवश्यक होता है। दवाओं का सेवन नियमपूर्वक न करना भी बीमारी को आगे बढ़ाने में पूर्ण सहायक होता है। इस बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को खाने-पीने में शुध्द शाकाहारी भोजन, हरी सब्जियां, फल आदि का प्रयोग करना अति आवश्यक है। नियमित रूप से ताजा पानी अधिकाधिक पीते रहना चाहिये जिससे कि पाचन क्रिया सुलभ बनी रहे। नहाने-धोने के लिए बाजार साबुनों का प्रयोग पूर्णतः बन्द करके चिकित्सा प्रणाली में कार्य करने वाले साबुनों का उपयोग हितकर होता है। वर्तमान में सोरायसिस नामक यह रोग-धीरे-धीरे संक्रमण की तरह देश में फैल रहा है। इसके लिए रहन-सहन शुध्द वातावरण होना अति आवश्यक है।
इसके अलावा इसके अन्य कई प्रकार हैं जो कि कम ही मरीजों मैं पाये जाते हैं जैसे :-

  • guttate psoriasis-4-5 मिमि के गोल निशान बनते है ,अक्सर बच्चों मैं गले के संक्रमण के बाद होते हैं और पूरे शरीर पर गोल गोल निशान बनते है जो कि अधिकतर ठीक हो जाते हैं पर कई बार ये क्रोनिक प्लाक सोरायसिस मैं परिवर्तित हो सकते हैं
  • erythrodermic psorisis-जब सोरायसिस शरीर के 80 प्रतिशत हिस्से तक फैल जाता है तो इसे कहते हैं,यह एक प्रकार का गंभीरतम प्रकार है जिसका तुरंत किसी विशेषज्ञ से उपचार की आवश्यता होती है अन्यथा जीवन के लिए खतरा हो सकता है.
  • pustular psoriasis-यह भी गंभीर प्रकार का सोरायसिस है जिसमें पूरे शरीर पर छाले बन जाते हैं जिनमें pus भरी होती है.
  • कई बार यह मात्र हथेली और पगतली पर ही होता है (palmo plantar psoriasis) और जब यह सिर्फ सर मैं होता है (scalp psoriasis ).
  • हमारी त्वचा जिस प्रकार से हमारे बाल बढते है ,जिस तरह नाखून बढते हैं वैसे ही निरंतर बनती रहती है और उतरती रहती है। और हमारे शरीर की संपूर्ण त्वचा एक महिने में पूरी बदल जाती है.पर जहां सोरायसिस होता है वहां यह त्वचा केवल चार दिन में बदल जाती है
  • साधारणतया सोरायसिस सामान्य मॉश्चराइजर्स या इमॉलिएंट्स जैसे वैसलीन ,ग्लिसरीन.या अन्य क्रीम्स से भी नियंत्रत हो सकता है , सिर पर जब ये होता है तो विशेष प्रकार के टार शैंपू काम मैं लिया जाता हैं,सिर के लिए सैलिसाइलिक एसिड लोशन और शरीर पर हो तो सैलिसाइलिक एसिड क्रीम विशेष उपयोगी होती है.इसके अलावा कोलटार(क्रीम,लोशन,शैम्पू) diatharnol(chryosorabin bark extract ) आदि दवाइयां विशेष उपयोगी होती हैं
फोटोथैरेपी:-
  • जिसमें सूर्य की किरणों मैं पायी जाने वाली UV-A और U V-B किरणों से से उपचार किया जाता है.PUVA थैरेपी जिसमें psoralenes +UVA थैरेपी सामान्य रूप से काम लिया जाने वाला उपचार है.
  • इसके अलावा कैल्सिट्रायोल और कैल्सिपौट्रियोल नामक औषधियों का भी बहुत अच्छा प्रभाव होता है पर ये इतनी महंगी हैं कि सामान्य आदमी की पहुंच से बाहर होती हैं
  • इसके अलावा जब बीमारी ज्यादा गंभीर हो तब मीथोट्रीक्सैट और साईक्लोस्पोरिन नामक दवाईयां भी काम ली जाती हैं पर ये सब किसी विशेषज्ञ चिकित्सक की देखरेख मैं ही लेनी चाहिये.
  • विशेषज्ञ से मिलता रहे तो ज्यादा परेशान नहीं होता है. विशेषज्ञ चिकित्सक के अलावा उपचार लेना भारी पङ सकता है,क्यों कि अक्सर लोग लंबी बीमारी होने की वजह से नीम हकीमों के,और गारंटी से ठीक कर देने वालों के चक्कर मैं पङ जाते हैं, और सामान्य रूप से ये देखा गया है कि erythrodermic psorisis, या pustular psoriasis गंभीरतम प्रकार है सोरायसिस के वे इस देशी या गारंटी वाले इलाज की वजह से ही होते है क्यों कि इस प्रकार के उपचार मैं ज्यादा तर स्टीरॉइड्स का उपयोग किया जा सकता है जिनसे अधिकतर चमङी की बीमारियों मैं थोङा बहुत फायदा जरूर होता है पर सोरायसिस मैं ये विष का काम करती है,और थोङी सी बीमारी भी पूरे शरीर मैं फैल जाती है.

खांसी जुकाम एलर्जी सर्दी आदि के लिए.....!


सर्दी, खांसी और जुखाम ये एक ही परिवार के रोग है और इनकी औषोधी भी लगभग एक है. आपको आसान से नुस्खे यहाँ बता रहा हूँ जिसे आप घर पे बनाये और एलोपेथी दवाओं के साइड इफेक्ट से भी बचे

घर पे बनाये 
  • ये एक अच्छी दवाई, खांसी जुकाम एलर्जी सर्दी आदि के लिए जिसे आप घर पर बना सकते है इसके लिए आपको चाहिए तुलसी के पत्ते, तना और बीज तीनो का कुल वजन 50 ग्राम इसके लिए आप तुलसी के ऊपर से तोड ले इसमें बीज तना और तुलसी के पत्ते तीनो आ जाएंगे इनको एक बरतन में डाल कर 500 मिलि पानी डाल ले और इसमें 100 ग्राम अदरक और 20 ग्राम काली मिर्च दोनो को पीस कर डाले और अच्छे से उबाल कर काढे और जब पानी 100 ग्राम रह जाए तो इसे छान कर किसी कांच की बोतल में डाल कर रखे इसमे थोडा सा शहद मिला कर आप इसके दो चम्मच ले सकते है दिन में 3 बार
  • जुकाम के लिए 2 चम्मच अजवायन को तवे पर हल्का भूने और फ़िर उसे एक रूमाल या कपडे में बांध ले और पोटली बना ले उस पोटली को नाक से सूंघे और सो जाए.
  • खांसी के लिए रोज दिन में 3 बार हल्के गर्म पानी में आधा चम्मच सैंधा नमक डाल कर गरारे करे सुबह उठ कर दोपहर को और फ़िर रात को सोने से पहले एक चम्मच शहद में थोडी सी पीसी हुई काली मिर्च का पाऊडर डाल कर मिलाए और उसे चाटे अगर खासी ज्यादा आ रही हो तो 2 साबुत काली मिर्च के दाने और थोडी सी मिश्री मुंह में रख कर चूसे आपको आराम मिलेगा.
  • गले की खराश, या गले मे किसी भी प्रकार का इन्फेक्शन हो, गला बैठ गया है, पानी पिने मे भी तकलीफ हो रही है, लार निकलने मे भी तकलीफ हो रही है, आवाज भरी हो गयी है .. इन सबके लिए एक ग्लास देशी गाय का दूध, एक चम्मच देशी गाय का घी और चौथाई चम्मच हल्दी को मिलाके कुछ देर उबालना है फिर उसको सिप सिप करके चाय की तरह पीना है शाम को एकबार .
एक और प्रस्तुत है खांसी की अचूक दवा:-
  • कई बार खांसते-खांसते हम परेशान हो जाते हैं। दवाएं काम नहीं करती हैं।
  • गर्भवती महिलाओं के लिए दो एलोपैथिक दवाएं लेना निराप्रद नहीं माना गया है।
  • वहीं शल्य-चिकित्सा कराने वाले रोगियों के लिए ज्यादा देर तक खांसना बिल्कुल ही सेहतमंद नहीं होता है। गले में खरास किच-किच जैसी कुछ होती है।
  • ऐसे में एक आसान औषधि, जो हमने स्वयं ही अत्यंत विषम परिस्थिति में आजमाया था आप अगर मुश्किल में हैं तो आजमाइये और अपना अनुभव जरूर बताएं।
दालचीनी- थोड़ी मात्रा( लगभग एक ग्राम ) शहद- आधा चम्मच
  • प्रयोग विधि दालचीनी को पूरी तरह पीसकर पाउडर बना लें। बायीं हाथ की हथेली पर करीब आधा चम्मच शहद लेकर उसके ऊपर दालचीनी (दो चुटकी भर) डालें और दायें हाथ की अंगुली से अच्छी तरह मिलाएं और उसे चाट जाएं।
  • परिणाम दो से तीन मिनट में खांसी जाती रहेगी। दोबारा खांसी हो तो इस प्रयोग को दोबारा आजमा सकते हैं।
  • अगर दही खाते है तो उसे बंद करदे और रात को सोते समय दूध न पिए
  • तुलसी, काली मिर्च और अदरक की चाय खांसी में सबसे बढि़या रहती हैं।
  • हींग, त्रिफला, मुलहठी और मिश्री को नीबू के रस में मिलाकर लेने से खांसी कम करने में मदद मिलती है।
  • पीपली, काली मिर्च, सौंठ और मुलहठी का चूर्ण बनाकर चौथाई चम्मच शहद के साथ लेना अच्छा रहता है।

Monday, April 06, 2015

सनाय के उपचार और प्रयोग

सनाय के विभिन्न नाम हैं कुछ इलाकों में इसे स्वर्णमुखी कहते हैं तो कहीं सोनामुखी तो कहीं सुनामुखी यह स्वास्थ के लिए बहुत उपयोगी है। इसकी पत्तियों से आयुर्वेदिक औषधियां बनती हैं।
सनाय रेचक, रोगाणु रोधक और शरीर की सफाई करने वाली वनस्पति है। यह कब्ज को दूर करने वाली औषधि है और पेट की पाचन संबंधी समस्याओं को दूर करती है। इसके सेवन से बुखार कम हो जाता है। और गले की खिच खिच दूर हो जाती है। स्वर्णमुखी के चूर्ण को चाय की तरह पीते हैं।
किसी भी तरह के संक्रमण को रोकने में सनाय लाभदायक औषधि है। एलोपैथिक दवाएं यदि एक रोग दूर करती हैं तो साथ में छोटी मोटी और समस्याएं पैदा करती हैं। जिन्हें हम साइड अफैक्ट कहते हैं ऐसी कोई समस्या इस वनस्पति के सेवन से नहीं होती । भारतीय जड़ी बूटियों की यह विशेषता है कि उनके सेवन से किसी और प्रकार का कष्ट रोगी को नहीं होता। स्वर्णमुखी में यह गुण भरपूर है। इससे किसी भी प्रकार का अन्य बुरा असर नहीं होता।
लेकिन अधिक सेवन करने से पोटाशियम का स्तर कम हो जाता है वजन भी कम हो सकता है। भूख भी कम हो जाती है जोड़ो और मांसपेशियों में दर्द हो सकता है, इसलिए प्राकृतिक चिकित्सक की परामर्श के बिना कोई औषधि नहीं लेनी चाहिए। अति सर्वत्र वर्जयते....!

कब्ज के लिए
  • गुलाब की पत्तियों का चूर्ण, सोंठ या सूखी अदरक, सोनामुखी की पत्तियां, सैंधा नमक, किशमिश इन्हें पीसकर शहद में मिलालें। सोने से पहले इस चटनी या लेह का सेवन करें।
विरेचक
  • सनाय में विरेचक का गुण है। सनाय की तीन आंस पत्तियों को, एक चाय का चम्मच धनिया और एक चाय का चम्मच सोंठ को चौथाई पानी में 15 मिनट तक गर्म करें। एक बार में एक से चार टेबुल चम्मच भर कर पीयें। यह पेय ठंडा होकर अधिक स्वादिष्ट हो जाता है। वृद्धों और बच्चों के लिए सनाय की फलियां बहुत लाभदायक हैं। यदि बच्चों के लिए पेय बनायें तो चार फलियों में ठंडे पानी की चार से पांच तक चम्मच डालें। बच्चे को एक बार में एक या दो चम्मच पिलायें। वयस्कों के लिए बनायें तो 6 या 12 फलियों में उतना ही पानी डालें।
पेट और छाती का दर्द
  • बहुत से लोगों को पेट में गैस बनने पर छाती में दर्द होने लगता है। इसके लिए 3 ग्राम सनाय चूर्ण और एक चम्मच मिसरी का चूर्ण एक गिलास पानी में मिलायें। इसे सुबह नाश्ते करने से पहले पीयें जरूरत पड़े तो रात में भोजन से पहले भी पीयें। यह पेट में गैस को दूर करके दर्द से आराम देता है।
शरीर दर्द
  • सनाय शरीर के तीन गुणों वात,कफ और पित्त को प्रभावित करती है। सनाय की पत्तियों को साफ कर सुखा लें फिर उसका चूर्ण यानी पाउडर बनाकर रख लें। इस चूर्ण को भोजन से पहले दिन में दो बार लें। चूर्ण की मात्रा पांच ग्राम हो इसे घी के साथ लें। इस के सेवन से शरीर का दर्द दूर होता है। पाचन शक्ति और आंतें सुदृढ़ होती है।
संक्रमण
  • एक चम्मच शहद में 2 ग्राम सोनामुखी पाउडर को 250 मि. पानी में मिलायें। सुबह इस पेय को खाली पेट पीयें। इसका प्रयोग एक साल तक करें इससे शरीर संक्रमण से दूर रहता है। शरीर ताकतवर बनता है और संक्रमण वाले रोग दूर रहते हैं।
बलगम
  • ठंडे पेय आइसक्रीम, फ्रिज का ठंडा पानी, चाकलेट अधिक लेने से और रात में दोबारा गर्म करके खाना खाने से शरीर में कफ या बलगम अधिक बनने लगता है जिससे फेफड़े कमजोर हो जाते हैं। इस समस्या को दूर करने के लिए सोनामुखी का प्रयोग करें। एक कप अनार के रस में सोनामुखी का तीन ग्राम चूर्ण मिलायें। इसे दिन में दो बार पियें इससे फेफड़े साफ हो जाते है और अस्थमा दूर होता है।
पथरी
  • किडनी की पथरी दूर करने के लिए पीलें खीरे के बीजों से 150 मि. रस में तीन ग्राम सोनामुखी का पाउडर मिलायें इसे दिन में दो बार पीने से किडनी की पथरी घुल जाती है। इससे पाचन शक्ति मजबूत होती है।

गूलर के औषधीय गुण

  • गूलर लंबी आयु वाला वृक्ष है। इसका वनस्पतिक नाम फीकुस ग्लोमेराता रौक्सबुर्ग है। यह सम्पूर्ण भारत में पाया जाता है। यह नदी−नालों के किनारे एवं दलदली स्थानों पर उगता है। उत्तर प्रदेश के मैदानों में यह अपने आप ही उग आता है।
  • इसके भालाकार पत्ते 10 से सत्रह सेमी लंबे होते हैं जो जनवरी से अप्रैल तक निकलते हैं। इसकी छाल का रंग लाल−घूसर होता है। फल गोल, गुच्छों में लगते हैं। फल मार्च से जून तक आते हैं। कच्चा फल छोटा हरा होता है पकने पर फल मीठे, मुलायम तथा छोटे−छोटे दानों से युक्त होता है। इसका फल देखने में अंजीर के फल जैसा लगता है। इसके तने से क्षीर निकलता है।
  • गूलर का कच्चा फल कसैला एवं दाहनाशक है। पका हुआ गूलर रुचिकारक, मीठा, शीतल, पित्तशामक, तृषाशामक, श्रमहर, कब्ज मिटाने वाला तथा पौष्टिक है। इसकी जड़ में #रक्तस्राव रोकने तथा जलन शांत करने का गुण है। गूलर के कच्चे फलों की सब्जी बनाई जाती है तथा पके फल खाए जाते हैं। इसकी छाल का चूर्ण बनाकर या अन्य प्रकार से उपयोग किया जाता है।
  • गूलर के नियमित सेवन से शरीर में पित्त एवं कफ का संतुलन बना रहता है। इसलिए पित्त एवं कफ विकार नहीं होते। साथ ही इससे उदरस्थ अग्नि एवं दाह भी शांत होते हैं। पित्त रोगों में इसके पत्तों के चूर्ण का शहद के साथ सेवन भी फायदेमंद होता है।
  • गूलर की छाल ग्राही है, रक्तस्राव को बंद करती है। साथ ही यह मधुमेह में भी लाभप्रद है। गूलर के कोमल−ताजा पत्तों का रस शहद में मिलाकर पीने से भी मधुमेह में राहत मिलती है। इससे पेशाब में शर्करा की मात्रा भी कम हो जाती है।
  • गूलर के तने को दूध बवासीर एवं दस्तों के लिए श्रेष्ठ दवा है। #खूनी बवासीर के रोगी को गूलर के ताजा पत्तों का रस पिलाना चाहिए। इसके नियमित सेवन से त्वचा का रंग भी निखरने लगता है।
  •  हाथ−पैरों की त्वचा फटने या बिवाई फटने पर गूलर के तने के दूध का लेप करने से आराम मिलता है, पीड़ा से छुटकारा मिलता है।
  • गूलर से स्त्रियों की मासिक धर्म संबंधी अनियमितताएं भी दूर होती हैं। स्त्रियों में मासिक धर्म के दौरान अधिक रक्तस्राव होने पर इसकी छाल के काढ़े का सेवन करना चाहिए। इससे अत्याधिक बहाव रुक जाता है। ऐसा होने पर गूलर के पके हुए फलों के रस में खांड या शहद मिलाकर पीना भी लाभदायक होता है।
  • विभिन्न योनि विकारों में भी गूलर काफी फायदेमंद होता है। योनि विकारों में योनि प्रक्षालन के लिए गूलर की छाल के काढ़े का प्रयोग करना बहुत फायदेमंद होता है।
  • मुंह के छाले हों तो गूलर के पत्तों या #छाल का काढ़ा मुंह में भरकर कुछ देर रखना चाहिए। इससे फायदा होता है। इससे दांत हिलने तथा मसूढ़ों से खून आने जैसी व्याधियों का निदान भी हो जाता है। यह क्रिया लगभग दो सप्ताह तक प्रतिदिन नियमित रूप से करें।
  • आग से या अन्य किसी प्रकार से जल जाने पर प्रभावित स्थान पर गूलर की छाल को लेप करने से जलन शांत हो जाती है। इससे खून का बहना भी बंद हो जाता है। पके हुए गूलर के शरबत में शक्कर, खांड या शहद मिलाकर सेवन करने से गर्मियों में पैदा होने वाली जलन तथा तृषा शांत होती है।
  • नेत्र विकारों जैसे आंखें लाल होना, आंखों में पानी आना, जलन होना आदि के उपचार में भी गूलर उपयोगी है। इसके लिए गूलर के पत्तों का काढ़ा बनाकर उसे साफ और महीन कपड़े से छान लें। ठंडा होने पर इसकी दो−दो बूंद दिन में तीन बार आंखों में डालें। इससे नेत्र ज्योति भी बढ़ती है।
  • नकसीर फूटती हो तो ताजा एवं पके हुए गूलर के लगभग 25 मिली लीटर रस में गुड़ या शहद मिलाकर सेवन करने या नकसीर फूटना बंद हो जाती है।
  • धातुदुर्बलता के लिए 1 बताशे में 10 बूंद गूलर का दूध डालकर सुबह-शाम सेवन करने और 1 चम्मच की मात्रा में गूलर के फलों का चूर्ण रात में सोने से पहले लेने से धातु दुर्बलता दूर हो जाती है। इस प्रकार से इसका उपयोग करने से शीघ्रपतन रोग भी ठीक हो जाता है।
  • मर्दाना शक्तिवर्द्धक के लिए 1 छुहारे की गुठली निकालकर उसमें गूलर के दूध की 25 बूंद भरकर सुबह रोजाना खाये इससे वीर्य में शुक्राणु बढ़ते हैं तथा संतानोत्पत्ति में शुक्राणुओं की कमी का दोष भी दूर हो जाता है।
  • 1 चम्मच गूलर के दूध में 2 बताशे को पीसकर मिला लें और रोजाना सुबह-शाम इसे खाकर उसके ऊपर से गर्म दूध पीएं इससे मर्दाना कमजोरी दूर होती है।
  • पका हुआ गूलर सुखाकर पीसकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण में इसी के बराबर की मात्रा में मिश्री मिलाकर किसी बोतल में भर कर रख दें। इस चूर्ण में से 2 चम्मच की मात्रा गर्म दूध के साथ सेवन करने से मर्दाना शक्ति बढ़ जाती है। 2-2 घंटे के अन्तराल पर गूलर का दूध या गूलर का यह चूर्ण सेवन करने से दम्पत्ति वैवाहिक सुख को भोगते हुए स्वस्थ संतान को जन्म देते हैं।
  • बाजीकारक (काम उत्तेजना) के लिए 4 से 6 ग्राम गूलर के फल का चूर्ण और बिदारी कन्द का चूर्ण बराबर मात्रा में मिलाकर मिश्री और घी मिले हुए दूध के साथ सुबह-शाम सेवन करने से पौरुष शक्ति की वृद्धि होती है व बाजीकरण की शक्ति बढ़ जाती है। यदि इस चूर्ण का उपयोग इस प्रकार से स्त्रियां करें तो उनके सारे रोग ठीक हो जाएंगे।
  • गर्मी के मौसम में गूलर के पके फलों का शर्बत बनाकर पीने से मन प्रसन्न होता है और शरीर में शक्ति की वृद्धि होती है तथा कई प्रकार के रोग जैसे- कब्ज तथा खांसी और दमा आदि ठीक हो जाते हैं।
  • उपदंश (फिरंग) के लिए 40 ग्राम गूलर की छाल को 1 लीटर पानी में उबालकर काढ़ा बना लें और इसमें मिश्री मिलाकर पीने से उपदंश की बीमारी ठीक हो जाती है।
  • शरीर को शक्तिशाली बनाने के लिए लगभग 100 ग्राम की मात्रा में गूलर के कच्चे फलों का चूर्ण बनाकर इसमें 100 ग्राम मिश्री मिलाकर रख दें। अब इस चूर्ण में से लगभग 10 ग्राम की मात्रा में रोजाना दूध के साथ लेने से शरीर को भरपूर ताकत मिलती है।
  • प्रदर के लिए गूलर के फूलों के चूर्ण को छानकर उसमें शहद एव मिश्री मिलाकर गोली बना लें। रोजाना 1 गोली का सेवन करने से 7 दिन में प्रदर रोग से छुटकार मिल जाता है।
  • गूलर के पके फल को छिलके सहित खाकर ऊपर से ताजे पानी पीयें इससे श्वेत प्रदर रोग ठीक हो जाता है।
  • गूलर के फलों के रस में शहद मिलाकर सेवन करने से #प्रदर रोग में आराम मिलता है।
  • रक्तप्रदर के लिए गूलर की छाल 5 से 10 ग्राम की मात्रा में या फल 2 से 4 की मात्रा में सुबह-शाम चीनी मिले दूध के साथ सेवन करने से अधिक लाभ मिलता है तथा रक्तप्रदर रोग ठीक हो जाता है।
  • 20 ग्राम गूलर की ताजी छाल को 250 मिलीलीटर पानी में उबालें जब यह 50 मिलीलीटर की मात्रा में बच जाए तो इसमें 25 ग्राम मिश्री और 2 ग्राम सफेद जीरे का चूर्ण मिलाकर सेवन करें इससे रक्तप्रदर रोग में लाभ मिलता है।
  • पके गूलर के फलों को सुखाकर इसे कूटे और पीसकर छानकर चूर्ण बना लें। फिर इसमें बराबर मात्रा में मिश्री मिलाकर किसी ढक्कनदार बर्तन में भर कर रख दें। इसमें से 6 ग्राम की मात्रा में रोजाना सुबह-शाम दूध या पानी के साथ सेवन करने से रक्तप्रदर ठीक हो जाता है।
  • पके गूलर के फल को लेकर उसके बीज को निकाल कर फेंक दें, जब उसके फल शेष रह जायें तो उसका रस निकाल कर शहद के साथ सेवन करने से रक्त प्रदर में लाभ मिलता है। रोगी इसके सब्जी का सेवन भी कर सकते हैं।
  • 1 चम्मच गूलर के फल का रस में बराबर मात्रा में मिश्री मिलाकर सुबह-शाम नियमित रूप से सेवन करने से कुछ ही हफ्तों में न केवल रक्त प्रदर ठीक होता है बल्कि #मासिकधर्म में खून अधिक आने की तकलीफ भी दूर होती है।
  • श्वेत प्रदर के लिए रोजाना दिन में 3-4 बार गूलर के पके हुए फल खाने से श्वेत प्रदर में लाभ मिलता है।
  • गूलर का रस 5 से 10 ग्राम मिश्री के साथ मिलाकर नाभि के निचले हिस्से में पूरे पेट पर इससे लेप करें। इससे श्वेत प्रदर रोग में आराम मिलता है।
  • महिलाओ के श्वेत प्रदर के लिए 1 किलो कच्चे गूलर लेकर इसके 3 भाग कर लें। इसमें से #कच्चे गूलर 1 भाग उबाल लें और इनकों पीसकर 1 चम्मच सरसों के तेल में फ्राई कर लें तथा इसकी रोटी बना लें। रात को सोते समय रोटी को नाभि के ऊपर रखकर कपड़ा बांध लें। इस प्रकार शेष 2 भागों से इसी प्रकार की क्रिया 2 दिनों तक करें इससे श्वेत प्रदर रोग की अवस्था में आराम मिलता है।
  • 10-15 ग्राम गूलर की छाल को पीसकर, 250 मिलीलीटर पानी में डालकर पकाएं। पकने के बाद 125 मिलीलीटर पानी शेष रहने पर इसे छान लें और इसमें मिश्री व लगभग 2 ग्राम सफेद जीरे का चूर्ण मिलाकर सुबह-शाम सेवन करें तथा भोजन में इसके कच्चे फलों का काढ़ा बनाकर सेवन करें श्वेत प्रदर रोग में लाभ मिलता है।
  • गर्भपात ... गर्भावस्था में खून का बहना और गर्भपात होने के लक्षण दिखाई दें तो तुरन्त ही गूलर की छाल 5 से 10 ग्राम की मात्रा में अथवा 2 से 4 गूलर के फल को पीसकर इसमें चीनी मिलाकर दूध के साथ पीएं। जब तक रोग के लक्षण दूर न हो तब तक इसका प्रयोग 4 से 6 घंटे पर उपयोग में लें।
  • गूलर की जड़ अथवा जड़ की छाल का काढ़ा बनाकर गर्भवती स्त्री को पिलाने से गर्भस्राव अथवा गर्भपात होना बंद हो जाता है।
  • भगन्दर के लिए गूलर के दूध में रूई का फोहा भिगोंकर इसे नासूर और भगन्दर के ऊपर रखें और इसे प्रतिदिन बदलते रहने से नासूर और भगन्दर ठीक हो जाता है।
  • खूनी बवासीर के लिए गूलर के पत्तों या फलों के दूध की 10 से 20 बूंदे को पानी में मिलाकर रोगी को पिलाने से खूनी बवासीर और रक्तविकार दूर हो जाते हैं। गूलर के दूध का लेप मस्सों पर भी लगाना लाभकारी है।
  • 10 से 15 ग्राम गूलर के कोमल पत्तों को बारीक पीसकर चूर्ण बना लें। 250 ग्राम गाय के दूध की दही में थोड़ा सा सेंधानमक तथा इस चूर्ण को मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से खूनी बवासीर के रोग में लाभ मिलता है।
  • आंव (पेचिश) के लिए 5 से 10 ग्राम गूलर की जड़ का रस सुबह-शाम चीनी मिले दूध के साथ सेवन करने से आमातिसार (पेचिश) ठीक हो जाता है।
  • बताशे में गूलर के दूध की 4-5 बूंदे डालकर रोगी को खिलाने से आमातिसार (आंव) ठीक हो जाता है।
  • गूलर के पके फल खायें इससे पेचिश रोग ठीक हो जाता है।
  • गूलर को गर्म जल में उबालकर छान लें और इसे पीसकर रोटी बना लें फिर इसे खाएं इससे पेचिश में लाभ होता है |
  • दस्त के लिए ...दस्त और ग्रहणी के रोग में 3 ग्राम गूलर के पत्तों का चूर्ण और 2 दाने कालीमिर्च के थोड़े से चावल के पानी के साथ बारीक पीसकर, उसमें कालानमक और छाछ मिलाकर फिर इसे छान लें और इसे सुबह-शाम सेवन करें इससे लाभ मिलेगा।
  • गूलर की 10 ग्राम पत्तियां को बारीक पीसकर 50 मिलीलीटर पानी में डालकर रोगी को पिलाने से सभी प्रकार के दस्त समाप्त हो जाते हैं।
  • बच्चों का आंव....गूलर के दूध की 5-6 बूंदे चीनी के साथ बच्चे को देने से बच्चों के आंव ठीक हो जाते हैं।
  • विसूचिका....विसूचिका (हैजा) के रोगी को गूलर का रस पिलाने से रोगी को आराम मिलता है।
  • रक्तपित्त (खूनी पित्त) के लिए पके हुए हुए गूलर, गुड़ या शहद के साथ खाना चाहिए अथवा गूलर की जड़ को घिसकर चीनी के साथ खाने से लाभ मिलेगा और रक्तपित्त दोष दूर हो जाएगा।
  • हर प्रकार के रक्तपित्त में गूलर की छाल 5 ग्राम से 10 ग्राम तथा उसका फल 2 से 4 ग्राम तथा गूलर का दूध 10 से 20 मिलीलीटर की मात्रा के रूप में सेवन करने से लाभ मिलता है।
  • फोड़े पर गूलर का दूध लगाकर उस पर पतला कागज चिपकाने से फोड़ा जल्दी ठीक हो जाता है।
  • शरीर के अंगों में घाव होने पर गूलर की छाल से घाव को धोएं इससे घाव जल्दी ही भर जाते हैं।
  • गूलर के पत्तों को छांया में सूखाकर इसे पीसकर बारीक चूर्ण बना लें। इसके बाद घाव को साफ करकें इसके ऊपर इस चूर्ण को छिड़के तथा इस चूर्ण में से 5-5 ग्राम की मात्रा सुबह तथा शाम को पानी के साथ सेवन करें इससे लाभ मिलेगा।
  • गूलर के दूध में बावची को भिगोंकर इसे पीस लें और 1-2 चम्मच की मात्रा में रोजाना इससे घाव पर लेप करें इससे घाव जल्दी ही ठीक हो जाते हैं।
  • गूलर के पत्तों को पानी के साथ पीसकर शर्बत बनाकर पीने से मधुमेह रोग में लाभ मिलता है।
  • गूलर के ताजे फल को खाकर ऊपर से ताजे पानी पीये इससे मधुमेह रोग में आराम मिलता है।
  • शीतला (चेचक) के लिए गूलर के पत्तों पर उठे हुए कांटों को गाय के ताजे दूध में पीसकर इसमें थोड़ी सी चीनी मिलाकर चेचक से पीड़ित रोगी को पिलाये इससे उसका यह रोग ठीक हो जाएगा।
  • भिलावें की धुएं से उत्पन्न हुई सूजन को दूर करने के लिए गूलर की छाल को पीसकर इससे सूजन वाली भाग पर लेप करें।
  • शरीर के किसी भी अंग पर गांठ होने की अवस्था में गूलर का दूध उस अंग पर लगाने से लाभ मिलता है। 
  • पेशाब अधिक आना....1 चम्मच गूलर के कच्चे फलों के चूर्ण को 2 चम्मच शहद और दूध के साथ सेवन करने से पेशाब का अधिक मात्रा में आने का रोग दूर हो जाता है।
  • पेशाब के साथ खून आना....पेशाब में खून आने पर गूलर की छाल 5 ग्राम से 10 ग्राम या इसके फल 2 से 4 लेकर पीस लें और इसमें चीनी मिलाकर दूध के साथ खायें इससे यह रोग पूरी तरह से ठीक हो जाता है।
  • मूत्रकृच्छ (पेशाब करने में कष्ट या जलन) होना....प्रतिदिन सुबह गूलर के 2-2 पके फल रोगी को सेवन करने से मूत्रकच्छ (पेशाब की जलन) में लाभ मिलता है।
  • गूलर के 8-10 बूंद को 2 बताशों में भरकर रोजाना सेवन करने से मूत्ररोग (पेशाब के रोग) तथा पेशाब करने के समय में होने वाले कष्ट तथा जलन दूर हो जाती है।
  • मधुमेह के लिए 1 चम्मच गूलर के फलों के चूर्ण को 1 कप पानी के साथ दोनों समय भोजन के बाद नियमित रूप से सेवन करने से पेशाब में शर्करा आना बंद हो जाता है। इसके साथ ही गूलर के कच्चे फलों की सब्जी नियमित रूप से खाते रहना अधिक लाभकारी होता है। मधुमेह रोग ठीक हो जाने के बाद इसका सेवन करना बंद कर दें।
  • दांतों की मजबूती के लिए गूलर की छाल के काढे़ से गरारे करते रहने से दांत और मसूड़ों के सारे रोग दूर होकर दांत मजबूत होते हैं।
  • कंठमाला (गले में गिल्टी होना)....गूलर के पत्तों पर उठे हुए कांटों को पीसकर इसे मीठे या दही मिला दें और इसमें चीनी मिलाकर रोजाना 1 बार सेवन करें इससे कंठमाला के रोग से मुक्ति मिलती है।
  • खांसी के लिए रोगी को बहुत तेज खांसी आती हो तो गूलर का दूध रोगी के मुंह के तालू पर रगड़ने से आराम मिलता है।
  • गूलर के फूल, कालीमिर्च और ढाक की कोमल कली को बराबर मात्रा में लेकर पीसकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण में 5 ग्राम शहद में मिलाकर रोजाना 2-3 बार चाटने से खांसी ठीक हो जाती है।
  • नाक से खून बहना .....पके गूलर में चीनी भरकर घी में तलें, इसके बाद इस पर काली मिर्च तथा इलायची के दानों का आधा-आधा ग्राम चूर्ण छिड़कर प्रतिदिन सुबह के समय में सेवन करें तथा इसके बाद बैंगन का रस मुंह पर लगाएं इससे नाक से खून गिरना बंद हो जाता है।
  • गूलर का पेड़, शाल पेड़, अर्जुन पेड़, और कुड़े के पड़े की पेड़ की छाल को बराबर मात्रा में लेकर पानी के साथ पीसकर चटनी बना लें। इन सब चीजों का काढ़ा भी बनाकर रख लें। इसके बाद इस चटनी तथा इससे 4 गुना ज्यादा घी और घी से 4 गुना ज्यादा काढ़े को कढ़ाही में डालकर पकाएं। पकने पर जब घी के बराबर मात्रा रह तो इसे उतार कर छान लें। अगर नाक पक गई हो तो इस घी को नाक पर लगाने से बहुत जल्दी आराम मिलता है।
  • रक्तस्राव (खून का बहना)...नाक से, मुंह से, योनि से, गुदा से होने वाले रक्तस्राव में गूलर के दूध की 15 बूंदे 1 चम्मच पानी के साथ दिन में 3 बार सेवन करने से लाभ मिलता है।
  • शरीर में कहीं से भी किसी कारण से रक्तस्राव (खून बहना) हो रहा हो तो गूलर के पत्तों का रस निकालकर वहां पर लगाएं इससे तुरन्त खून का आना बंद हो जाता है।
  • मुंह में छाले हो अथवा खून आता हो या खूनी बवासीर हो तो 1 चम्मच गूलर के दूध में इतनी ही पिसी हुई मिश्री मिलाकर रोजाना खाने से रक्तस्राव (खून बहना) होना बंद हो जाता है तथा इसके सेवन से मुंह के छाले भी ठीक हो जाते हैं।
  • चोट लगने पर खून का बहना...गूलर के पत्तों का रस चोट लगे हुए स्थान पर लगने से खून बहना रुक जाता है।
  • गूलर के रस को रूई में भिगोकर इसे चोट पर रखकर पट्टी बांध लें इससे चोट जल्दी भरकर ठीक हो जाएगा।
  • शिशु का दुबलापन...गूलर का दूध कुछ बूंदों की मात्रा में मां या गाय-भैंस के दूध के साथ मिलाकर नियमित रूप से कुछ महीने तक रोजाना 1 बार बच्चों को पिलाने से शरीर हृष्ट-पुष्ट और सुडौल बनाता है लेकिन गूलर के दूध बच्चों उम्र के अनुसार ही उपयोग में लेना चाहिए।
  • सूखा (रिकेट्स) रोग....5 बूंद गूलर के दूध को 1 बताशे पर डालकर इसका सेवन बच्चों को कराएं इससे सूखा रोग (रिकेटस) ठीक हो जाता है।
  • बच्चों के गाल पर सूजन होना...बच्चों के गाल की सूजन को दूर करने के लिए उनके गाल पर गूलर के दूध का लेप करें इससे लाभ मिलेगा।
  • बिच्छू का जहर...जहां पर बिच्छू ने काटा हो उस स्थान पर गूलर के अंकुरों को पीसकर लगाए इससे जहर चढ़ता नहीं है और दर्द से आराम मिलता है।
  • आग से जलने पर ...जलने पर गूलर की हरी पत्तियां पीसकर लेप करने से जलन दूर हो जाती है।
  • गूलर के पत्तों को पीसकर शरीर के जले हुए भाग पर लगाने से जलन मिट जाती है और छाले के निशान भी नही पड़ते।
  • दमा के लिए गूलर की पेड़ की छाल उतारकर छाया में सुखा लें और फिर इसे पीसकर चूर्ण बना लें और फिर इसे छानकर बोतल में भरकर ढक्कन लगाकर रख दें। इसमें से चूर्ण का सेवन प्रतिदिन करने से दमा रोग में लाभ मिलता है।
  • सितम्बर से मार्च तक की हर पूर्णमासी की रात में जितना खीर खा सकें, उतने दूध में चावल (इस खीर में अरबा चावल उत्तम माने जाते हैं) डालकर खीर बनाएं। इस खीर को कांसे की थाली में डालकर फैलाकर, इस पर ढाई चम्मच गूलर की छाल का चूर्ण चारो और छिड़क दें। खीर रात को नौ बजे तक तैयार कर लें। इसे रात को नौ बजे से सुबह के चार बजे तक खुले स्थान पर चांदनी में रखें। सुबह चार बजे के तुरन्त बाद इसे भर पेट खा लें। खीर खाने से पहले मंजन करके मुंह को साफ कर लें। आम के हरे पत्ते से खीर खाएं। इसके बाद धीरे-धीरे थकान नहीं हो तब तक घूमते रहें। इससे दमा रोग में लाभ मिलता है।
  • जिगर का रोग के लिए 10 ग्राम की मात्रा में #जंगली गुलर की जड़ की छाल पीसकर गाय के मूत्र में मिला लें और इसे छानकर 25 ग्राम की मात्रा में रोजाना पीने से से यकृत वृद्धि खत्म जाती है।
  • वमन (उल्टी) के लिए गूलर के दूध की 10 बूंदे सुबह और शाम दूध में मिलाकर बच्चों को पिलाने से बच्चों को उल्टी आना बंद हो जाता है।

Saturday, April 04, 2015

घर या नए मकान की नकारात्मक उर्जा केसे हटाये


अक्सर लोगों की शिकायत रहती है कि पैसा आता तो है पर बरकत नहीं होती है। पैसा कहां चला जाता है कुछ पता नहीं चलता है। हो सकता है कि आप भी इस तरह की समस्या से परेशान हों। इसका आसान से हल वास्तु विज्ञान में मौजूद है। वास्तु विज्ञान के अनुसार इस तरह की परेशानी का कारण नकारात्मक ऊर्जा है। मकान के किसी कमरे में अकेले जाने या उस कमरे में सोने से डर लगने का कारण भी है। परिवार में अक्सर खींचातानी चलती रहती है तो इसका कारण भी नकारात्मक ऊर्जा हो सकती है।

ये सच है कि जब हम किसी नए मकान को बना के उसमे प्रवेश करते है तो पूजा करने का एक विधान है क्युकि मंत्रोच्चारण एवं शंख ध्वनि एवं घंटी आदि से उस स्थान पे स्थित नकारात्मक उर्जा का प्रभाव समाप्त हो जाता है .आप नया घर नई शुरुआत,बदलावो और जीवन के विभिन्न पहलुओ संबंधी नई चुनौतियो की शुरुआत होता है| कोई आश्चर्या नही है की धरम और संस्कृति में नये घर में परवेश से पहले की जाने वाली शुद्धिकरण प्रक्रिया को अत्यधिक महत्व दिया जाता है| यह समारोह घर से नकारात्मक तरंगो व उर्जा को दूर करता है। यूँ तो हर घर में नये घर की शुद्दीकरण की अपनी -अपनी विधियाँ होती है परन्तु कुछ आम व बेहद परभावी चीज़ो की जानकारी से आपको अवगत करा रहे है जिनका प्रयोग आप अपने घर के शुद्धिकरण के लिए कर सकते है | जब आप किराए के मकान को बदल कर नए किराए के मकान में भी प्रवेश करते है तब भी आप ये निम्नलिखित बात प्रयोग करे तो आपको सुख -शान्ति का अनुभव होगा
  • प्राचीन काल से पानी(जल ) को बेहद शकतिशाली शुद्धिकरण तत्व माना जाता रहा है| ट्यूंटी के आम पानी को एक कटोरी मैं भर लें| 3 से 4 घंटे तक इससे सूरज की रोशनी में पड़ा रहने दें| अब ये पानी चार्ज होकर शुद्धिकरण के लिए तैयार है| कटोरी को हाथ मैं लेकर ईश्वर से प्राथना करते होये अपना मनोरथ तय करें| शुद्धिकरण के लिए ताज़ा आम या अशोक पत्तियों से आप सारे घर में इस जल के छींटे दे।
  • अग्नि स्वच्छ करने वाला एक ताकतवर तत्व है| एक अग्गरबत्ती या लोबान जला कर सारे घर में घुमाएँ| इस दोरान पवित्र पुस्तकों से या ग्रन्थों से मंत्रोंचरण करते रहें| इसके धुएँ को घर के कोने तक पहॉंचाएँ और अपने नये घर में सवयं और परिवार के लिए प्रसन्नता की कामना करें|
  • नमक को भी एक शक्तिशाली शुद्धिकरण तत्व माना जाता रहा है| अच्छी मात्रा में नमक को कोनों में और कमरों में रात को फैला दें| ये नमक आपके घर की नकारात्मक उर्जा को सोख लेता है| सुबह इस नमक को झाड़ू से साफ कर घर से बाहर कर दें ताकि घर से नकारात्मक उर्जा भी इसके साथ बाहर हो जाए |और अगर नियमित पोछा लगाते समय पानी में थोडा सा नमक मिला के पोछा लगाये तो नकारात्मक उर्जा के साथ ही सम्पन्नता का आगमन भी होता है ये देखने में साधारण सी बात लगती है लेकिन जीवन में आपके आनंद और सम्पन्नता से सराबोर करने की शक्ति रखती है . 
  • ध्वनि भी सकारात्मक उर्जा को गति देती है और इससे घर को शुद्ध भी किया जा सकता है| प्रार्थना करने और अपने मनोरथ तय करने के बाद अपनी पसंद की किसी ध्वनि तकनीक का इस्तेमाल करें| कुछ लोग कमरे में तालियो की आवाज़ की गूँज भरना पसंद करते हैं जो किसी भी स्थान में सकारात्मक उर्जा व विचारों को आकर्षित करती है| कुछ लोग पूजा में प्रयोग होने वाली घंटियों को बजाते होये पुर घर में च्क्कर लगातें हें | ढोल की लयबद्ध ध्वनि से किसी भी स्थान में उर्जा का उच्च स्तर पैदा किया जा सकता है| किसी वाध्यन्त्र के स्थान पर आपकी अपनी आवाज़ भी एक शक्तिशाली शुद्धीकरण त्तव का काम कर सकती है| नये घर में मंत्रोच्चारण , गुनगुनाना या गायन भी इसे शर्तिया तौर पर उर्जा से भर देता है|सबसे उत्तम शंख ध्वनि है जिसके प्रयोग से घर की सभी नकारात्मक उर्जा का बहिस्कार हो जाता है और शंख में प्रयुक्त जल को आप घर में प्रक्षालन कर सकते है .
  • नये घर के हर कमरे और स्थान पर जाकर मंत्रोच्चरण करने हेतु एरोमथ्हेरपि में इस्तेमाल होने वाले तेल को छिड़के | कोनों पर विशेष ध्यान दें जहा आमतौर पर नकारत्मक उर्जा का स्थान होता है| इस तेल की खुशबू घर की शुद्धि के लिए काफ़ी ताकतवर तत्व के रूप में काम करती है|
  • यदि आप ऐसे घर में प्रवेश करने वाले है जहाँ आपसे पहले भी कोई रहता था तो उसकी शुद्धिकरण का सबसे प्रभावी तरीका है की उस घर के पूर्व निवासियों दवारा पीछे छोड़ी गई नकारात्मक उर्जा को हटाने के लिए घर की अची तरह से सफाई करके वहाँ नया पेंट करवाया जाए | ऐसा करने का सबसे उपयोक्त मौका तभी होता है जब वह खाली होता है | पर्याप्त समय के लिए खिड़किया व दरवाज़ों को खुला रहने दें ताकि सूर्या की रोशनी ह्वा भीतर तक प्रवेश कर सकारात्मक तरंगों से घर भर दें|
  • खिड़कियों को चौबीस घंटे में से कम से कम पच्चीस मिनट के लिए जरुर खोलें ताकि घर में सकारात्मक ऊर्जा को प्रवेश करने का और नकारात्मक उर्जा को बाहर निकलने का रास्ता निकल पाएं।
  • घर में पूजा घर में नियमित रूप से घी का दीपक जलाएं।
  • घर के मंदिर में देवी-देवताओं पर चढ़ाए गए फूल-हार दूसरे दूसरे दिन हटा देना चाहिए।
  • अनावश्यक वस्तु, सूखे पौधे या सूखे फूलों का गुलदस्ता निराशा बढ़ाते हैं। इसलिए इन्हें घर से बाहर कर दें।
  • घर में ख़राब विद्युत उपकरण नहीं रखें। अगर ठीक नहीं हो सकते तो घर से बाहर कर दें।
  • नियमित साफ-सफाई नहीं होने से दीवारों व सामानों पर धूल-मिट्टी जम जाती है, जिससे घर में नकारात्मक ऊर्जा प्रवेश करती है।
  • देवी-देवताओं की मूर्तियां उपहार में देना व घर में शो-पीस के रूप में सजाना भी ठीक नहीं है।
  • घरों में अनावश्यक फर्नीचर और बड़ी-बड़ी आकृतियां रखना सकारात्मक ऊर्जा के संचार में बाधा उत्पन्न करता है। अत: घर में केवल उपयोगी वस्तुएं ही रखें।
  • घर में तुलसी के पौधे के स्थापना अवस्य करे ये घर के वातावरण को शुद्ध करने के साथ-साथ नकारात्मक उर्जा के प्रवेश पे प्रतिबंध लगाती है .आप उत्तर के कोण में तुलसी का पौधा लगाएं।

Friday, April 03, 2015

माणिक्य बता देता है आने वाला संकट....!

माणिक्य (रूबी) को बेहद मूल्यवान रत्न माना जाता है। इसे चुन्नी और लाल भी कहा जाता है। माणिक्य का रंग लाल होता है। इसे धारण करने से सूर्य की पीड़ा शांत होती है। माणिक्य को अंग्रेज़ी में 'रूबी' कहते हैं। जिस तरह सेटेलाईट से बदलते मौसम की जानकारी मौसम वैज्ञानिकों को समय से पहले मिल जाती है ठीक उसी तरह सूर्य के रत्न माणिक्य में यह खूबी है कि यह आने वाली संकट की सूचना पहले दे देता है।

माणिक्य का लाल रंग की आभा लिये होता है.यह अन्य रंगों जैसे गुलाबी, काला और नीले रंग में भी पाया जाता है.यह अत्यंत कड़ा होता है.पृथ्वी पर पाये जाने वाले खनिजों में सिर्फ हीरा ही इससे कठोर होता है.जो माणिक्य सूर्य की पहली किरण पड़ने पर लाल रंग बिखेरता है वह सर्वोत्तम होता है.उत्तम माणिक्य की पहचान है कि अगर इसे दूध में 100 बार डुबोते हैं तो दूध मे भी माणिक्य की आभा दिखने लगती है.अंधेरे कमरे में रखने पर यह सूर्य के समान प्रकाशमान होता है.इसे पत्थर पर रगड़े तो इसपर घर्षण के निशान आ जाते हैं लेकिन वजन में कमी नहीं आती है.
माणिक्य को प्रेम का रत्न भी कहा जाता है क्योकि इसे धारण करने से मन में उत्साह और उमंग बढ़ता है.यह मायूसी और उदासीनता को दूर करता है.ज्योतिषीय दृष्टिकोण से यह प्रेत बाधा से मुक्ति प्रदान करने वाला होता है.इस रत्न को धारण करने से संतान सुख की प्राप्ति होती है.आर्थिक परेशानी की स्थिति में यह धन प्रदायक होता है.माणिक्य धारण करने वाला व्यक्ति समाज में प्रतिष्ठित होता है.मान्यताओ के अनुसार जो व्यक्ति इसे धारण करता है उसके ऊपर संकट आने पर इसका रंग फीका हो जाता है और संकट टल जाने पर पुन: इसकी आभा लौट आती है.माणिक्य के विषय में यह भी मान्यता है कि यह जहर के प्रभाव को कम करता है एवं जहरीली चीज़ पास होने पर इसक रंग फीका पड़ जाता है.

ज्योतिषशास्त्री बताते हैं कि, माणिक्य के विषय में मान्यता है कि जो व्यक्ति इसे धारण करता है वह अगर गंभीर रूप बीमार होने वाला होता है तो इसका रंग फीका हो जाता है।
  • अगर व्यक्ति की मृत्यु होने वाली होती है तो करीब तीन महीने पहले से माणिक्य का रंग सफेद होने लग जाता है।
  • माणिक्य के विषय में यह भी मान्यता है कि पति-पत्नी दोनों अगर इसे धारण करते हैं तो पत्नी के बेवफाई करने पर पति द्वारा धारण किये गये माणिक्य का रंग फीका पड़ जाता है।
  • ठीक इसी तरह पति बेवफाई करे तो पत्नी द्वारा धारण किये गये माणिक्य का रंग फीका पड़ जाता है। माणिक्य में रक्त संबंधी रोगों को दूर करने की क्षमता है। तपेदिक से पीड़ित व्यक्ति अगर इसे धारण करे तो चिकित्सा का लाभ तेजी से प्राप्त होता है।
  • कई लोग मानते हैं कि माणिक्य विष के प्रभाव को भी कम कर देता है।
  • ज्योतिषशास्त्र के अनुसार जिनकी राशि अथवा लग्न सिंह, मेष, वृश्चिक, कर्क एवं धनु है उनके माणिक्य रत्न धारण करना बहुत ही शुभ होता है।
  • सिंह राशि के जातकों के लिए माणिक्य रत्न धारण करना अत्यंत लाभकारी माना गया है। जो जातक, सूर्य की पीड़ा से ग्रस्त हो उन्हें माणिक्य धारण करने की सलाह दी जाती है।
  • माणिक्य नेत्र रोग तथा हृदय संबंधित रोगों में विशेष लाभकारी माना जाता है। साथ ही सरदर्द आदि समस्याओं में भी इसका प्रयोग लाभकारी होता है।
  • इसे धारण करने से दूषित विचारों को नियंत्रित करने में सफलता मिलती है। धार्मिक आस्था एवं पद-प्रतिष्ठा का लाभ मिलता है।
असली माणिक्य की पहचान :-
  • अलग-अलग प्राप्ति स्थान के अनुसार माणिक्य लाल, गुलाबी, रक्तवर्णी, फिका गुलाबी इत्यादि रंगों में पाया जाता है।
  • दूध में असली माणिक्य रखने पर दूध का रंग गुलाबी दिखाई देता है। कांच के बरतन में इसे रखने से बरतन के चारों ओर हल्की किरण निकलती दिखाई देती है।
कैसे धारण करें :-
  • ज्योतिषशास्त्र के अनुसार बिना अभिमंत्रित किये माणिक्य धारण करने से इसका पूरा लाभ नहीं मिलता है। इसलिए इसे धारण करने से पहले सूर्य देव की पूजा करें साथ ही "ओम् ह्रां ह्रीं, ह्रौं सः सूर्याय नमः" मंत्र का जप करें। इसके बाद रत्न धारण करें।
  • कृतिका, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा अथवा रविपुष्य नक्षत्र में रविवार का दिन इस रत्न को धारण करना उत्तम होता है।

घर पे ही बनाये आंवला कैन्डी

आंवला कैन्डी
आवश्यक सामग्री:- आंवला (Indian Gooseberry) - 1 किग्रा (30 - 35) चीनी - 700 ग्राम ( 3 1/2 कप)
विधि:-
  • सबसे पहले आप आंवले को साफ पानी से धो लीजिये. किसी बर्तन में इतना पानी डालकर उबालने रखिये कि आंवला उसमें अच्छी तरह डुब सके.अब आप उबलते पानी में आंवले डालिये और फिर से उबाल आने के बाद 2 मिनिट तक आंवले उबलने दीजिये, गैस फ्लेम बन्द कर दीजिये और इन आमलों को 5 मिनिट के लिये ढककर रख दीजिये. आंवलों को ठंडे पानी में मत डालिये, पानी को पहले उबलने दीजिये तब आवंले डाले.
  • अब आप इन उबाले हुये आंवले को चलनी में डालकर पानी हटा दीजिये, ठंडा होने पर इनको चाकू की सहायता से काट कर फांके अलग अलग कर लीजिये और गुठली निकाल कर फैंक दीजिये. ये आंवले की कली किसी बड़े बर्तन में भरिये और 650 ग्राम चीनी ऊपर से भरकर रख दीजिये, बची हुई 50 ग्राम चीनी (आधा कप) का पाउडर बनाकर रख लीजिये.
  • अब आप दूसरे दिन आप देखेगे सारी चीनी का शरबत बन गया है, आंवले के ट्कड़े उस शरबत में तैर रहे हैं. आप इस शरबत को चमचे से चला कर, ढककर रख दीजिये. 2-3 दिन बाद यह आंवले के टुकड़े शरबत में तैरने के बजाय बर्तन के तले में नीचे बैठ जायेंगे अब ये तेर नहीं रहे हैं. चीनी आंवले के अन्दर पर्याप्त मात्रा में भर चूकी है और वह भारी होकर नीचे तले में चले गये हैं. अब इस शरबत को चलनी से छान कर अलग कर दीजिये और चलनी में आंवले के टुकड़े रह जायेंगे, पूरी तरह से आंवले से शरबत निकल जाय तब इन टुकड़ों को थाली में डाल कर धूप में सुखा लीजिये. इन सूखे हुये आंवले के टुकड़ों में चीनी का पाउडर मिलाइये. लीजिये ये आंवला कैन्डी (Amla Candy) तैयार हो गई है़, यह कैन्डी आप कन्टेनर में भर कर रख लीजिये और रोजाना 6-7 टुकड़े खाइये, यह स्वाद में तो अच्छी है ही आपकी सेहत के लिये बड़ी फायदे मन्द हैं.
मसालेदार आंवला कैन्डी
  • आंवला कैन्डी को मसालेदार (Spicy Amla Candy) बनाने के लिये आप सूखी कैन्डी में पिसी हुई चीनी के साथ एक छोटी चम्मच काला नमक, आधा छोटी चम्मच काली मिर्च पाउडर और आधा छोटी चम्मच अमचूर पाउडर मिलाइये. जिन्हें एकदम मीठा पसंद नहीं हो तो वे चटपटी आमला कैन्डी (Spicy Amla Candy) खा सकते है
आंवले का शर्बत
  • आंवले से निकला मीठे शरबत को आप गाड़ा करके आने वाले गर्मियों के मोसम में ठंडा आंवले का शरबत बना कर पीजिये. शरबत को गाड़ा करने के लिये इस शरबत को गैस फ्लेम पर पकने रख दीजिये जब ये शरबत गाड़ा दिखाई देने लगे, शरबत को ठंडा कीजिये और छान कर किसी कांच या प्लास्टिक के एअर टाइट कन्टेनर में भर कर रख लीजिये. इसका शरबत का स्वाद आंवले का विशिष्ट फ्लेवर लिये हुये होता है. जो आंवले का मुरब्बा या चटनी पसंद करते हैं उन्हें यह शरबत पसंद आयेगा.
  • चकुंदर (उसको बीट भी कहें ते है )के टुकड़े करके चाशनी में डालकर पका लें l जैसे आंवला केंडी बनती है, वैसे ही ये चकुंदर केंडी बन गयी l थोडा रोज खाये ...खूब खून बनेगा.... भोजन के बाद या कैसे भी खाये
  • आंवला हमारे जीवन में नित्य प्रयोग से त्रिदोष शांत होता है जीवन की अस्सी प्रतिशत बीमारियों से हमें आंवला खाने से निजात मिलती है.